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Shahjahanpur News: सड़क निर्माण में टूटा बोर्ड, गुमनाम रह गया अमर बलिदानी का गांव

Fri, 26 Jul 2024 04:27 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर Updated Fri, 26 Jul 2024 04:27 AM IST
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Board broken during road construction, Amar Baidhani's village remained nameless
आवास विकास कॉलोनी में बना कारगिल शहीद रमेश चंद्र का स्मारक। संवाद
शाहजहांपुर। कारगिल के युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले शहीद रमेश चंद्र का गांव गुमनाम हाल में है। सड़क निर्माण में गांव की ओर जाने वाला बोर्ड तक टूट गया। इसी तरह उनके बेटे और बेटियां बड़ी होने के बाद भी रोजगार के लिए परेशान हैं। पत्नी सुनीता देवी ने बताया कि शहादत के समय सरकार ने नौकरी देने की बात कही थी। बच्चे लायक बनने पर कोई पूछने तक नहीं आया।
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26 जुलाई 1999 को पाकिस्तान से युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों को दुश्मन के कब्जे से छुड़ाकर अपने शौर्य की नई इबारत लिखी थी। इस युद्ध में मदनापुर क्षेत्र के गांव काबिलपुर निवासी सैनिक रमेश चंद्र भी बलिदान हो गए थे। वह 1991 में सेना की जाट रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्च पर तैनाती के दौरान पूरी हिम्मत के साथ दुश्मन से मोर्चा लिया था। 28 साल की उम्र में बलिदानी रमेश ने देशवासियों का सीना चौड़ा कर दिया। उनके बलिदान के बाद गांव में पार्क बनवाने के साथ ही अमर बलिदानी के नाम का बोर्ड लगवाया गया था। गांव की ओर जाने वाला बोर्ड सड़क निर्माण के दौरान टूट गया। इसके बाद किसी ने उसकी ओर मुड़कर नहीं देखा।
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शहीद की पत्नी सुनीता देवी बताती हैं कि गांव काबिलपुर को लोग शहीद के गांव के नाम से नहीं जानते हैं। बोर्ड गिरने के बाद दूसरा लगाने की जरूरत नहीं समझी। बताते हैं कि सरकारी अभिलेखों में इसे दर्ज नहीं किया गया।
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सरकार नहीं दे रही ध्यान
काबिलपुर गांव के प्रधान रहे चतुरी लाल के सबसे छोटे बेटे रमेश चंद्र की शहादत के समय उनकी बेटी मोनी, सोनी, आशीष कुमार, रोली और अशोक कुमार छोटे थे। उस समय सरकार ने शहीद के बच्चों को नौकरी देने की बात कही थी। सुनीता ने बताया कि उस समय बच्चे छोटे थे, तब सरकार ने नौकरी देने का वादा किया था। अब बेटे-बेटियां पढ़-लिखकर लायक बन गए हैं। सरकार को उनकी ओर ध्यान देना चाहिए।
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