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शिवभक्तों की आस्था का केंद्र है गोगेपुर का प्राचीन शिव मंदिर
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जैतीपुर के गोगेपुर स्थित शिव मंदिर
- फोटो : SHAHJAHANPUR
जैतीपुर। विकास खंड क्षेत्र के गोगेपुर स्थित प्राचीन शिव मंदिर आसपास के सैकड़ों गांव के लोगों की आस्था का केंद्र है। महाशिवरात्रि के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में पूजा-अर्चना और शिवलिंग पर जलाभिषेक करने आते हैं। मंदिर पर आठ दिन पहले से ही मेला लग जाता है। इसमें खरीदारी के लिए भी लोगों की भीड़ उमड़ती है।
गोगेपुर मंदिर के पुजारी शंकरदास ने बताया कि मंदिर का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना है। यहां पहले जंगल हुआ करता था। आसपास के गांव वाले लकड़ी बीनने और पशु चराने का काम करते थे। एक बार खोदाई करते समय किसी मजदूर का फावड़ा शिवलिंग पर लग गया था, जिसमें से दूध निकलने लगा। तभी लोगों ने इसकी जानकारी क्षेत्र के खमरिया गांव के जमींदार ठाकुर साहब सिंह को दी।
उन्होंने शिवलिंग को खमरिया लाने का निर्णय लिया और शिवलिंग की खोदाई करानी शुरू कर दी। जमीन की सतह तक खोदाई कराई, लेकिन शिवलिंग का आखिरी छोर नहीं मिला। जमीदार ने जंजीरों में बांधकर हाथियों से शिवलिंग को खिंचवाया। हाथियों के जोर से भी शिवलिंग हिल न सका। फिर उन्हें रात में सपना हुआ कि यहां मंदिर का निर्माण कराओ, तब 400 वर्ष पूर्व जमींदार ने इस मंदिर का निर्माण करवाया।
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जमींदार ने मंदिर के अलावा धर्मशाला, पुजारियों के लिए दो कमरे, यज्ञशाला और 12 एकड़ जमीन मंदिर के नाम की थी। करीब छह दशक पूर्व जमीन को तत्कालीन पुजारियों ने कौड़ियों के भाव बेच दिया। 400 वर्ष पूर्व से ही यहां पूजा-पाठ शुरू हो गया। शिव भक्तों ने जलाभिषेक व पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे यहां पर मेला लगने लगा। आज गोगेपुर का मेला लकड़ी के व्यापारियों के लिए लाभ का केंद्र बन गया है। सैकड़ों व्यापारी यहां कीमती लकड़ी का फर्नीचर लाकर व्यापार करते हैं।
दूरदराज से पूजा-अर्चना के लिए आते हैं श्रद्धालु
मंदिर में गढ़िया रंगीन, खमरिया खेड़ा, रठ, बझेड़ा, भगवानपुर, भिटारा, जैतीपुर, करकौर, भनपूरा, शंकरपुर, पिटरहाई, नवादा मोड, अगरोली, बिनौरा, सुरजूपुर, बानपुर, मगनपुर, मरेना, डभौरा, पृथ्वीपुर, पहाड़पुर, घसा, कल्याणपुर, धुबला करीमनगर आदि गांवों के लोग यहां पूजा-अर्चना को आते हैं। इसके अलावा दूरदराज से भी लोग महाशिवरात्रि के दिन जलाभिषेक करने आते हैं। महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व ही रामगंगा से जल लाकर शिवभक्त कांवड़ यात्रा निकालते हैं। जो सुबह 4:00 बजे से पहुंचकर मंदिर पर जलाभिषेक करते हैं।
मेले में दुकान के लिए दुकानदारों ने शुरू किया जगह घेरना
गोगेपुर मंदिर परिसर में लगने वाले मेले में दुकान लगाने केे आठ दिन पहले से ही दुकानदारों ने अपनी जगह घेरना शुरू कर दिया है। यहां पर लकड़ी के फर्नीचर के लिए दूरदराज से व्यापारी व्यापार करने आते हैं। वैसे तो मेले में कपड़ा, लोहा, बर्तन, खिलौने, घरेलू सामानों की भरमार रहती है, लेकिन फर्नीचर के लिए यह मेला मशहूर है। कुर्सी, बेड, मेज, अलमारी, लकड़ी से बने खिलौने खूब बिकते हैं।
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गोगेपुर मंदिर के पुजारी शंकरदास ने बताया कि मंदिर का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना है। यहां पहले जंगल हुआ करता था। आसपास के गांव वाले लकड़ी बीनने और पशु चराने का काम करते थे। एक बार खोदाई करते समय किसी मजदूर का फावड़ा शिवलिंग पर लग गया था, जिसमें से दूध निकलने लगा। तभी लोगों ने इसकी जानकारी क्षेत्र के खमरिया गांव के जमींदार ठाकुर साहब सिंह को दी।
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उन्होंने शिवलिंग को खमरिया लाने का निर्णय लिया और शिवलिंग की खोदाई करानी शुरू कर दी। जमीन की सतह तक खोदाई कराई, लेकिन शिवलिंग का आखिरी छोर नहीं मिला। जमीदार ने जंजीरों में बांधकर हाथियों से शिवलिंग को खिंचवाया। हाथियों के जोर से भी शिवलिंग हिल न सका। फिर उन्हें रात में सपना हुआ कि यहां मंदिर का निर्माण कराओ, तब 400 वर्ष पूर्व जमींदार ने इस मंदिर का निर्माण करवाया।
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जमींदार ने मंदिर के अलावा धर्मशाला, पुजारियों के लिए दो कमरे, यज्ञशाला और 12 एकड़ जमीन मंदिर के नाम की थी। करीब छह दशक पूर्व जमीन को तत्कालीन पुजारियों ने कौड़ियों के भाव बेच दिया। 400 वर्ष पूर्व से ही यहां पूजा-पाठ शुरू हो गया। शिव भक्तों ने जलाभिषेक व पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे यहां पर मेला लगने लगा। आज गोगेपुर का मेला लकड़ी के व्यापारियों के लिए लाभ का केंद्र बन गया है। सैकड़ों व्यापारी यहां कीमती लकड़ी का फर्नीचर लाकर व्यापार करते हैं।
दूरदराज से पूजा-अर्चना के लिए आते हैं श्रद्धालु
मंदिर में गढ़िया रंगीन, खमरिया खेड़ा, रठ, बझेड़ा, भगवानपुर, भिटारा, जैतीपुर, करकौर, भनपूरा, शंकरपुर, पिटरहाई, नवादा मोड, अगरोली, बिनौरा, सुरजूपुर, बानपुर, मगनपुर, मरेना, डभौरा, पृथ्वीपुर, पहाड़पुर, घसा, कल्याणपुर, धुबला करीमनगर आदि गांवों के लोग यहां पूजा-अर्चना को आते हैं। इसके अलावा दूरदराज से भी लोग महाशिवरात्रि के दिन जलाभिषेक करने आते हैं। महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व ही रामगंगा से जल लाकर शिवभक्त कांवड़ यात्रा निकालते हैं। जो सुबह 4:00 बजे से पहुंचकर मंदिर पर जलाभिषेक करते हैं।
मेले में दुकान के लिए दुकानदारों ने शुरू किया जगह घेरना
गोगेपुर मंदिर परिसर में लगने वाले मेले में दुकान लगाने केे आठ दिन पहले से ही दुकानदारों ने अपनी जगह घेरना शुरू कर दिया है। यहां पर लकड़ी के फर्नीचर के लिए दूरदराज से व्यापारी व्यापार करने आते हैं। वैसे तो मेले में कपड़ा, लोहा, बर्तन, खिलौने, घरेलू सामानों की भरमार रहती है, लेकिन फर्नीचर के लिए यह मेला मशहूर है। कुर्सी, बेड, मेज, अलमारी, लकड़ी से बने खिलौने खूब बिकते हैं।