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रोजगार से जुड़ा गोबर, गायों को मिला उनका ‘घर’

Sun, 22 Nov 2020 12:03 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 22 Nov 2020 12:03 AM IST
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Employed dung, cows found their 'home'
थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई गुड़िया। - फोटो : SHAMLI
रोजगार से जुड़ा गोबर, गायों को मिला उनका ‘घर’
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शामली। घरों से दूर होती जा रही गायों को उनके ‘घर’ तक पहुंचाने के लिए अंकित ने अनूठी मुहिम शुरू की है। उन्होंने देसी गाय के गोबर को रोजगार से जोड़ा है। अपने आसपास के गांवों में निराश्रित घूमने वाली गायों को वापस लोगों तक पहुुंचा रहे हैं। वह गोपालकों से गाय का गोबर खरीदते हैं और उससे हैंडीक्राफ्ट का सामान बनाकर बेचते हैं। गोबर से बने सामान को देखकर लोग आकर्षित हुए बिना नहीं रहते।
थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ़ निवासी अंकित एमएससी (एग्रीकल्चर) करने के साथ ही भोपाल में रहकर गोबर पर रिसर्च कर चुके हैं। 2014 तक उन्होंने रुड़की में एग्रीकल्चर कंपनी में नौकरी की, इसके बाद घर आ गए। उन्होंने निराश्रित घूमने वाली गायों को घरों तक पहुंचाने के लिए काम शुरू किया। अंकित बताते हैं कि दूध नहीं देने पर लोग गायों को छोड़ देते हैं। इसलिए उन्होंने गाय के गोबर को रोजगार से जोड़ा। फिलहाल वह अपने आसपास के सात गांवों में काम कर रहे हैं।
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इनमें 50 से ज्यादा देसी गायों को पशुपालकों तक पहुंचाया। उनसे 30 रुपये किलो सूखा गोबर खरीदते हैं और उसे हैंडीक्राफ्ट का सामान बनाते हैं। तैयार सामान हैदराबाद और मुंबई में बेचते हैं और कृषि मेलों में प्रदर्शनी भी लगाते हैं। इससे पहले वह सहारनपुर के रामपुर मनिहारन और उत्तराखंड में काम कर चुके हैं। वहां भी उन्होंने करीब 150 से ज्यादा देसी गायों को लोगों के घरों तक पहुंचाया।
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इन गांवों में घूमकर करते हैं प्रेरित
अंकित अपने गांव कुतुबगढ़ के अलावा लतीफगढ़, मोर माजरा, गोगवान, मुल्लापुर, जमालपुर, कितारसी में लोगों को गाय पालने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
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गुड़िया, ट्रॉफी और मूर्तियां करते हैं तैयार
अंकित गाय के सूखे गोबर को खरीदकर उसे मशीन से पीसते हैं। उसमें प्री-मिक्स मिलाकर देवी की मूर्तियां, ट्रॉफी, गुड़िया, सजावटी शीशे, दीवारों पर लगने वाली कलाकृतियां, गमले, दीये, मोबाइल स्टैंड समेत करीब 40 तरह के हैंडीक्राफ्ट के सामान तैयार करते हैं। वह बताते हैं कि देेसी गाय का गोबर शुभ होता है। फिलहाल तो उन्हें जो भी कमाई होती है उसका ज्यादातर हिस्सा गोबर खरीदने में चला जाता है। लाभ कमाने से ज्यादा उनकी कोशिश यह रहती है कि लोग गायों को निराश्रित न छोड़ें। फिलहाल वह प्रति माह लगभग डेढ़ क्विंटल गोबर खरीद रहे हैं।

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई  देवी की  मूर्ति

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई देवी की मूर्ति- फोटो : SHAMLI

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई ट्राफी।

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई ट्राफी।- फोटो : SHAMLI

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई ट्राफी।

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई ट्राफी।- फोटो : SHAMLI

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई कलाकृति।

थानाभवन क्षेत्र के गांव कुतुबगढ में गाय के गोबर से तैयार की गई कलाकृति।- फोटो : SHAMLI

गाय को दुलारते कुतुबगढ़ निवासी अंकित।

गाय को दुलारते कुतुबगढ़ निवासी अंकित।- फोटो : SHAMLI

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