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साहित्य के भी पुरोधा थे अंचल
अजय अवस्थी/ शाहजहांपुर।
Updated Mon, 23 Mar 2015 10:58 PM IST
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देश में ऐसे बिरले लोग ही हैं जो राजनीति और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ने में कामयाब हुए हों। कांग्रेस के दिग्गजों में शुमार राममूर्ति ‘अंचल’ इन बिरले लोगों में से ही थे। जिले के कांग्रेसी तो उन्हें कबका भुला चुके हैं, लेकिन घरवालों को वह याद रहते हैं। अंचल, जमौर विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे।
बात 1962 की है, जब राममूर्ति अंचल ने जमौर विधानसभा सीट से पहला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और विजयी हुए। इसके बाद 1967 और 1969 का चुनाव भी वह इसी विधानसभा क्षेत्र से जीते। अंचल की सबसे बड़ी खासियत थी कि एक बार जो उनसे मिल लेता था वह उनका ही होकर रह जाता था। ऐसा उनके पत्रों के संग्रह से भी पता चलता है। अंचल के पुत्र आलोक के पास राष्ट्रीय कवि मैथिली शरण गुप्त, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला आदि के वे पत्र सुरक्षित हैं, जो देश के इन चोटी के साहित्यकारों ने अंचल को लिखे थे। इन पत्रों से ही अंचल के साहित्यिक क्षेत्र में भी खास मुकाम होने का संकेत मिलता है।
राजनीतिक व्यस्तता के बावजूद अंचल साहित्यिक गतिविधियों में लगातार हिस्सा लेते रहे। उनकी दो कृतियां ‘अचला’ और ‘गांव के बोल’ भी प्रकाशित हुईं। उनके दो उपन्यास अप्रकाशित हैं। राजनीति की बात करें तो अंचल की पहुंच देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक थी। उनमें साहित्य के प्रति प्रेम राजनीति में आने से बहुत पहले रच-बस चुका था। इसका पता इस बात से चलता है कि उनकी पहली कृति ‘अचला’ 1956 में प्रकाशित हो चुकी थी।
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सुनील मूर्ति अंचल पिता की स्मृतियों को साहित्यकारों में बांटने का काम करने जा रहे है। अंचल की पुण्यतिथि पर यानी 24 मार्च को गांधी पुस्तकालय में होने वाले स्मृति समारोह में रचनाधर्मिता के लिए श्रेष्ठ लोगों को सम्मानित किया जाएगा। एक साहित्यकार के लिए इससे अच्छी श्रद्धांजलि और हो भी क्या सकती है।
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बात 1962 की है, जब राममूर्ति अंचल ने जमौर विधानसभा सीट से पहला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और विजयी हुए। इसके बाद 1967 और 1969 का चुनाव भी वह इसी विधानसभा क्षेत्र से जीते। अंचल की सबसे बड़ी खासियत थी कि एक बार जो उनसे मिल लेता था वह उनका ही होकर रह जाता था। ऐसा उनके पत्रों के संग्रह से भी पता चलता है। अंचल के पुत्र आलोक के पास राष्ट्रीय कवि मैथिली शरण गुप्त, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला आदि के वे पत्र सुरक्षित हैं, जो देश के इन चोटी के साहित्यकारों ने अंचल को लिखे थे। इन पत्रों से ही अंचल के साहित्यिक क्षेत्र में भी खास मुकाम होने का संकेत मिलता है।
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राजनीतिक व्यस्तता के बावजूद अंचल साहित्यिक गतिविधियों में लगातार हिस्सा लेते रहे। उनकी दो कृतियां ‘अचला’ और ‘गांव के बोल’ भी प्रकाशित हुईं। उनके दो उपन्यास अप्रकाशित हैं। राजनीति की बात करें तो अंचल की पहुंच देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक थी। उनमें साहित्य के प्रति प्रेम राजनीति में आने से बहुत पहले रच-बस चुका था। इसका पता इस बात से चलता है कि उनकी पहली कृति ‘अचला’ 1956 में प्रकाशित हो चुकी थी।
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सुनील मूर्ति अंचल पिता की स्मृतियों को साहित्यकारों में बांटने का काम करने जा रहे है। अंचल की पुण्यतिथि पर यानी 24 मार्च को गांधी पुस्तकालय में होने वाले स्मृति समारोह में रचनाधर्मिता के लिए श्रेष्ठ लोगों को सम्मानित किया जाएगा। एक साहित्यकार के लिए इससे अच्छी श्रद्धांजलि और हो भी क्या सकती है।