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उम्मीद की मशाल : बंजर जमीन पर उगाए बांस और अमरूद के बाग

Mon, 20 Jun 2022 12:51 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 20 Jun 2022 12:51 AM IST
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Bamboo and guava orchard grown on waste land
पुवायां के गांव गुटैया में बांस के बाग में खड़े किसान तारा सिंह - फोटो : POWAYAN
हरिओम त्रिवेदी
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पुवायां। बेहद रेतीली जमीन जिस पर घास उगना भी मुश्किल, उस पर एमएम फार्म के लोगों ने नए-नए प्रयोग किए हैं। प्रयोगधर्मी किसानों ने इस जमीन पर न सिर्फ अमरूद का बाग लगाया, बल्कि लगभग दो एकड़ में बांस भी तैयार कर दिया है। इससे रेतीली और गैर उपजाऊ जमीन पर हरियाली का रास्ता खुलेगा और लोगों को बड़ा लाभ होगा।
खुटार ब्लॉक के गांव महोलिया वीरान, बिजौरा बिजौरिया होते हुए टाह खुर्द कलां, लक्ष्मीपुर, कैमहरिया और पुवायां ब्लॉक के गोमती नदी किनारे की जमीन, गांव औरंगाबाद, महमूदपुर सैंजनिया आदि में रेत के बड़े टीले हुआ करते थे। गैर उपजाऊ इस भूमि पर कांस और पतेल, कंटीली झाड़ियां आदि उगती थीं। अब तमाम जमीन समतल की जा चुकी है, लेकिन रेत में फसल उगाना बेहद कठिन काम है। दरअसल यहां पानी नहीं रुक पाता है और फसल सूख जाती है।
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गुटैया के एमएम फार्म के तारा सिंह, सतवंत सिंह आदि ने रेतीले क्षेत्र में नया प्रयोग किया है। दो साल पहले गोमती नदी से कुछ दूर बेहद ऊंची नीची जमीन को समतल करने के बाद यहां करीब दो एकड़ बांस लगाया है। बांस अभी एक वर्ष का हुआ है। दो से तीन वर्ष में बांस पूरी तरह से तैयार हो जाएगा। बालकोआ किस्म का बांस लगाया है, जिसकी फर्नीचर आदि में भारी मांग है। बांस की खेती में केवल घास आदि की सफाई का ही खर्च आता है। अनुमान है कि दो से तीन वर्ष बाद बांस से प्रति एकड़ चार से पांच लाख रुपये तक की आय हो सकेगी।
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तारा सिंह ने बताया कि बांस बंजर जमीन में हो जाता है और मौसम का भी असर बांस पर नहीं पड़ता है। इस कारण किसानों के लिए बड़ा लाभदायक है। सरकार की राष्ट्रीय बंबू मिशन योजना के तहत सरकार किसानों को एक बांस का पौधा लगाने पर 120 रुपये का अनुदान देती है। संवाद
बांस के बाग के पास ही ताइवान पिंक नाम की अमरूद की किस्म का बाग लगा दिया गया है। आमतौर पर बेहद अच्छी किस्म की भूमि का एक एकड़ का ठेका प्रति वर्ष 30 हजार रुपये तक मिलता है, लेकिन जिस स्थान पर बाग लगा है, उस भूमि को कोई दस हजार रुपये प्रति वर्ष में भी लेने को तैयार नहीं होता। ऐसे में अमरूद का बाग प्रति वर्ष 55 हजार रुपये एकड़ दे रहा है। ताइवान पिंक अमरूद गैर जनपदों और नेपाल तक सप्लाई होता है।
कर चुके हैं फूलों की खेती
एमएम फार्म पर फूलों की खेती भी की जा चुकी है, लेकिन फूलों की मार्केट नहीं होने के कारण बाद में फूल की खेती नहीं की गई। फूलों को तुड़वाने के बाद शाहजहांपुर आदि जगहों पर भेजना पड़ता था, जिस कारण भारी खर्च आता था। इस कारण फूलों की खेती सफल नहीं हो सकी।

शाहजहांपुर में वन विभाग के एक रेंजर ने बंबू मिशन की जानकारी देते हुए बंजर जमीन पर बांस की खेती करने को प्रेरित किया था। पौध भी उन्होंने ही उपलब्ध कराई थी। अमरूद की खेती हमारा खुद का प्रयोग है। अमरूद की खेती और बढ़ाएंगे, इसके लिए बंगलुरू, कोलकाता आदि की बड़ी नर्सरी से पौध मंगवाने की योजना है। -तारा सिंह, एमएम फार्म गुटैया पुवायां
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