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Shahjahanpur News: प्रशिक्षु किसानों को गन्ना बोआई के यंत्रों की बताई उपयोगिता
Wed, 11 Dec 2024 02:51 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
Updated Wed, 11 Dec 2024 02:51 AM IST
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शाहजहांपुर। गन्ना शोध परिषद में आयोजित कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे दिन मंगलवार को समस्तीपुर बिहार से आए प्रशिक्षु किसानों को परिषद के शोध प्रक्षेत्र का भ्रमण कराया गया। इस दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों के समक्ष गन्ना बोआई में इस्तेमाल होने वाले कृषि यंत्रों का प्रदर्शन कर उनकी उपयोगिता बताई।
उन्हाेंने किसानों को गन्ने की आँख (बड), कान (आर्किल), पोरी की गोलाई, मोटाई आदि के बारे में बताया। साथ ही गन्ने की को.शा.-17231, को.शा.-13235, को.लख.-14201, को.शा.-18231, को.लख.-16202 आदि प्रजातियों की विशेषताएं बताकर उनकी पहचान के सुगम तरीके बताए। प्रशिक्षणार्थियाें को सिंगल बड विधि से नर्सरी तैयार कर रोपाई करने की तकनीक बताई। वैज्ञानिकों ने बताया कि प्रयोगशाला में टिशू कल्चर तकनीकी से पौध को ग्लास हाऊस में रखकर किस प्रकार रोपाई की गई है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि गन्ना की एक प्रजाति का विकास करने में 8-10 वर्ष लग जाते हैं। उन्होंने किसानों को गन्ने में लगने वाले कीटों से सचेत कर उनकी रोकथाम के उपाय बताए। साथ ही उन्हें कृषि से आय बढ़ाने के लिए शरदकालीन गन्ने के साथ आलू, लहसुन, फूल गोभी, पत्ता गोभी, मटर आदि फसलों की बोआई कराने की सलाह दी। प्रसार अधिकारी डाॅ. संजीव पाठक ने बताया कि सहफसली खेती मेंं फलीदार फसलें बोने से खेत में नाइट्रोजन तत्व बढ़ने से मृदा की उर्वरता भी बढ़ जाती है। शोध प्रक्षेत्र भ्रमण में डाॅ. अजय तिवारी, डाॅ.सीएस पोसवाल, डाॅ. मनीष मोहन आदि मौजूद रहे। तकनीकी सत्र में डाॅ. जीएन गुप्ता, डाॅ. नीलम कुरील, डाॅ. अर्चना आदि ने किसानों का मार्गदर्शन किया।
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उन्हाेंने किसानों को गन्ने की आँख (बड), कान (आर्किल), पोरी की गोलाई, मोटाई आदि के बारे में बताया। साथ ही गन्ने की को.शा.-17231, को.शा.-13235, को.लख.-14201, को.शा.-18231, को.लख.-16202 आदि प्रजातियों की विशेषताएं बताकर उनकी पहचान के सुगम तरीके बताए। प्रशिक्षणार्थियाें को सिंगल बड विधि से नर्सरी तैयार कर रोपाई करने की तकनीक बताई। वैज्ञानिकों ने बताया कि प्रयोगशाला में टिशू कल्चर तकनीकी से पौध को ग्लास हाऊस में रखकर किस प्रकार रोपाई की गई है।
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वैज्ञानिकों ने बताया कि गन्ना की एक प्रजाति का विकास करने में 8-10 वर्ष लग जाते हैं। उन्होंने किसानों को गन्ने में लगने वाले कीटों से सचेत कर उनकी रोकथाम के उपाय बताए। साथ ही उन्हें कृषि से आय बढ़ाने के लिए शरदकालीन गन्ने के साथ आलू, लहसुन, फूल गोभी, पत्ता गोभी, मटर आदि फसलों की बोआई कराने की सलाह दी। प्रसार अधिकारी डाॅ. संजीव पाठक ने बताया कि सहफसली खेती मेंं फलीदार फसलें बोने से खेत में नाइट्रोजन तत्व बढ़ने से मृदा की उर्वरता भी बढ़ जाती है। शोध प्रक्षेत्र भ्रमण में डाॅ. अजय तिवारी, डाॅ.सीएस पोसवाल, डाॅ. मनीष मोहन आदि मौजूद रहे। तकनीकी सत्र में डाॅ. जीएन गुप्ता, डाॅ. नीलम कुरील, डाॅ. अर्चना आदि ने किसानों का मार्गदर्शन किया।
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