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Shahjahanpur News: पटना देवकली का शिव मंदिर सावन के स्वागत के लिए तैयार
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पटना देवकली शिवमंदिर। संवाद
कलान। दैत्य गुरु शुक्राचार्य की तपोभूमि के तौर पर विख्यात पटना देवकली गांव के प्राचीन शिव मंदिर में सावन माह में लगने वाले मेले के संबंध में सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। हालांकि, अभी मुख्य मार्ग से मंदिर तक करीब 600 मीटर संपर्क मार्ग की मरम्मत नहीं हो सकी है।
बदायूं की सीमा पर स्थित पटना देवकली गांंव के शिव मंदिर पर साल में दो बार मेला लगता है। फाल्गुन में एक पखवाड़ा तक महाशिवरात्रि के मेले की धूम रहती है, जबकि सावन में पूरे माह मेला लगता है। इन मेलों में हजारों श्रद्धालु भगवान शिव जी का दर्शन-पूजन करने और गंगाजल की कांवड़ चढ़ाने आते हैं।
ऐसी मान्यता है कि दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने इसी मंदिर में तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। मंदिर के महंत बबलू गिरि के अनुसार दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मंदिर में अपने हाथों से आठ शिवलिंग बनाकर स्थापित किए और लगभग आठ हजार वर्ष तपस्या की थी।
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उन्होंने बताया कि शिव जी के उपासक रावण ने भी कई बार यहां आकर यहां पूजा-अर्चना की और गुरु बृहस्पति के पुत्र कच ने भी यहां दैत्य गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त की थी।
इन्हीं पुरातन मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं में इस प्राचीन मंदिर में विराजित भगवान शिव के प्रति विशेष आस्था है। श्रद्धालु शिव जी से मन्नत मांगते हैं और मनोकामना पूरी होने पर मंदिर परिसर में घंटे चढ़ाने और नल लगवाने के साथ अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी कराते हैं।
महंत गिरि ने बताया कि परिवार की 33वीं पीढ़ी के तौर पर उन्हें मंदिर की सेवा करने का अवसर मिला है। उन्होंने बताया कि मेले में श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, प्रकाश व्यवस्था कर ली गई है। मंदिर मार्ग की मरम्मत के लिए अधिकारियों से बात हुई है और यह काम भी जल्द हो जाने की उम्मीद है।
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बदायूं की सीमा पर स्थित पटना देवकली गांंव के शिव मंदिर पर साल में दो बार मेला लगता है। फाल्गुन में एक पखवाड़ा तक महाशिवरात्रि के मेले की धूम रहती है, जबकि सावन में पूरे माह मेला लगता है। इन मेलों में हजारों श्रद्धालु भगवान शिव जी का दर्शन-पूजन करने और गंगाजल की कांवड़ चढ़ाने आते हैं।
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ऐसी मान्यता है कि दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने इसी मंदिर में तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। मंदिर के महंत बबलू गिरि के अनुसार दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मंदिर में अपने हाथों से आठ शिवलिंग बनाकर स्थापित किए और लगभग आठ हजार वर्ष तपस्या की थी।
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उन्होंने बताया कि शिव जी के उपासक रावण ने भी कई बार यहां आकर यहां पूजा-अर्चना की और गुरु बृहस्पति के पुत्र कच ने भी यहां दैत्य गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त की थी।
इन्हीं पुरातन मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं में इस प्राचीन मंदिर में विराजित भगवान शिव के प्रति विशेष आस्था है। श्रद्धालु शिव जी से मन्नत मांगते हैं और मनोकामना पूरी होने पर मंदिर परिसर में घंटे चढ़ाने और नल लगवाने के साथ अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी कराते हैं।
महंत गिरि ने बताया कि परिवार की 33वीं पीढ़ी के तौर पर उन्हें मंदिर की सेवा करने का अवसर मिला है। उन्होंने बताया कि मेले में श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, प्रकाश व्यवस्था कर ली गई है। मंदिर मार्ग की मरम्मत के लिए अधिकारियों से बात हुई है और यह काम भी जल्द हो जाने की उम्मीद है।