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क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र थी अजीजगंज धर्मशाला
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शाहजहांपुर। चौक कोतवाली क्षेत्र में स्थित अजीजगंज धर्मशाला शाहजहांपुर में आजादी के आंदोलन की एक प्रमुख घटना की साक्षी है। शहर में क्रांतिकारियों की गतिविधि का केंद्र होने के कारण ब्रिटिश हुकूमत की निगाह इस स्थान पर रहती थी। 1931 में यहां पर बम फटने से अंग्रेजों में खलबली मच गई थी।
इतिहासकार डॉ. नानक चंद मेहरोत्रा के मुताबिक 1928 में निर्मित अजीजगंज की धर्मशाला में 17 फरवरी 1931 में एक बम का फटना अभूतपूर्व घटना थी। वास्तविकता यह थी कि क्रांतिकारी सुदामा प्रसाद की पोटली में एक बम छिपा हुआ था। कहा जाता है कि सुदामा प्रसाद दीर्घशंका महसूस करने के कारण पोटली को रखकर धर्मशाला की सीढ़ियों से नीचे भागे। एक बंदर ने पोटली उठा ली और सूंघकर फेंक दी। पोटली गिरते ही बम फट गया तथा सुदामा प्रसाद घायल हो गए।
पुलिस जो पहले से ही सशंकित थी, अचानक सक्रिय हो गई। सुदामा प्रसाद के कब्जे से एक रिवाल्वर तथा बम बनाने की सामग्री बरामद हुई। गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट के अनुसार फर्रुखाबाद में सुदामा प्रसाद चंद्रशेखर आजाद और योगेशचंद्र चटर्जी से मिले थे। इस बम कांड में पुलिस ने सुदामा प्रसाद के अलावा बाबूराम शुक्ला, राजबहादुर सक्सेना, देवनारायण भारतीय, ठाकुर गंगा सिंह, विष्णुस्वरूप और फखरुद्दीन को गिरफ्तार किया।
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इंडियन पैनल कोड की धारा 121 अ, 120 ब, व 19 के अंतर्गत मुकदमा चलाया। इस बम कांड के अभियुक्त फखरुद्दीन को तो इतना आतंकित किया गया कि वे सरकारी गवाह बन गए और उन्होंने अदालत में सनसनीखेज बयान देकर वास्तविक तथ्यों को सामने रख दिया। 27 जून 1932 को सेशन जज पीसी अग्रवाल ने सुदामा प्रसाद को दस वर्ष, बाबूराम को सात वर्ष और राजबहादुर को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी। देवनारायण भारतीय, ठाकुर गंगा सिंह तथा विष्णु स्वरूप भारतीय पर अभियोग सिद्ध न होने के कारण छोड़ दिया गया। वास्तविकता यह है कि बमकांड के पूर्व से ही वे जेल में थे। 1937 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मंत्रिमंडल ने तीनों को छोड़ दिया।
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इतिहासकार डॉ. नानक चंद मेहरोत्रा के मुताबिक 1928 में निर्मित अजीजगंज की धर्मशाला में 17 फरवरी 1931 में एक बम का फटना अभूतपूर्व घटना थी। वास्तविकता यह थी कि क्रांतिकारी सुदामा प्रसाद की पोटली में एक बम छिपा हुआ था। कहा जाता है कि सुदामा प्रसाद दीर्घशंका महसूस करने के कारण पोटली को रखकर धर्मशाला की सीढ़ियों से नीचे भागे। एक बंदर ने पोटली उठा ली और सूंघकर फेंक दी। पोटली गिरते ही बम फट गया तथा सुदामा प्रसाद घायल हो गए।
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पुलिस जो पहले से ही सशंकित थी, अचानक सक्रिय हो गई। सुदामा प्रसाद के कब्जे से एक रिवाल्वर तथा बम बनाने की सामग्री बरामद हुई। गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट के अनुसार फर्रुखाबाद में सुदामा प्रसाद चंद्रशेखर आजाद और योगेशचंद्र चटर्जी से मिले थे। इस बम कांड में पुलिस ने सुदामा प्रसाद के अलावा बाबूराम शुक्ला, राजबहादुर सक्सेना, देवनारायण भारतीय, ठाकुर गंगा सिंह, विष्णुस्वरूप और फखरुद्दीन को गिरफ्तार किया।
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इंडियन पैनल कोड की धारा 121 अ, 120 ब, व 19 के अंतर्गत मुकदमा चलाया। इस बम कांड के अभियुक्त फखरुद्दीन को तो इतना आतंकित किया गया कि वे सरकारी गवाह बन गए और उन्होंने अदालत में सनसनीखेज बयान देकर वास्तविक तथ्यों को सामने रख दिया। 27 जून 1932 को सेशन जज पीसी अग्रवाल ने सुदामा प्रसाद को दस वर्ष, बाबूराम को सात वर्ष और राजबहादुर को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी। देवनारायण भारतीय, ठाकुर गंगा सिंह तथा विष्णु स्वरूप भारतीय पर अभियोग सिद्ध न होने के कारण छोड़ दिया गया। वास्तविकता यह है कि बमकांड के पूर्व से ही वे जेल में थे। 1937 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मंत्रिमंडल ने तीनों को छोड़ दिया।