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मेहनत की तो सोना उगलने लगी बंजर जमीन
ब्यूरो, अमर उजाला शाहजहांपुर
Updated Mon, 17 Oct 2016 12:13 AM IST
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हरी भरी जमीन
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पुवायां। मेहनतकशों के जोश और जज्बे को सलाम। जो जमीन जानवरों के चरने लायक तक नहीं थी वह आज इनकी मेहनत के चलते सोना उगल रही है। हालांकि सरकारी उपेक्षा से मेहनतकश किसान निराश हैं। सरकारी सहायता मिलना तो दूर बैंक आदि से कर्ज लेने में भी उन्हें भारी परेशानियां उठानी पड़ती हैं। हालांकि यह निराशा उनके जोश और जज्बे के बीच आड़े नहीं आती है।
तहसील क्षेत्र के गांव महमूदपुर सैंजनियां, औरंगाबाद, महोलिया वीरान, लाह वीरान, मैनियां, सुजानपुर, टोडरपुर, झदिया, टाह खुर्द कलां, दिलीपपुर, भीमपुर, कैमहरिया, लक्ष्मीपुर, चमरोबोझी, बिजौरा-बिजौरिया, खंडसार सहित तमाम गांवों के आसपास की जमीन काफी ऊंची, नीची और बंजर थी। रेतीली इतनी कि गर्मी के मौसम में रेगिस्तान की तरह रेत के टीले जगह बदलते रहते थे। कुछ वर्ष पूर्व यहां कोई भी फसल उगाने की सोचना आसमान से तारे तोड़ने जैसा था।
एक समय था जब यहां हजारों एकड़ भूमि खाली पड़ी रहती थी। संसाधनों के अभाव और परंपरागत खेती किए जाने के कारण लाभ कम ही हो पाता था। धान की जगह धानी बोते थे जो बेड़ डालकर पौध लगाने की बजाय ऐसे ही बो दी जाती थी। बारिश के सहारे जो हो जाता था, उसी में संतोष करना पड़ता था। गेहूं बोने के लिए खेत को वर्ष भर खाली रखकर तैयार किया जाता था। अब खेत किसी भी समय खाली नहीं रहता है। वर्ष भर में तीन फसलें पैदा की जा रही हैं। गेहूं, धान, गन्ने के अलावा, खरबूजा, तरबूज, मटर, आलू, खीरा सहित कई सब्जियों की खेती बहुतायत में है। अब यह जमीन किसानों की मेहनत से सोना उगल रही है। इस जमीन को समतल और उपजाऊ बनाने में पंजाब से आकर बसे सिख फार्मर और गोरखपुर के मेहनतकश श्रमिकों का खासा योगदान है। सिख फार्मर्स ने खेती में वैज्ञानिक तरीके और मशीनरी युग की शुरूआत की। ऊबड़-खाबड़ और रेतीली जमीनों को खरीदने के बाद सबसे पहले दिन-रात मेहनत कर इन्हें समतल करने का काम किया। बाद में सिंचाई के साधनों को बढ़ाकर जमीन को उपजाऊ बना दिया गया।
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यहां हैं आलू किंग
नत्थापुर क्षेत्र में आलू की बड़े भूभाग पर खेती करने के कारण यहां के फार्मर अमरजीत सिंह को आलू किंग कहां जाता है। इसके अलावा कई प्रगतिशील किसान परंपरागत खेती को त्याग कर नई इबारत लिख रहे हैं। गुटैया स्थित एमएम फार्म पर फूलों की खेती की शुरूआत की गई है।
सरकार और प्रशासन के रवैये से निराशा
मेहनतकश किसान सरकार ओर प्रशासन के रवैये से बहुत निराश हैं। पिछले वर्ष ओलावृष्टि और सूखे के कारण किसानों को भारी घाटा हुआ था। सर्वे भी किया गया लेकिन सहायता के नाम पर तमाम किसानों को अभी तक एक रुपये का मुआवजा नहीं मिल सका है। इस वर्ष भी बारिश कम होने से धान की फसल में सिंचाई पर भारी खर्च आया। खेती में भारी लागत के कारण किसानों को बैंक आदि से कर्ज लेना पड़ता है, यहां भी उनका जमकर शोषण किया जाता है।
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तहसील क्षेत्र के गांव महमूदपुर सैंजनियां, औरंगाबाद, महोलिया वीरान, लाह वीरान, मैनियां, सुजानपुर, टोडरपुर, झदिया, टाह खुर्द कलां, दिलीपपुर, भीमपुर, कैमहरिया, लक्ष्मीपुर, चमरोबोझी, बिजौरा-बिजौरिया, खंडसार सहित तमाम गांवों के आसपास की जमीन काफी ऊंची, नीची और बंजर थी। रेतीली इतनी कि गर्मी के मौसम में रेगिस्तान की तरह रेत के टीले जगह बदलते रहते थे। कुछ वर्ष पूर्व यहां कोई भी फसल उगाने की सोचना आसमान से तारे तोड़ने जैसा था।
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एक समय था जब यहां हजारों एकड़ भूमि खाली पड़ी रहती थी। संसाधनों के अभाव और परंपरागत खेती किए जाने के कारण लाभ कम ही हो पाता था। धान की जगह धानी बोते थे जो बेड़ डालकर पौध लगाने की बजाय ऐसे ही बो दी जाती थी। बारिश के सहारे जो हो जाता था, उसी में संतोष करना पड़ता था। गेहूं बोने के लिए खेत को वर्ष भर खाली रखकर तैयार किया जाता था। अब खेत किसी भी समय खाली नहीं रहता है। वर्ष भर में तीन फसलें पैदा की जा रही हैं। गेहूं, धान, गन्ने के अलावा, खरबूजा, तरबूज, मटर, आलू, खीरा सहित कई सब्जियों की खेती बहुतायत में है। अब यह जमीन किसानों की मेहनत से सोना उगल रही है। इस जमीन को समतल और उपजाऊ बनाने में पंजाब से आकर बसे सिख फार्मर और गोरखपुर के मेहनतकश श्रमिकों का खासा योगदान है। सिख फार्मर्स ने खेती में वैज्ञानिक तरीके और मशीनरी युग की शुरूआत की। ऊबड़-खाबड़ और रेतीली जमीनों को खरीदने के बाद सबसे पहले दिन-रात मेहनत कर इन्हें समतल करने का काम किया। बाद में सिंचाई के साधनों को बढ़ाकर जमीन को उपजाऊ बना दिया गया।
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यहां हैं आलू किंग
नत्थापुर क्षेत्र में आलू की बड़े भूभाग पर खेती करने के कारण यहां के फार्मर अमरजीत सिंह को आलू किंग कहां जाता है। इसके अलावा कई प्रगतिशील किसान परंपरागत खेती को त्याग कर नई इबारत लिख रहे हैं। गुटैया स्थित एमएम फार्म पर फूलों की खेती की शुरूआत की गई है।
सरकार और प्रशासन के रवैये से निराशा
मेहनतकश किसान सरकार ओर प्रशासन के रवैये से बहुत निराश हैं। पिछले वर्ष ओलावृष्टि और सूखे के कारण किसानों को भारी घाटा हुआ था। सर्वे भी किया गया लेकिन सहायता के नाम पर तमाम किसानों को अभी तक एक रुपये का मुआवजा नहीं मिल सका है। इस वर्ष भी बारिश कम होने से धान की फसल में सिंचाई पर भारी खर्च आया। खेती में भारी लागत के कारण किसानों को बैंक आदि से कर्ज लेना पड़ता है, यहां भी उनका जमकर शोषण किया जाता है।