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शादी बारातों में दूध और खोया मिलना होगा मुश्किल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,शाहजहांपुर
Updated Thu, 08 Mar 2018 07:21 PM IST
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आज से कुछ वर्ष पहले गांवों से पशुओं के झुंड चरने के लिए जाया करते थे, लेकिन अब झुंड तो दूर तमाम लोगों के यहां तो पशुओं के दर्शन तक नहीं होते हैं। पशुओं की कमी के साथ दूध की समस्या भी बढ़ती गई। अब सहालगे शुरू हो चुकी हैं, लेकिन स्थित यह है कि शादी, बरातों के लिए दूधियों के पास एडवांस में ही बुकिंग हो चुकी है। जिन्होंने दूध और खोया मौके पर ही खरीदने की सोच रखी है उनके सामने भारी समस्या खड़ी होगी इसमें कोई संदेह नहीं है।
अब नहीं रही गौढ़ी
पुवायां। गौढ़ी का नाम सुनते ही आने वाली पीढ़ी उल्टा सवाल दाग देगी %गौढ़ी यह क्या होती है’। आज से लगभग 10-15 वर्ष पहले जंगल में नदियों के किनारे गायों का झुंड रखा जाता था। ग्वाले भी गायों के साथ ही रहते थे। वहीं पर दूध का खोया बनाया जाता था। व्यापारी लोग गौढिय़ों पर आते और वहां से दूध और खोया खरीद कर ले जाते थे। लेकिन बढ़ती जनसंख्या और खेती के आधुनिक उपकरण आने के साथ ही नदियों के पास की जमीनों पर भी खेती होने लगी जिससे चारागाह समाप्त हो गए और गौढ़ी इतिहास की चीज बनकर रह गई।
कहां थी गौढ़ी
बंडा के गांव गहलुइया के भजन सिंह बताते है कि गांव के पास बराघाट, कठउ पुल, नवदिया बंकी गांव के अलावा मकसूदापुर बैरियर के पास गौढ़ी हुआ करती थी। यहां से डेढ़ रुपए किलो दूध और पांच रुपये में खोया मिला करता था। बरा घाट पर बाबूराम की मशहूर गौढ़ी थी। पशुपालक पुवायां निवासी हरीश्याम बताते है कि 18 वर्ष की आयु में वह 122 पशुओं को चराने ले जाते थे। अब तो दस पशुओं को भी चराने की जगह नहीं बची है।
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अब नहीं रही गौढ़ी
पुवायां। गौढ़ी का नाम सुनते ही आने वाली पीढ़ी उल्टा सवाल दाग देगी %गौढ़ी यह क्या होती है’। आज से लगभग 10-15 वर्ष पहले जंगल में नदियों के किनारे गायों का झुंड रखा जाता था। ग्वाले भी गायों के साथ ही रहते थे। वहीं पर दूध का खोया बनाया जाता था। व्यापारी लोग गौढिय़ों पर आते और वहां से दूध और खोया खरीद कर ले जाते थे। लेकिन बढ़ती जनसंख्या और खेती के आधुनिक उपकरण आने के साथ ही नदियों के पास की जमीनों पर भी खेती होने लगी जिससे चारागाह समाप्त हो गए और गौढ़ी इतिहास की चीज बनकर रह गई।
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कहां थी गौढ़ी
बंडा के गांव गहलुइया के भजन सिंह बताते है कि गांव के पास बराघाट, कठउ पुल, नवदिया बंकी गांव के अलावा मकसूदापुर बैरियर के पास गौढ़ी हुआ करती थी। यहां से डेढ़ रुपए किलो दूध और पांच रुपये में खोया मिला करता था। बरा घाट पर बाबूराम की मशहूर गौढ़ी थी। पशुपालक पुवायां निवासी हरीश्याम बताते है कि 18 वर्ष की आयु में वह 122 पशुओं को चराने ले जाते थे। अब तो दस पशुओं को भी चराने की जगह नहीं बची है।
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