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Shahjahanpur News: दंपती की एक साथ अर्थियां उठीं तो बिलख पड़े परिजन
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अमर सिंह का फाइल फोटो। स्रोत: परिजन
जलालाबाद। कसारी गांव में अमर सिंह और उनकी पत्नी कुसुमा देवी की एक साथ अर्थियां उठने पर उनके परिजन बिलख उठे। दंपती के बच्चों का करुण क्रंदन देख-सुनकर लोगों के सांत्वना भरे शब्द भी रुंधे गले में दब गए और हर आंख नम हो उठी। कोलाघाट पुल के पास रामगंगा तट पर गमगीन माहौल में दंपती का एक ही चिता पर अंतिम संस्कार किया गया।
शुक्रवार की रात करीब दस बजे फर्राटा पंखे में उतरे करंट की चपेट में आकर दंपती की मौत हो गई थी। शनिवार को पोस्टमाॅर्टम के बाद देर शाम दोनों के शव घर पहुंचे तो परिजन चीत्कार कर उठे। बच्चों के रोने से माहौल इतना हृदय विदारक हो गया कि घर वालों को सांत्वना देने वाले लोग भी सुबकने लगे।
एक साथ दोनों की अर्थियां उठने पर माहौल भावुक हो उठा। रामगंगा के किनारे एक ही चिता सजाकर उस पर दोनों शव रखे गए। चिता पर लेटे माता-पिता को मुखाग्नि देने के लिए दंपती का 12 वर्षीय बड़़ा बेटा नितिन आगे बढ़ा। तब उसके ताऊ प्रेमचंद्र ने उसे संभालते हुए चिता को अग्नि देने की रस्म पूरी कराई।
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प्रेमचंद्र ने बताया कि भाई अमर सिंह के पांचों बच्चे रात को उनके घर पर ही रहे, लेकिन माता-पिता को याद कर पूरी रात जागकर सुबकते रहे। अमर सिंह पांच भाइयों में सबसे छोटे थे और मात्र दो बीघा खेती से गुजर-बसर नहीं हो पाने के कारण वह पत्नी और सभी बच्चों को लेकर कई साल से राजस्थान जाकर एक ईंट भट्ठे पर मजदूरी करने लगे थे।
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शुक्रवार की रात करीब दस बजे फर्राटा पंखे में उतरे करंट की चपेट में आकर दंपती की मौत हो गई थी। शनिवार को पोस्टमाॅर्टम के बाद देर शाम दोनों के शव घर पहुंचे तो परिजन चीत्कार कर उठे। बच्चों के रोने से माहौल इतना हृदय विदारक हो गया कि घर वालों को सांत्वना देने वाले लोग भी सुबकने लगे।
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एक साथ दोनों की अर्थियां उठने पर माहौल भावुक हो उठा। रामगंगा के किनारे एक ही चिता सजाकर उस पर दोनों शव रखे गए। चिता पर लेटे माता-पिता को मुखाग्नि देने के लिए दंपती का 12 वर्षीय बड़़ा बेटा नितिन आगे बढ़ा। तब उसके ताऊ प्रेमचंद्र ने उसे संभालते हुए चिता को अग्नि देने की रस्म पूरी कराई।
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प्रेमचंद्र ने बताया कि भाई अमर सिंह के पांचों बच्चे रात को उनके घर पर ही रहे, लेकिन माता-पिता को याद कर पूरी रात जागकर सुबकते रहे। अमर सिंह पांच भाइयों में सबसे छोटे थे और मात्र दो बीघा खेती से गुजर-बसर नहीं हो पाने के कारण वह पत्नी और सभी बच्चों को लेकर कई साल से राजस्थान जाकर एक ईंट भट्ठे पर मजदूरी करने लगे थे।

अमर सिंह का फाइल फोटो। स्रोत: परिजन