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राष्ट्रीय युवा दिवस :: वकालत छोड़कर अपनाई खस की खेती
Fri, 12 Jan 2024 01:09 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
Updated Fri, 12 Jan 2024 01:09 AM IST
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मिर्जापुर के किसान जितेंद्र मोहन अग्निहोत्री। संवाद
मिर्जापुर। नौकरी के लिए बड़े शहरों की ओर रुख करने वाले युवाओं के लिए मिर्जापुर के गाजीपुर चिकटिया गांव के जितेंद्र मोहन अग्निहोत्री नजीर हैं। वकालत की पढ़ाई के बाद खेती को व्यवसाय बनाने वाले जितेंद्र अब किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के पैकेज से ज्यादा कमाई कर रहे हैं। जितेंद्र की उपलब्धि इसलिए भी खास हो जाती है, क्योंकि उन्होंने कटरी के उस क्षेत्र में औषधीय फसलों की खेती की है जो हर साल रामगंगा की बाढ़ से प्रभावित होता है।
मिर्जापुर ब्लॉक के ग्राम गाजीपुर चिकटिया निवासी जितेंद्र मोहन अग्निहोत्री ने एमए, एलएलबी की पढ़ाई की है। उनके पिता उमेशचंद्र अग्निहोत्री के पास कटरी में 20 बीघा एक फसलीय खेती थी। इससे परिवार का गुजारा मुश्किल से हो रहा था। पिता चाहते थे कि बेटा वकालत करके परिवार की मदद करे, लेकिन जितेंद्र को वकालत का पेशा रास नहीं आया।
जितेंद्र ने बताया कि 20 बीघा कृषि भूमि में रामगंगा नदी में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ के कारण एक ही फसल हो पाती थी। वर्ष 2015 में वह पिता के साथ हरिद्वार घूमने गए थे। पतंजलि संस्थान में औषधीय फसलों की खेती और बिक्री आदि की जानकारी की। उस समय वहां अकरकरा की बहुत मांग थी। उसने 10 बीघा खेत में अकरकरा की खेती की। इसमें 30 हजार रुपये प्रति बीघा का लाभ हुआ। अगले वर्ष 20 बीघा में अकरकरा की खेती की। उसने पांच वर्ष की मेहनत से रामगंगा के खादर में करीब 150 बीघा जमीन खरीद ली। 2020 में अकरकरा की पैदावार घट गई तो खस की खेती शुरू कर दी। खस की फसल को छुट्टा पशुओं से भी नुकसान नहीं है।
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इस वर्ष 150 बीघा खेत में फसल की है। इसका बाजार भाव 25 से 30 हजार रुपये प्रति किलो मिल जाता है। जितेंद्र के मुताबिक खस की जड़ से तेल निकलता है। सबसे ऊपर का हिस्सा प्लांट की भट्टी में जलाने के काम आता है। तेल की बिक्री की सबसे बड़ी मंडी बाराबंकी और कन्नौज में है। इससे वह सालाना 30 से 35 लाख रुपये कमा रहे हैं और करीब 50-60 मजदूरों को प्रतिवर्ष लगभग पांच माह तक रोजगार भी दे रहे हैं।
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मिर्जापुर ब्लॉक के ग्राम गाजीपुर चिकटिया निवासी जितेंद्र मोहन अग्निहोत्री ने एमए, एलएलबी की पढ़ाई की है। उनके पिता उमेशचंद्र अग्निहोत्री के पास कटरी में 20 बीघा एक फसलीय खेती थी। इससे परिवार का गुजारा मुश्किल से हो रहा था। पिता चाहते थे कि बेटा वकालत करके परिवार की मदद करे, लेकिन जितेंद्र को वकालत का पेशा रास नहीं आया।
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जितेंद्र ने बताया कि 20 बीघा कृषि भूमि में रामगंगा नदी में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ के कारण एक ही फसल हो पाती थी। वर्ष 2015 में वह पिता के साथ हरिद्वार घूमने गए थे। पतंजलि संस्थान में औषधीय फसलों की खेती और बिक्री आदि की जानकारी की। उस समय वहां अकरकरा की बहुत मांग थी। उसने 10 बीघा खेत में अकरकरा की खेती की। इसमें 30 हजार रुपये प्रति बीघा का लाभ हुआ। अगले वर्ष 20 बीघा में अकरकरा की खेती की। उसने पांच वर्ष की मेहनत से रामगंगा के खादर में करीब 150 बीघा जमीन खरीद ली। 2020 में अकरकरा की पैदावार घट गई तो खस की खेती शुरू कर दी। खस की फसल को छुट्टा पशुओं से भी नुकसान नहीं है।
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इस वर्ष 150 बीघा खेत में फसल की है। इसका बाजार भाव 25 से 30 हजार रुपये प्रति किलो मिल जाता है। जितेंद्र के मुताबिक खस की जड़ से तेल निकलता है। सबसे ऊपर का हिस्सा प्लांट की भट्टी में जलाने के काम आता है। तेल की बिक्री की सबसे बड़ी मंडी बाराबंकी और कन्नौज में है। इससे वह सालाना 30 से 35 लाख रुपये कमा रहे हैं और करीब 50-60 मजदूरों को प्रतिवर्ष लगभग पांच माह तक रोजगार भी दे रहे हैं।