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Shahjahanpur News: कभी ‘मौत का क्षेत्र’ कहलाता था जिला, आज भी मलेरिया का कहर जारी

Sat, 25 Apr 2026 12:02 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 25 Apr 2026 12:02 AM IST
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Once Known as the Zone of Death, the District Still Faces the Ravages of Malaria
डॉ. विकास खुराना। स्रोत : स्वयं - फोटो : विद्यालय में सचिन शुक्ला को मिठाई ​खिलाते प्रबंधक व अन्य।
शाहजहांपुर। शाहजहांपुर लंबे समय से मलेरिया का गढ़ रहा है, इसे ब्रिटिशकाल में ‘रीजन ऑफ डेथ’ यानी ‘मौत का क्षेत्र’ कहा जाता था। इस गंभीर बीमारी ने जिले में लाखों लोगों की जान ली और आज भी इसका प्रकोप जारी है। वर्ष 1984 में मलेरिया से छह सौ लोगों की मौत हुई थी, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा था। वर्तमान में भी जिले के 45 गांवों को मलेरिया के हॉट स्पॉट के रूप में चिह्नित किया गया है।
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25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है। एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष व इतिहासकार डॉ. विकास खुराना ने बताया कि मलेरिया एक गंभीर परजीवी संक्रमण है जो मादा एनाफिलिज मच्छर के काटने से फैलता है। पहले इसे दलदल से उठने वाली ‘बुरी हवा’ माना जाता था, लेकिन 1897 में रोनाल्ड रॉस ने इसे मच्छर जनित रोग सिद्ध किया।
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शाहजहांपुर के उत्तरी जंगलों और अवसादयुक्त जलधाराओं ने इन मच्छरों के पनपने में सहायता की, जिससे रोग की तीव्रता बढ़ी। जिले में बहने वाली उली नदी का नाम भी मलेरिया से होने वाले स्थानीय बुखार ’उल्ल’ पर रखा गया है। 1910 में प्रकाशित ब्रिटिश गजेटियर के अनुसार, 1881 से 1890 के बीच जिले में हुई दो-तिहाई मौतों का कारण मलेरिया था।
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पूरी सदी में इसकी विभीषिका तीव्र रही और लाखों लोग इसका शिकार बने। वर्ष 1920, 1931 और 1937 में इसे ‘महाविभीषिका’ घोषित किया गया था। आजादी के बाद भी इस बीमारी का कहर कम नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ गया।
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रोकथाम के शुरुआती प्रयास और शोध

डॉ. विकास खुराना ने बताया कि सर रोनाल्ड रॉस, जिन्हें 1902 में नोबेल पुरस्कार मिला था, ने 1897 में सिद्ध किया कि यह मच्छर जनित रोग है। उन्होंने अपनी सिकंदरा स्थित प्रयोगशाला के लिए शाहजहांपुर से भी मलेरिया के नमूने जुटाए थे। 1908 में उन्होंने एक विशेष पक्षी से कटवाकर मच्छरों की लार ग्रंथि से परजीवियों को अलग करने में सफलता पाई थी। ब्रिटिशकाल में सीतापुर आंख के अस्पताल से कुनैन का निशुल्क वितरण भी किया जाता था।

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आजादी के बाद का प्रकोप और सरकारी कदम

डॉ. विकास ने बताया कि आजादी के बाद भी मलेरिया का प्रकोप जारी रहा। वर्ष 1956 से 1960 तक जिले में मलेरिया रोकथाम के लिए सरकार ने विशेष प्रयास किए। इनमें कुनैन का वितरण, 12 प्रकार की दवाएं और रक्त परीक्षण शामिल थे। वर्ष 1984 में जिले में मलेरिया से छह सौ लोगों की मौत हुई, जिसकी चर्चा पूरे भारत में हुई थी। तत्कालीन जिलाधिकारी ललित श्रीवास्तव ने इस घटना के बाद चार डॉक्टरों को निलंबित कर दिया था। इस वर्ष जिले के 115 गांवों में लाखों लोग प्रभावित हुए थे।


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जिले में मलेरिया का कहर अब भी थमा नहीं है। वर्ष 1988 से 2019 तक लगभग 15 लाख लोग इससे संक्रमित हुए हैं। इस वर्ष भी मलेरिया के फैलने का खतरा बना हुआ है। भावलखेड़ा और ददरौल ब्लॉक के 45 गांवों को हॉट स्पॉट की श्रेणी में रखा गया है। जिले में मलेरिया के लिए वर्ष 1984 में एक शोध केंद्र स्थापित किया गया था, लेकिन बाद में वह बंद हो गया। इसे दोबारा शुरू करने के कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है।

-डॉ. विकास खुराना, इतिहास विभागाध्यक्ष एसएस कॉलेज
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