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आत्म चिंतन से प्रसन्न होते हैं भगवान
Updated Fri, 18 Aug 2017 12:44 AM IST
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झिंझाना(शामली)। कस्बा झिंझाना स्थित तीतरों वाली धर्मशाला में चल रही भागवत कथा के छठे दिन कथा वाचक आचार्य संपत्ति प्रसाद शास्त्री ने कहा कि आत्म चिंतन करने से भगवान प्रसन्न हो जाते है। चिंतन, मनन से साधक अपनी साधना में परिपक्व होकर ईश्वर की परम भक्ति को प्राप्त करता है। मीराबाई, संत तुकाराम, तुलसीदास जैसे संतों ने भी गहन चिंतन साधना से ही अपने जीवन को तपाया है। तभी तो शास्त्रों और ग्रंथों में उनकी गाथा गाई जाती है।
कथा वाचक ने भगवत पुराण के दसवें स्कंद की कथा के बारे में बताया कि गोपियों ने करोड़ों जन्मों की साधना के बाद भगवान श्रीकृष्ण को पाया था। प्रेम और श्रद्धा से उन्होंने भगवान को भजा है। इनकी प्रीति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनके घरों से माखन चोरी करते हैं तो गोपियां छुपकर उनको पकड़ कर दुलार करती हैं। इससे यह लगता है कि इस संसार में जीवात्मा का परस्पर संबंध है। भगवान समस्त बृजवासियों को अपनी लीलीओं से भाव विभोर करते है और अपने दिव्य स्वरूप को परमात्मा दर्शाते है। इन्हीं प्रसंगों से मनुष्य को भी अपना जीवन चरितार्थ करना चाहिए। प्रभु भक्ति ही एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य इस तुच्छ संसार से मुक्त होकर भव सागर पार कर सकता है। कथा के सफल आयोजन में पंडित वासुदेव सेमवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस दौरान काफी श्रद्धालु मौजूद रहे।
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कथा वाचक ने भगवत पुराण के दसवें स्कंद की कथा के बारे में बताया कि गोपियों ने करोड़ों जन्मों की साधना के बाद भगवान श्रीकृष्ण को पाया था। प्रेम और श्रद्धा से उन्होंने भगवान को भजा है। इनकी प्रीति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनके घरों से माखन चोरी करते हैं तो गोपियां छुपकर उनको पकड़ कर दुलार करती हैं। इससे यह लगता है कि इस संसार में जीवात्मा का परस्पर संबंध है। भगवान समस्त बृजवासियों को अपनी लीलीओं से भाव विभोर करते है और अपने दिव्य स्वरूप को परमात्मा दर्शाते है। इन्हीं प्रसंगों से मनुष्य को भी अपना जीवन चरितार्थ करना चाहिए। प्रभु भक्ति ही एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य इस तुच्छ संसार से मुक्त होकर भव सागर पार कर सकता है। कथा के सफल आयोजन में पंडित वासुदेव सेमवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस दौरान काफी श्रद्धालु मौजूद रहे।
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