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बारिश में दिखने लगे गौरेया की मौसी बया के घोसले
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पुवायां (शाहजहांपुर)। सबसे सुंदर घोंसला बनाने वाली और गौरैया प्रजाति का पक्षी ‘बया’ का अस्तित्व भी संकट में है। शिकार, पेड़ और झाड़ियां घटने के अलावा अन्य कारणों से यह पक्षी अब घटता ही जा रहा है। बारिश शुरू होते ही कुछ स्थानों पर बया के तूंबीनुमा घोंसले दिखने लगे हैं, लेकिन इनकी संख्या बेहद कम है।
बया अनोखा तुंबीनुमा घोंसला बनाने के लिए विख्यात है। घोंसला लौकीनुमा हवा में लटकता होता है। यह पुआल और मोटे पत्तों वाली घास के असंख्य तिनकों से खपच्चियां चीर कर बनाया जाता है। डेढ़ से दो फुट तक लंबे घोंसले में जाने के लिए एक लंबी नली सी होती है, जिसमें केवल ‘बया’ ही प्रवेश कर सकती है। ऐसा अंडों और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाता है। घोंसले में गीली मिट्टी से पलास्तर भी किया जाता है। बया गीली मिट्टी में जुगनू चिपका देती है। यह रात में चमकते हैं, जिससे घोंसले में रोशनी होती रहती है। आधुनिक विश्वकर्मा के नाम से मशहूर यह पक्षी अपने आशियाने को एक बार ही उपयोग करता है। बया अपने घोंसले में दूसरी मादाओं को भी अंडे देने और सेने के लिए आमंत्रित करती है। यह खूबी दूसरे किसी पक्षी में नहीं है।
ये है इसके अधूरे आसियानों का राज
पक्षी के जानकार बताते हैं कि बरसात की शुरुआत होते ही ‘बया’ का प्रणयकाल शुरू हो जाता है। प्रजनन काल के अलावा नर और मादा में कोई खास फर्क देखने को नहीं मिलता है। दोनों मादा गौरैया जैसे दिखते हैं। इनकी चोंच मोटी और पूंछ छोटी होती है। यह गौरेया की तरह ही चिट-चिट जैसे बोलते हैं। प्रणय काल में भूरे रंग के इस पक्षी का रंग इस दौरान गहरा पीला और पंख चमकीले हो जाते हैं। प्रजनन काल में नर सुखद आवाज निकालता है जिससे मादा बया उसकी ओर आकर्षित हो सके। बया एक मौसम में कई मादाओं से जोड़े बनाता है। इसी दौरान आशियाना बनाने का सिलसिला शुरू होता है। इसकी जिम्मेदारी नर पक्षी की होती है। आधा घोंसला बनने पर मादा उसका निरीक्षण करती है और पसंद नहीं आने पर रहने से इंकार कर देती है। नर फिर से दूसरा घोंसला बनाना शुरू कर देता है। यही कारण है कि तमाम घोंसले अधूरे लटके देखे जा सकते हैं। बेहतरीन घोंसला बनाने की कारीगरी के कारण इसे टेलर पक्षी भी कहा जाता है।
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गौरैया के साथ ही बया को भी बचाने के प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए सरकंडों, झाड़ियों, पेड़ों की कटाई-छटाई, शिकार आदि पर रोंक लगानी होगी। नहीं तो यह खूबसूरत पक्षी विलुप्त होते देर नहीं लगेगी।
इस समय पौधरोपण कार्यक्रम चल रहा है। पेड़ पौधे बढ़ने से पशु पक्षियों को संरक्षण मिलेगा और उनकी संख्या भी बढ़ेगी। बया के लिए अलग से संरक्षण योजना नहीं चल रही है। तमाम प्रजाति के पशु पक्षी संरक्षित श्रेणी में हैं। उन पर ध्यान दिया जाता है।
संजीव तिवारी, रेंजर पुवायां (सिंधौली रेंज)
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बया अनोखा तुंबीनुमा घोंसला बनाने के लिए विख्यात है। घोंसला लौकीनुमा हवा में लटकता होता है। यह पुआल और मोटे पत्तों वाली घास के असंख्य तिनकों से खपच्चियां चीर कर बनाया जाता है। डेढ़ से दो फुट तक लंबे घोंसले में जाने के लिए एक लंबी नली सी होती है, जिसमें केवल ‘बया’ ही प्रवेश कर सकती है। ऐसा अंडों और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाता है। घोंसले में गीली मिट्टी से पलास्तर भी किया जाता है। बया गीली मिट्टी में जुगनू चिपका देती है। यह रात में चमकते हैं, जिससे घोंसले में रोशनी होती रहती है। आधुनिक विश्वकर्मा के नाम से मशहूर यह पक्षी अपने आशियाने को एक बार ही उपयोग करता है। बया अपने घोंसले में दूसरी मादाओं को भी अंडे देने और सेने के लिए आमंत्रित करती है। यह खूबी दूसरे किसी पक्षी में नहीं है।
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ये है इसके अधूरे आसियानों का राज
पक्षी के जानकार बताते हैं कि बरसात की शुरुआत होते ही ‘बया’ का प्रणयकाल शुरू हो जाता है। प्रजनन काल के अलावा नर और मादा में कोई खास फर्क देखने को नहीं मिलता है। दोनों मादा गौरैया जैसे दिखते हैं। इनकी चोंच मोटी और पूंछ छोटी होती है। यह गौरेया की तरह ही चिट-चिट जैसे बोलते हैं। प्रणय काल में भूरे रंग के इस पक्षी का रंग इस दौरान गहरा पीला और पंख चमकीले हो जाते हैं। प्रजनन काल में नर सुखद आवाज निकालता है जिससे मादा बया उसकी ओर आकर्षित हो सके। बया एक मौसम में कई मादाओं से जोड़े बनाता है। इसी दौरान आशियाना बनाने का सिलसिला शुरू होता है। इसकी जिम्मेदारी नर पक्षी की होती है। आधा घोंसला बनने पर मादा उसका निरीक्षण करती है और पसंद नहीं आने पर रहने से इंकार कर देती है। नर फिर से दूसरा घोंसला बनाना शुरू कर देता है। यही कारण है कि तमाम घोंसले अधूरे लटके देखे जा सकते हैं। बेहतरीन घोंसला बनाने की कारीगरी के कारण इसे टेलर पक्षी भी कहा जाता है।
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गौरैया के साथ ही बया को भी बचाने के प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए सरकंडों, झाड़ियों, पेड़ों की कटाई-छटाई, शिकार आदि पर रोंक लगानी होगी। नहीं तो यह खूबसूरत पक्षी विलुप्त होते देर नहीं लगेगी।
इस समय पौधरोपण कार्यक्रम चल रहा है। पेड़ पौधे बढ़ने से पशु पक्षियों को संरक्षण मिलेगा और उनकी संख्या भी बढ़ेगी। बया के लिए अलग से संरक्षण योजना नहीं चल रही है। तमाम प्रजाति के पशु पक्षी संरक्षित श्रेणी में हैं। उन पर ध्यान दिया जाता है।
संजीव तिवारी, रेंजर पुवायां (सिंधौली रेंज)