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जब मन में आए तब कर लो प्रभु भक्ति
शाहजहांपुर
Updated Fri, 23 Jan 2015 12:35 AM IST
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जैन मुनि सौरभ सागर महाराज के सानिध्य में सरायकाइयां स्थित जैन मंदिर में बृहस्पतिवार को वेदी शुद्घि एवं श्री शांतिनाथ विधान का भव्य आयोजन किया गया। इसमें संगीतमय अर्चना कर श्रद्घालुओं ने जीवन को धर्ममय किया। इस दौरा प्रख्यात संत सौरभ जी महाराज ने श्रद्घालुओं को प्रवचन देकर श्रेष्ठ कार्य करने की बात कही।
सौरभ ने बताया कि धार्मिक होने के लिए बुढ़ापे व अपने अंतिम दिनों का इंतजार मत कीजिए। जिस वक्त मन में आए भजन पाठ, जाप औ प्रभु की भक्ति कर लीजिए। कहा कि मन को ऐसा बनाइए कि वस्त्रों और आभूषणों की तरह वह सभी जगह किसी के भी साथ आसानी घुलमिल जाए। बताया कि जिस तरह बच्चों की डोर जब तक माता-पिता के हाथ में है, वे तब तक सुरक्षित हैं, उसी तरह भक्त की डोर परमात्मा और गुरू के हाथों में होने पर ही उसका जीवन सुरक्षित है।
संत सौरभ ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार साइकिल के पंचर को पानी के अंदर डुबोकर खोजा जाता है। उसी प्रकार मनुष्य को अपनी बुराईयों के बारे में सत्संग में जाने पर मालूम पड़ता है। कहा कि सत्संग में जाने के बाद जो बुराईयां छोड़कर अच्छाईयां ग्रहण कर लेता है। वह श्रेष्ठ इंसान कहलाता है।
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इससे पूर्व संगीत भक्ति आराधना में महिला एवं पुरुषों, बालक- बालिकाओं आदि सभी ने संत श्री को अर्घ्य समर्पित किए। साथ ही तमाम श्रद्घालुओं ने बुरे काम छोड़कर अच्छे काम करने का संकल्प लिया। इस दौरान राजेश, मुकेश, गुड्डू, हरिदास, प्रवीन, विपिन, सरिता, नीता, पूनम, राधा आदि ने आरती एवं भजन गाए।
दिगंबर स्वरूप देखने को उमड़े श्रद्घालु
कडकड़ाती सर्दी में जब एक ओर जन सामान्य तमाम ऊनी कपड़े पहनने के बावजूद भी सर्दी से बेहाल है। वहीं जैन संत सौरभ जी महाराज नंगे बदन और नंगे पांव पद यात्रा करते हुए यहां पहुंचे। उनका यह स्वरूप देख सर्दी से ठिठुरते लोग उनके आगे नतमस्तक हो उठे।
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सौरभ ने बताया कि धार्मिक होने के लिए बुढ़ापे व अपने अंतिम दिनों का इंतजार मत कीजिए। जिस वक्त मन में आए भजन पाठ, जाप औ प्रभु की भक्ति कर लीजिए। कहा कि मन को ऐसा बनाइए कि वस्त्रों और आभूषणों की तरह वह सभी जगह किसी के भी साथ आसानी घुलमिल जाए। बताया कि जिस तरह बच्चों की डोर जब तक माता-पिता के हाथ में है, वे तब तक सुरक्षित हैं, उसी तरह भक्त की डोर परमात्मा और गुरू के हाथों में होने पर ही उसका जीवन सुरक्षित है।
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संत सौरभ ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार साइकिल के पंचर को पानी के अंदर डुबोकर खोजा जाता है। उसी प्रकार मनुष्य को अपनी बुराईयों के बारे में सत्संग में जाने पर मालूम पड़ता है। कहा कि सत्संग में जाने के बाद जो बुराईयां छोड़कर अच्छाईयां ग्रहण कर लेता है। वह श्रेष्ठ इंसान कहलाता है।
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इससे पूर्व संगीत भक्ति आराधना में महिला एवं पुरुषों, बालक- बालिकाओं आदि सभी ने संत श्री को अर्घ्य समर्पित किए। साथ ही तमाम श्रद्घालुओं ने बुरे काम छोड़कर अच्छे काम करने का संकल्प लिया। इस दौरान राजेश, मुकेश, गुड्डू, हरिदास, प्रवीन, विपिन, सरिता, नीता, पूनम, राधा आदि ने आरती एवं भजन गाए।
दिगंबर स्वरूप देखने को उमड़े श्रद्घालु
कडकड़ाती सर्दी में जब एक ओर जन सामान्य तमाम ऊनी कपड़े पहनने के बावजूद भी सर्दी से बेहाल है। वहीं जैन संत सौरभ जी महाराज नंगे बदन और नंगे पांव पद यात्रा करते हुए यहां पहुंचे। उनका यह स्वरूप देख सर्दी से ठिठुरते लोग उनके आगे नतमस्तक हो उठे।