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सिर्फ प्रतीक रूप से हमारा है यश भारती पुरस्कार
शाहजहांपुर।
Updated Sun, 08 Feb 2015 12:21 AM IST
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जनपद में प्रख्यात जमनालाल बजाज पुरस्कार आने के करीब चार साल बाद ही यश भारती पुरस्कार आ रहा है। दोनों पुरस्कारों को झोली में भरने का श्रेय एक ही व्यक्ति को जाता है, जिन्हें लोग रमेश भइया के नाम से जानते और पहचानते हैं। दोनों पुरस्कारों में एक और समानता है, वह यह कि जमनालाल बजाज पुरस्कार पहली बार यूपी की किसी शख्सियत को मिला था और अब समाजसेवा के क्षेत्र में यश भारती जैसा नामी-गिरामी पुरस्कार पाने वाले भी वह पहले ही व्यक्ति हैं। जमनालाल बजाज पुरस्कार उनकी हमसफर विमला को संयुक्त रूप से मिला था।
यश भारती पुरस्कार के लिए नामित किए जाने पर रमेश भइया ने अमर उजाला के साथ अपने कुछ अनुभव और सेवा कार्यों को साझा किया। बोले: उनके जीवन का लक्ष्य बहुत कुछ विनोबा जी और गांधी जी की ही तरह है। इसका कारण यह है कि वह इन दोनों महापुरुषों से काफी प्रभावित हुए और आचार्य विनोबा के सपनों को साकार करने का संकल्प लेकर ही वह गांव, खेत-खलिहान की तरक्की का सपना देखने लगे। उनका मानना है कि जब गांव तरक्की करेंगे तो देश स्वत: ही उन्नति करेगा।
बोले: अभी बहुत से गांव बाकी हैं, जहां काम करना बाकी है। यह पुरस्कार उनके और उनकी टीम का उत्साह बढ़ाने का काम करेगा। रमेश भइया कहते हैं कि प्रतीक रूप में भले ही यश भारती या फिर अन्य कोई पुरस्कार उन्हें मिल रहे हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह पुरस्कार उनकी टीम के सभी सदस्यों और शुभचिंतकों का ही है। जिनकी बदौलत ही वह सेवाभाव के सपनों को पूरा कर पा रहे हैं। खासतौर पर मीडिया की बदौलत ही पुरस्कार मिल रहे हैं, जो उनके छोटे-छोटे कार्यों को जन-जन तक पहुंचा रहा है।
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रमेश भइया बताते हैं कि उन्होंने बरतारा में विनोबा आश्रम के बाद अब अपनी जन्मभूमि यानी छीतेपुर में जेपी कुटीर भी बना रखी है, इन दिनों वह वहीं रह रहे हैं। यश भारती से पहले उन्हें वर्ष 1999 में जनपद रत्न, 2004 में श्री गांधी सम्मान और वर्ष 2011 में जमनालाल बजाज पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।
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यश भारती पुरस्कार के लिए नामित किए जाने पर रमेश भइया ने अमर उजाला के साथ अपने कुछ अनुभव और सेवा कार्यों को साझा किया। बोले: उनके जीवन का लक्ष्य बहुत कुछ विनोबा जी और गांधी जी की ही तरह है। इसका कारण यह है कि वह इन दोनों महापुरुषों से काफी प्रभावित हुए और आचार्य विनोबा के सपनों को साकार करने का संकल्प लेकर ही वह गांव, खेत-खलिहान की तरक्की का सपना देखने लगे। उनका मानना है कि जब गांव तरक्की करेंगे तो देश स्वत: ही उन्नति करेगा।
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बोले: अभी बहुत से गांव बाकी हैं, जहां काम करना बाकी है। यह पुरस्कार उनके और उनकी टीम का उत्साह बढ़ाने का काम करेगा। रमेश भइया कहते हैं कि प्रतीक रूप में भले ही यश भारती या फिर अन्य कोई पुरस्कार उन्हें मिल रहे हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह पुरस्कार उनकी टीम के सभी सदस्यों और शुभचिंतकों का ही है। जिनकी बदौलत ही वह सेवाभाव के सपनों को पूरा कर पा रहे हैं। खासतौर पर मीडिया की बदौलत ही पुरस्कार मिल रहे हैं, जो उनके छोटे-छोटे कार्यों को जन-जन तक पहुंचा रहा है।
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रमेश भइया बताते हैं कि उन्होंने बरतारा में विनोबा आश्रम के बाद अब अपनी जन्मभूमि यानी छीतेपुर में जेपी कुटीर भी बना रखी है, इन दिनों वह वहीं रह रहे हैं। यश भारती से पहले उन्हें वर्ष 1999 में जनपद रत्न, 2004 में श्री गांधी सम्मान और वर्ष 2011 में जमनालाल बजाज पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।