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बिजली और पानी को भी मोहताज हैं दंगा पीड़ित
Updated Thu, 07 Sep 2017 12:13 AM IST
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कांधला।
सांप्रदायिक दंगे का दंश आज भी पीड़ितों की आंखों से साफ झलकता है। अपना घर छोड़ने के बाद पीड़ित लोग मूलभूत सुविधाओं के साथ ही रोजगार की समस्या से जूझ रहे हैं। चार वर्षों से किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ने उनके दर्द को समझने की कोशिश नहीं की। कहीं भी सुनवाई होती।
कांधला में नई बस्ती जन्नत कॉलोनी, चार खंबा कैराना रोड के साथ ही अंबेहटा मार्ग पर दंगा पीड़ितों के परिवार रहते हैं। दंगा पीड़ित मामू , सलामू, शाबिर, अब्दुल करीम, निवासी लिसाढ़ , इरशाद, शकील, निवासी हसनपुर, मोमीन आदि का कहना है कि आज भी वह दिन आंखों के सामने हैं, जिसे याद कर रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। अपना घर छूटने के बाद दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। इन लोगों ने बताया कि जिन बस्तियों में हम रह रहे हैं, वहां न पानी की सुविधा है न बिजली की। चार वर्षों से किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ने उनके दर्द को समझने की कोशिश नहीं की। लगातार अपनी समस्याओं को लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। गांव में तो मजदूरी करके अपना काम चला लेते थे. लेकिन यहां तो मजदूरी के भी लाले पड़ रहे हैं। यहां बच्चों की पढ़ाई का कोई साधन नहीं है। अपना गांव छोड़ने के बाद परेशान ही हैं।
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सांप्रदायिक दंगे का दंश आज भी पीड़ितों की आंखों से साफ झलकता है। अपना घर छोड़ने के बाद पीड़ित लोग मूलभूत सुविधाओं के साथ ही रोजगार की समस्या से जूझ रहे हैं। चार वर्षों से किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ने उनके दर्द को समझने की कोशिश नहीं की। कहीं भी सुनवाई होती।
कांधला में नई बस्ती जन्नत कॉलोनी, चार खंबा कैराना रोड के साथ ही अंबेहटा मार्ग पर दंगा पीड़ितों के परिवार रहते हैं। दंगा पीड़ित मामू , सलामू, शाबिर, अब्दुल करीम, निवासी लिसाढ़ , इरशाद, शकील, निवासी हसनपुर, मोमीन आदि का कहना है कि आज भी वह दिन आंखों के सामने हैं, जिसे याद कर रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। अपना घर छूटने के बाद दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। इन लोगों ने बताया कि जिन बस्तियों में हम रह रहे हैं, वहां न पानी की सुविधा है न बिजली की। चार वर्षों से किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ने उनके दर्द को समझने की कोशिश नहीं की। लगातार अपनी समस्याओं को लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। गांव में तो मजदूरी करके अपना काम चला लेते थे. लेकिन यहां तो मजदूरी के भी लाले पड़ रहे हैं। यहां बच्चों की पढ़ाई का कोई साधन नहीं है। अपना गांव छोड़ने के बाद परेशान ही हैं।
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