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सोशल ऑडिट टीमों पर रौब नहीं गांठ पाएंगे प्रधान
ब्यूरो, अमर उजाला शाहजहांपुर
Updated Sun, 15 Feb 2015 12:39 AM IST
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47 लाख रुपये सिर्फ कागजों पर हो गए खर्च
गत वर्ष सितंबर में मनरेगा के कामों की सीबीआई जांच की सुगबुगाहट शुरू होने पर एक्टिव हुईं सोशल ऑडिट टीमों ने ब्लॉक वार गांव-गांव जाकर जांच की तो पता चला कि विभिन्न तहसीलों में 47 लाख रुपये केकाम सिर्फ कागजों पर दर्शाकर हड़प लिए गए। इसमें सबसे ज्यादा 21.63 लाख रुपये का दुरुपयोग सिंधौली ब्लॉक के 14 गांवों में पाया गया। इसी तरह तिलहर ब्लॉक में 18 लाख रुपये और पुवायां क्षेत्र के गांवों में दस लाख रुपये की घपलेबाजी पकड़ी गई। तत्कालीन सीडीओ डॉ. राम मनोहर मिश्रा ने इस बाबत न केवल लोकपाल के रिकवरी संबंधी आदेश को अनदेखा किया, ‘माननीयों’ के चहेतों को बचाने के लिए सारे मामले तकनीकी जांच में उलझा दिए।
प्रधानों के आगे नतमस्तक थे अफसर
दरअसल, घोटाले की रिपोर्टों पर तकनीकी जांच तो महज बहाना रहा, असल मकसद था सत्ता तक पहुंच रखने वाले प्रधानों को क्लीन चिट देना। उस वक्त सोशल ऑडिट टीमों पर गुस्सा उतारते हुए प्रधानों ने सिंधौली और तिलहर में प्रदर्शनों का सिलसिला जारी कर दिया। यही नहीं, ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ जैसे अंदाज में ऑडिट टीमोें पर रिश्वत मांगने और नहीं देने पर विकास कार्यों में खामियां निकालने जैसे आरोप लगाने शुरू कर दिए।
सोशल ऑडिट टीमों को मिला पुनर्जीवन
प्रधानों के तीखे तेवर और सरकारी तंत्र से उन्हें मिले संरक्षण के कारण दो माह से मृतप्राय पड़ीं सोशल ऑडिट टीमों को बतौर पर्यवेक्षक अफसरों का साथ मिल जाने से उन्हें पुनर्जीवन मिल गया है। कई ब्लॉक समन्वयकों का मानना है कि नवागत सीडीओ की मंशा के अनुरूप पर्यवेक्षकों द्वारा ग्राम पंचायतों की खुली बैठकों में घोटालों पर जन सुनवाई किए जाने से उन पर लगे बेवजह के दाग धुलेंगे और आरोपियों को बचाव करना कठिन हो जाएगा।
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अब नहीं उठ पाएंगे बेवजह विरोध के स्वर
‘सीडीओ की नई व्यवस्था स्वागत योग्य है। सोशल ऑडिट टीमों केखिलाफ अब बेवजह विरोध के स्वर नहीं उठ पाएंगे क्योंकि साथ मौजूद अधिकारी को ऑडिट टीमें मौके पर ही गड़बड़ियां दिखा और बता सकेंगी। नेताओं का कवच लेते रहे घोटालेबाजों को अब रिकवरी की तैयारी कर लेनी चाहिए।’
-डॉ. सुरेशचंद्र मिश्र, मनरेगा लोकपाल
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गत वर्ष सितंबर में मनरेगा के कामों की सीबीआई जांच की सुगबुगाहट शुरू होने पर एक्टिव हुईं सोशल ऑडिट टीमों ने ब्लॉक वार गांव-गांव जाकर जांच की तो पता चला कि विभिन्न तहसीलों में 47 लाख रुपये केकाम सिर्फ कागजों पर दर्शाकर हड़प लिए गए। इसमें सबसे ज्यादा 21.63 लाख रुपये का दुरुपयोग सिंधौली ब्लॉक के 14 गांवों में पाया गया। इसी तरह तिलहर ब्लॉक में 18 लाख रुपये और पुवायां क्षेत्र के गांवों में दस लाख रुपये की घपलेबाजी पकड़ी गई। तत्कालीन सीडीओ डॉ. राम मनोहर मिश्रा ने इस बाबत न केवल लोकपाल के रिकवरी संबंधी आदेश को अनदेखा किया, ‘माननीयों’ के चहेतों को बचाने के लिए सारे मामले तकनीकी जांच में उलझा दिए।
प्रधानों के आगे नतमस्तक थे अफसर
दरअसल, घोटाले की रिपोर्टों पर तकनीकी जांच तो महज बहाना रहा, असल मकसद था सत्ता तक पहुंच रखने वाले प्रधानों को क्लीन चिट देना। उस वक्त सोशल ऑडिट टीमों पर गुस्सा उतारते हुए प्रधानों ने सिंधौली और तिलहर में प्रदर्शनों का सिलसिला जारी कर दिया। यही नहीं, ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ जैसे अंदाज में ऑडिट टीमोें पर रिश्वत मांगने और नहीं देने पर विकास कार्यों में खामियां निकालने जैसे आरोप लगाने शुरू कर दिए।
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सोशल ऑडिट टीमों को मिला पुनर्जीवन
प्रधानों के तीखे तेवर और सरकारी तंत्र से उन्हें मिले संरक्षण के कारण दो माह से मृतप्राय पड़ीं सोशल ऑडिट टीमों को बतौर पर्यवेक्षक अफसरों का साथ मिल जाने से उन्हें पुनर्जीवन मिल गया है। कई ब्लॉक समन्वयकों का मानना है कि नवागत सीडीओ की मंशा के अनुरूप पर्यवेक्षकों द्वारा ग्राम पंचायतों की खुली बैठकों में घोटालों पर जन सुनवाई किए जाने से उन पर लगे बेवजह के दाग धुलेंगे और आरोपियों को बचाव करना कठिन हो जाएगा।
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अब नहीं उठ पाएंगे बेवजह विरोध के स्वर
‘सीडीओ की नई व्यवस्था स्वागत योग्य है। सोशल ऑडिट टीमों केखिलाफ अब बेवजह विरोध के स्वर नहीं उठ पाएंगे क्योंकि साथ मौजूद अधिकारी को ऑडिट टीमें मौके पर ही गड़बड़ियां दिखा और बता सकेंगी। नेताओं का कवच लेते रहे घोटालेबाजों को अब रिकवरी की तैयारी कर लेनी चाहिए।’
-डॉ. सुरेशचंद्र मिश्र, मनरेगा लोकपाल