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Shahjahanpur News: कोलाघाट पुल बंद होने से सिकुड़ा पालेज की खेती का रकबा

Sat, 25 May 2024 04:37 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर Updated Sat, 25 May 2024 04:37 AM IST
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Palej farming area shrunk due to closure of Kolaghat bridge
किसान हरेराम। संवाद
जलालाबाद। कोलाघाट का पुल बड़े वाहनों के लिए प्रतिबंधित होने से क्षेत्र में पालेज उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। पहले की तरह बाहरी जनपदों के व्यापारियों के न पहुंचने से मुनाफे में आई गिरावट के बाद इस खेती का रकबा काफी घट चुका है।
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अनुमान के मुताबिक, रामगंगा तथा बहगुल नदी किनारे परौर से लेकर औरंगाबाद तक करीब 30 किलोमीटर की दूरी के बीच पहले करीब 15 सौ एकड़ में होने वाली इस खेती का दायरा सिमटकर अब बमुश्किल एक हजार एकड़ से भी कम रह गया है।
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काश्तकारों के मुताबिक पालेज (खीरा, ककड़ी, कद्दू, लौकी, कुम्हड़ा, तरबूज तथा खरबूजा) में सबसे ज्यादा कुम्हड़ा की फसल पैदा की जाती है। पालेज के लिए रेतीला क्षेत्र सबसे उपयुक्त होने के कारण रामगंगा तथा बहगुल नदियों के किनारे के गांव बीघापुर, कसारी, रैपुरा, पहरुआ, नौगवां, अल्लादादपुर बैहारी, सिठौली समेत कई अन्य गांवों के सैकड़ों किसान लंबे समय से पालेज की खेती करते आ रहे हैं। यहां तरबूज की नामधारी व काला तथा खरबूजे की खुशबू, मधु व काला जामुन वैराइटी बाहर काफी पसंद की जाती है।
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तरबूज, खरबूज के अलावा कुम्हड़ा की फसल का मथुरा, आगरा, औरैया, कानपुर, ग्वालियर तथा भिंड आदि जगहों से आने वाले कई थोक व्यापारी खेतों से ही सौदा कर लेते थे। कई व्यापारी ककड़ी, खीरा, कद्दू व लौकी भी खरीद ले जाते थे। बाढ़ प्रभावित काश्तकारों के लिए ये फसलें अच्छी आमदनी का जरिया हैं, लेकिन पुल से बड़े वाहन प्रतिबंधित होने के बाद बाहर के व्यापारियों का यहां पहुंचना कम हो गया। इस कारण बड़े पैमाने पर की जाने वाली इस खेती का रकबा भी सिकुड़ता चला गया।
वर्तमान में ज्यादातर छोटे काश्तकार ही इस खेती से जुड़े रह गए हैं। वे छोटे वाहनों के जरिये पैंटून पुल से जलालाबाद, मिर्जापुर या कलान की बाजार ले जाकर फसल की बिक्री कर लेते हैं। कई काश्तकार इस फसल स्थानीय लोगों के हाथ बेच लेते हैं, जो कोला पुल के दोनों ओर सड़क पर अथवा नीचे के कच्चे रास्ते किनारे रखकर फुटकर में उनकी बिक्री करते रहते हैं। कुम्हड़ा का सही दाम बाहर से आने वाले व्यापारी से ही मिल पाता था। संवाद
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आठ महीने की होती है खेती
गांव रैपुरा के अवधेश ने बताया कि दिसंबर में पालेज की शुरुआत होती है और बाढ़ आने से पहले 15 जुलाई तक यह खत्म हो जाती है। बताया कि दस बीघे में करीब एक लाख रुपये की लागत आ जाती है। कोई समस्या न हो और भाव सही मिल जाए, तब दो से ढाई-तीन लाख रुपयों तक बचत हो जाती है।
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पंद्रह बीघा में तरबूज, खरबूजा और ककड़ी की फसल की है। बाहर के व्यापारी आते थे तब छोटे काश्तकारों की फसल खरीद लेते थे। इससे सही भाव मिल जाता था। फसल बाहर भेजने के बजाय कलान, मिर्जापुर या जलालाबाद की मंडी में बेच देते हैं।

हरेराम, अतरी निजामपुर
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30 बीघा में पालेज की है। करीब 20 बीघा में कुम्हड़ा है। कुम्हड़ा की बिक्री के लिए आगरा, औरैया के व्यापारियों से फोन पर बात करके भाव की जानकारी मिल जाती है। बाहर भाव अच्छा मिलता है, लेकिन ढुलाई का खर्च ज्यादा पड़ जाता है।
सत्येंद्र कुशवाहा, सिठौली

किसान हरेराम। संवाद

किसान हरेराम। संवाद

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