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पुवायांः संगठन की मेहनत और चेतराम की सरल छवि बनी जीत का आधार

Fri, 11 Mar 2022 01:55 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 11 Mar 2022 01:55 AM IST
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The hard work of the organization and the simple image of the candidate became the basis of victory.
पुवायां में भाजपा की जीत पर एक दूसरे को मिष्ठान खिलाती महिला कार्यकर्ता - फोटो : POWAYAN
पुवायां (शाहजहांपुर)। पुवायां सुरक्षित सीट से भाजपा विधायक और पार्टी प्रत्याशी चेतराम पासी ने अपना कब्जा बरकरार रखा है। पूरी मतगणना में उन्हें केवल एक राउंड में सपा प्रत्याशी से कम वोट मिले। पन्ना प्रमुख से लेकर सभी कार्यकर्ताओं की मेहनत और मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष की जनसभाओं ने महौल बना दिया। वहीं चेतराम पासी की सरल छवि और नाराज कार्यकर्ताओं को अपने पक्ष में कर लेने के बाद वह भाजपा से दूसरी बार और कुल छठवीं बार विधायक बने हैं।
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प्रदेश में चुनाव की घोषणा से पूर्व चेतराम का टिकट कटने को लेकर चर्चाएं जोरों पर थीं। पुवायां से क्षमा वर्मा और शकुंतला देवी भी टिकट की दावेदार थीं। चर्चा यह भी थी कई वर्ष से पुवायां में गांव-गांव जाकर माहौल बना रहे उपेंद्र पाल इस बार सब पर भारी पड़ेंगे। लेकिन, पार्टी ने चेतराम पर ही भरोसा जताया और उन्हें पुवायां से उम्मीदवार घोषित कर दिया। टिकट मिलते ही चेतराम ने नाराज कार्यकर्ताओं को अपने पक्ष में करने के लिए उनसे संपर्क कर गिले शिकवे दूर किए। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं को चेतराम के पाले में लाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।
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गुटों में बंटे कार्यकर्ताओं ने भले ही एक साथ होकर वोट न मांगे हों, लेकिन अलग-अलग रहकर भी रोजाना गांवों में घूमकर चेतराम के पक्ष में माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चेतराम ने अपनी सरल छवि के अनुसार गांवों में लोगों से मिलकर उनके कम मिल पाने का शिकवा दूर किया और रही सही कसर महीने में दो बार मिल रहे गेहूं, चावल, रिफाइंड, नमक, चना ने पूरी कर दी। गरीब तबके के लोग जो बसपा का परंपरागत वोटर थे, वह भी कहते देखे गए कि नमक खाकर नमक हरामी नहीं करेंगे और भाजपा को वोट देंगे। इसके बाद चेतराम की जीत पक्की हो गई और मतगणना में यह साबित भी हो गया।
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सेनापति न होना बना उपेंद्र की हार का कारण
सपा प्रत्याशी उपेंद्र पाल कई वर्षों से क्षेत्र में लोगों से मिलकर सियासी जमीन तैयार कर रहे थे, लेकिन भितरघात और बड़े नेताओं का पुवायां नहीं आना उनके विधायक बनने का सपना चकनाचूर कर गया। उपेंद्र पाल के पास कार्यकर्ताओं की फौज तो थी, लेकिन सेनापति की कमी से उनकी विधानसभा की राह बंद हो गई। उन्होंने एक-एक गांव का चार से पांच बार तक भ्रमण किया। लोग उपेंद्र पाल की जीत की चर्चा भी करने लगे थे। चुनाव आया तो उपेंद्र पाल को सेनापति की कमी खली। हर मामले को उन्हें खुद ही संभालना पड़ा। एक साथ कई मोर्चों पर ध्यान बंट जाने से उनकी स्थित धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई।
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