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Shahjahanpur News: यहां तो अंतिम सांसें गिन रहा कालीन कारोबार
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निगोही में कालीन की बुनाई करते कारीगर। संवाद
शाहजहांपुर/निगोही। कभी कालीन की बुनाई के लिए पहचान रखने वाले शाहजहांपुर में अब यह कुटीर उद्योग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। काम की कमी और कम मेहनताना मिलने के कारण कालीन बुनकरों ने इस परंपरागत कारोबार से दूरी बना ली है। स्थिति यह है कि अब गिने-चुने लोग ही कालीन बुनाई का काम कर रहे हैं।
शुक्रवार को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस है। वर्षों पहले शहर के कई मोहल्लों के साथ ही तिलहर, मीरानपुर कटरा और निगोही क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कालीन बुनाई का काम होता था। इसमें बच्चे, किशोर, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं जुड़ी हुई थीं। करीब दस हजार अड्डे लगे होने के साथ ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 50 हजार लोग कालीन के काम से जुड़े थे।
जीएफ कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद तारिक बताते हैं कि भदोही और मिर्जापुर के ठेकेदारों ने यहां पर ब्रांच खोल रखी थी। वे यहां से ठेके पर कालीन बनवाकर भदोही मंगवाते थे। वहां फिनिशिंग होने के बाद विदेश में बेचा जाता था। शाहजहांपुर में तैयार कालीन विदेशों की कोठियाें की शान को बढ़ाती थीं।
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करीब 15 साल पहले तक यह कारोबार काफी बेहतर स्थिति में था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कालीन की मांग कम होने पर धीरे-धीरे मांग कम होने लगी और बुनकरों को पर्याप्त काम मिलना बंद हो गया। कम आमदनी के चलते कई लोगों ने अपने करखाने बंद कर दिए और दूसरे रोजगार अपना लिए।
निगोही कस्बे के नई बस्ती निवासी एजाज हुसैन और बगीचा मोहल्ले के शमशाद ने बताया कि एक कालीन तैयार करने में करीब 45 दिन लग जाते हैं। इसके बदले लगभग दस हजार रुपये मिलते हैं, जो मेहनत के हिसाब से काफी कम हैं। बुनकरों को करीब 250 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी मिलती है।
कम आमदनी के कारण अधिकांश लोगों ने ई-रिक्शा चलाना, फल-सब्जी का ठेला लगाना या अन्य काम शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से प्रोत्साहन, बेहतर बाजार और उचित मेहनताना मिले तो कालीन उद्योग को फिर से जीवित किया जा सकता है।
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अब कुछ ही स्थानों पर बन रहे कालीन
-वर्तमान में मऊ कैंट, मऊ खालसा और ककरा क्षेत्र में ही कालीन के कुछ अड्डे लगे हैं। बिजलीपुरा मोहल्ले में कारखाना बंद हो गया है। प्रो. तारिक बताते हैं कि कालीन का काम करने वालों को फेफड़ाें की बीमारी होने के चलते वे काम छोड़ने लगे हैं। काम की कमी व दिहाड़ी कम मिलना भी एक बड़ी वजह है।
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कालीन की बुनाई के लिए कोई यूनिट लगाना चाहता है तो उसे विभिन्न तरह की योजनाओं में शामिल कर लाभ दिया जा सकता है। ऐसे व्यक्ति सीधे संपर्क कर सकते हैं।
-संजय सिंह, उपायुक्त उद्योग
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शुक्रवार को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस है। वर्षों पहले शहर के कई मोहल्लों के साथ ही तिलहर, मीरानपुर कटरा और निगोही क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कालीन बुनाई का काम होता था। इसमें बच्चे, किशोर, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं जुड़ी हुई थीं। करीब दस हजार अड्डे लगे होने के साथ ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 50 हजार लोग कालीन के काम से जुड़े थे।
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जीएफ कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद तारिक बताते हैं कि भदोही और मिर्जापुर के ठेकेदारों ने यहां पर ब्रांच खोल रखी थी। वे यहां से ठेके पर कालीन बनवाकर भदोही मंगवाते थे। वहां फिनिशिंग होने के बाद विदेश में बेचा जाता था। शाहजहांपुर में तैयार कालीन विदेशों की कोठियाें की शान को बढ़ाती थीं।
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करीब 15 साल पहले तक यह कारोबार काफी बेहतर स्थिति में था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कालीन की मांग कम होने पर धीरे-धीरे मांग कम होने लगी और बुनकरों को पर्याप्त काम मिलना बंद हो गया। कम आमदनी के चलते कई लोगों ने अपने करखाने बंद कर दिए और दूसरे रोजगार अपना लिए।
निगोही कस्बे के नई बस्ती निवासी एजाज हुसैन और बगीचा मोहल्ले के शमशाद ने बताया कि एक कालीन तैयार करने में करीब 45 दिन लग जाते हैं। इसके बदले लगभग दस हजार रुपये मिलते हैं, जो मेहनत के हिसाब से काफी कम हैं। बुनकरों को करीब 250 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी मिलती है।
कम आमदनी के कारण अधिकांश लोगों ने ई-रिक्शा चलाना, फल-सब्जी का ठेला लगाना या अन्य काम शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से प्रोत्साहन, बेहतर बाजार और उचित मेहनताना मिले तो कालीन उद्योग को फिर से जीवित किया जा सकता है।
अब कुछ ही स्थानों पर बन रहे कालीन
-वर्तमान में मऊ कैंट, मऊ खालसा और ककरा क्षेत्र में ही कालीन के कुछ अड्डे लगे हैं। बिजलीपुरा मोहल्ले में कारखाना बंद हो गया है। प्रो. तारिक बताते हैं कि कालीन का काम करने वालों को फेफड़ाें की बीमारी होने के चलते वे काम छोड़ने लगे हैं। काम की कमी व दिहाड़ी कम मिलना भी एक बड़ी वजह है।
कालीन की बुनाई के लिए कोई यूनिट लगाना चाहता है तो उसे विभिन्न तरह की योजनाओं में शामिल कर लाभ दिया जा सकता है। ऐसे व्यक्ति सीधे संपर्क कर सकते हैं।
-संजय सिंह, उपायुक्त उद्योग