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पुलिस चाहती तो रोक सकती थी महिलाओं की बेइज्जती
संजीव पाठक/शाहजहांपुर।
Updated Wed, 20 May 2015 12:04 AM IST
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हरेवा में निर्लज्जता की हदें पार कर मानवता को शर्मसार करने वाली घटना तात्कालिक नहीं थी। इसे बाकायदा योजना बनाकर अंजाम दिया गया था। शुक्रवार की रात बड़े हरेवा में एक पूर्व प्रधान के यहां बिरादरी वाले जुटे थे। यहीं बेइज्जती के बदले बेइज्जती की रणनीति बनाई गई थी। इसे अंजाम देने के लिए पड़ोसी गांव छोटे हरेवा में भी बिरादरी के लोगों को खबर दी गई थी। हैवानियत की हदें पार करने वाली इस घटना में पुलिस की लापरवाही भी हिस्सेदार रही। अगर पुलिस मौके से एक्शन लेती तो इस तरह की शर्मनाक घटना रोकी जा सकती थी।
कश्यप बिरादरी की लड़की के दलित (धानुक) बिरादरी के लड़के के साथ जाने को लड़की के परिवार वालों ने ही नहीं बल्कि उनकी बिरादरी ने ही अपनी इज्जत पर बट्टा माना। पुलिस से यहीं चूक हुई। लड़की गुरुवार की रात गांव से गई थी। उसके घरवालों ने शुक्रवार सुबह थाने जाकर तहरीर दी। इसमें दिखाया कि मां के साथ शौच को जाते समय संतोष, उसके पिता भोले और चाचा रामू समेत छह लोगों ने उसका अपहरण कर लिया। तहरीर मिलने के बाद भी पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी और आदतन लड़की के पिता को ही इसके लिए जिम्मेदार बताते हुए खूब भला-बुरा कह डाला।
पुलिस के व्यवहार से आहत लड़की का पिता गांव लौट आया। बिरादरी के लोगों को जब यह पता चला तब दलित महिलाओं की बेइज्जती की घटना की पटकथा लिखी गई। शुक्रवार की शाम को ही एक पूर्व प्रधान के यहां बिरादरी के लोग जुटे और बेइज्जती के बदले बेइज्जती की रणनीति बनाई। कैसे, क्या करना है यह सब तय होने के बाद पड़ोसी गांव छोटे हरेवा में भी बिरादरी के लोगों को सूचना दे दी गई।
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पुलिस अपने बचने का रास्ता तलाश रही थी...
पुलिस को दोपहर के वक्त ही दलित महिलाओं को नंगा कर गांव में घुमाने की घटना का पता लग गया था, लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करने के बजाय पहले अपने बचाव के रास्ते तलाश किए। सबसे पहले तो पुलिस ने आनन-फानन में लड़की के पिता की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज की। हालांकि इसमें भी खेल किया गया। लड़की के पिता ने छह लोगों को नामजद करते हुए तहरीर दी थी, लेकिन पुलिस ने सिर्फ तीन लोगों संतोष, उसके पिता भोले और चाचा रामू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की। खास बात यह रही कि पुलिस ने यह रिपोर्ट महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने की घटना के साढ़े आठ घंटे बाद लिखी। हालांकि अधिकारियों को यह बताया गया कि रिपोर्ट शुक्रवार को ही लिख ली गई थी। महिलाओं को नंगा कर घुमाने के बाद जब पुलिस अफसरों ने मामले की तहकीकात की तो जलालाबाद पुलिस का यह झूठ पकड़ में आ गया। इसके आधार पर ही कोतवाल शक्ति सिंह तोमर और हलका इंचार्ज महीपाल को निलंबित किया गया।
शाम चार बजे तक गांव में ही मौजूद थे आरोपी
शाहजहांपुर। मीडिया से जुड़े लोग घटना की जानकारी मिलने पर शनिवार को शाम करीब चार बजे गांव पहुंच गए थे। उस वक्त तक पुलिस गांव नहीं पहुंची थी। अखबार वाले जब पीड़ित दलित महिलाओं से बात कर रहे थे, तभी पूर्व प्रधान समेत कश्यप बिरादरी के कई लोग वहां आ गए। इन लोगों ने अखबार वालों से काफी बहस भी की। उनके परिवार की महिलाएं भी उस वक्त तक गांव में ही मौजूद थीं।
शनिवार को शाम 4.30 बजे लिखी लड़की भगाने की रिपोर्ट
इसी दिन शाम 6.35 पर लिखी गई महिलाओं की बेइज्जती की रिपोर्ट
शाहजहांपुर। जलालाबाद पुलिस ने खुद को बचाने के जतन तो बहुत किए लेकिन दांव उल्टा ही पड़ गया। महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने की घटना शनिवार सुबह आठ बजे के करीब हुई थी लेकिन पुलिस को शाम करीब चार बजे इसकी जानकारी हुई तो उसके हाथ-पांव फूल गए। उसने आनन-फानन पहले लड़की के पिता की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज की। जीडी में 16 मई, 2015 (शनिवार) को यह रिपोर्ट दर्ज होने का समय 16.30 बजे अंकित है। इस घटना के बाद पुलिस अफसरों ने मीडिया से यही कहा था कि दरोगा महीपाल दोपहर के वक्त जब लड़की भगाने के मामले में पूछताछ करने गांव पहुंचे तो उन्हें दलित महिला के साथ अमानवीयता की जानकारी हुई थी। यहां सवाल यह उठता है कि जब लड़की भगाने की रिपोर्ट ही शाम 4.30 बजे हुई थी तो फिर दरोगा उसकी विवेचना करने दोपहर में कैसे गांव पहुंच गया।
पुलिस ने दलित महिलाओं को नंगा कर घुमाने की रिपोर्ट शनिवार को शाम 6.35 बजे दर्ज की। यानी पुलिस रिकार्ड में दोनों घटनाओं के बीच 2.05 घंटे का अंतर रहा, जबकि हकीकत में लड़की भगाने और महिलाओं को बेइज्जत करने की घटनाओं के बीच 35 घंटे का अंतराल था।
मलाल काहे का, बेइज्जती का बदला लिया
शाहजहांपुर। अखबार वालों ने जब पूर्व प्रधान से घटना के बारे में पूछा था तो उसने साफ कहा था कि उसे अपने किए पर न तो कोई पछतावा है और न कोई मलाल। उसने बिरादरी में हुई अपनी बेइज्जती का बदला लिया है। पुलिस अगर अपने बचाव के रास्ते तलाशने के बजाय तुरंत गांव पहुंच जाती तो सारे अभियुक्त पकड़े जा सकते थे।
सामाजिक ताना-बाना भी जिम्मेदार....
दलित महिलाओं के साथ वहशियाना बर्ताव करने वालों की मानसिकता समझने के लिए गांवों के सामाजिक ताने-बाने को भी समझना होगा। गांवों में आज भी अंतर्जातीय संबंध वर्जनीय हैं। गांवों में इस वर्जना के अतिक्रमण को सहज नहीं लिया जाता। गांवों के लिए यह इतना संवेदनशील मुद्दा है कि लोग इसे अपनी आन, वान, शान से जोड़कर देखते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ।
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कश्यप बिरादरी की लड़की के दलित (धानुक) बिरादरी के लड़के के साथ जाने को लड़की के परिवार वालों ने ही नहीं बल्कि उनकी बिरादरी ने ही अपनी इज्जत पर बट्टा माना। पुलिस से यहीं चूक हुई। लड़की गुरुवार की रात गांव से गई थी। उसके घरवालों ने शुक्रवार सुबह थाने जाकर तहरीर दी। इसमें दिखाया कि मां के साथ शौच को जाते समय संतोष, उसके पिता भोले और चाचा रामू समेत छह लोगों ने उसका अपहरण कर लिया। तहरीर मिलने के बाद भी पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी और आदतन लड़की के पिता को ही इसके लिए जिम्मेदार बताते हुए खूब भला-बुरा कह डाला।
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पुलिस के व्यवहार से आहत लड़की का पिता गांव लौट आया। बिरादरी के लोगों को जब यह पता चला तब दलित महिलाओं की बेइज्जती की घटना की पटकथा लिखी गई। शुक्रवार की शाम को ही एक पूर्व प्रधान के यहां बिरादरी के लोग जुटे और बेइज्जती के बदले बेइज्जती की रणनीति बनाई। कैसे, क्या करना है यह सब तय होने के बाद पड़ोसी गांव छोटे हरेवा में भी बिरादरी के लोगों को सूचना दे दी गई।
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पुलिस अपने बचने का रास्ता तलाश रही थी...
पुलिस को दोपहर के वक्त ही दलित महिलाओं को नंगा कर गांव में घुमाने की घटना का पता लग गया था, लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करने के बजाय पहले अपने बचाव के रास्ते तलाश किए। सबसे पहले तो पुलिस ने आनन-फानन में लड़की के पिता की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज की। हालांकि इसमें भी खेल किया गया। लड़की के पिता ने छह लोगों को नामजद करते हुए तहरीर दी थी, लेकिन पुलिस ने सिर्फ तीन लोगों संतोष, उसके पिता भोले और चाचा रामू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की। खास बात यह रही कि पुलिस ने यह रिपोर्ट महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने की घटना के साढ़े आठ घंटे बाद लिखी। हालांकि अधिकारियों को यह बताया गया कि रिपोर्ट शुक्रवार को ही लिख ली गई थी। महिलाओं को नंगा कर घुमाने के बाद जब पुलिस अफसरों ने मामले की तहकीकात की तो जलालाबाद पुलिस का यह झूठ पकड़ में आ गया। इसके आधार पर ही कोतवाल शक्ति सिंह तोमर और हलका इंचार्ज महीपाल को निलंबित किया गया।
शाम चार बजे तक गांव में ही मौजूद थे आरोपी
शाहजहांपुर। मीडिया से जुड़े लोग घटना की जानकारी मिलने पर शनिवार को शाम करीब चार बजे गांव पहुंच गए थे। उस वक्त तक पुलिस गांव नहीं पहुंची थी। अखबार वाले जब पीड़ित दलित महिलाओं से बात कर रहे थे, तभी पूर्व प्रधान समेत कश्यप बिरादरी के कई लोग वहां आ गए। इन लोगों ने अखबार वालों से काफी बहस भी की। उनके परिवार की महिलाएं भी उस वक्त तक गांव में ही मौजूद थीं।
शनिवार को शाम 4.30 बजे लिखी लड़की भगाने की रिपोर्ट
इसी दिन शाम 6.35 पर लिखी गई महिलाओं की बेइज्जती की रिपोर्ट
शाहजहांपुर। जलालाबाद पुलिस ने खुद को बचाने के जतन तो बहुत किए लेकिन दांव उल्टा ही पड़ गया। महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने की घटना शनिवार सुबह आठ बजे के करीब हुई थी लेकिन पुलिस को शाम करीब चार बजे इसकी जानकारी हुई तो उसके हाथ-पांव फूल गए। उसने आनन-फानन पहले लड़की के पिता की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज की। जीडी में 16 मई, 2015 (शनिवार) को यह रिपोर्ट दर्ज होने का समय 16.30 बजे अंकित है। इस घटना के बाद पुलिस अफसरों ने मीडिया से यही कहा था कि दरोगा महीपाल दोपहर के वक्त जब लड़की भगाने के मामले में पूछताछ करने गांव पहुंचे तो उन्हें दलित महिला के साथ अमानवीयता की जानकारी हुई थी। यहां सवाल यह उठता है कि जब लड़की भगाने की रिपोर्ट ही शाम 4.30 बजे हुई थी तो फिर दरोगा उसकी विवेचना करने दोपहर में कैसे गांव पहुंच गया।
पुलिस ने दलित महिलाओं को नंगा कर घुमाने की रिपोर्ट शनिवार को शाम 6.35 बजे दर्ज की। यानी पुलिस रिकार्ड में दोनों घटनाओं के बीच 2.05 घंटे का अंतर रहा, जबकि हकीकत में लड़की भगाने और महिलाओं को बेइज्जत करने की घटनाओं के बीच 35 घंटे का अंतराल था।
मलाल काहे का, बेइज्जती का बदला लिया
शाहजहांपुर। अखबार वालों ने जब पूर्व प्रधान से घटना के बारे में पूछा था तो उसने साफ कहा था कि उसे अपने किए पर न तो कोई पछतावा है और न कोई मलाल। उसने बिरादरी में हुई अपनी बेइज्जती का बदला लिया है। पुलिस अगर अपने बचाव के रास्ते तलाशने के बजाय तुरंत गांव पहुंच जाती तो सारे अभियुक्त पकड़े जा सकते थे।
सामाजिक ताना-बाना भी जिम्मेदार....
दलित महिलाओं के साथ वहशियाना बर्ताव करने वालों की मानसिकता समझने के लिए गांवों के सामाजिक ताने-बाने को भी समझना होगा। गांवों में आज भी अंतर्जातीय संबंध वर्जनीय हैं। गांवों में इस वर्जना के अतिक्रमण को सहज नहीं लिया जाता। गांवों के लिए यह इतना संवेदनशील मुद्दा है कि लोग इसे अपनी आन, वान, शान से जोड़कर देखते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ।