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अरे वाह, आर्डनेंस फैक्ट्री हुई शतायु
Shahjahanpur
Updated Sat, 14 Jun 2014 05:34 AM IST
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ओसीएफ शताब्दी वर्ष पर विशेष
- शुरू में अपनी मशीनों से वर्दी सिलते थे कर्मचारी
- 175 कर्मियों से हुई थी शुरूआत, अब 3500 कर्मी
- स्वर्ण जयंती के समय फैक्ट्री में था तेरह हजार कर्मी
अजय अवस्थी
शाहजहांपुर। हो सकता है कि आप जानते हों कि अपनी आर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री (ओसीएफ) जिसे आयुध वस्त्र निर्माणी भी कहा जाता है, वह शतायु हो गई है, लेकिन यह कुछ गिने-चुने बुजुर्ग ही जानते होंगे कि आज से सौ वर्ष पहले अर्थात मार्च 1914 में जब फैक्ट्री शुरू की गई थी, तब मात्र पौने दो सौ दर्जी ही काम पर रखे गए थे। जब 1964 में इसकी स्वर्ण जयंती मनाई गई थी, तब तक कर्मचारियों की संख्या 175 से बढ़कर तेरह हजार तक पहुंच चुकी थी। हजारों हाथों को रोजगार देने में सक्षम फैक्ट्री में इस समय करीब साढे़ तीन हजार कर्मचारी ही कार्यरत हैं।
इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा बताते हैं कि जब फैक्ट्री शुरू हुई थी तब मेजर सीएआईओ मियर अलीपुर से यहां आए थे। एक साल के बाद यानी मार्च 1915 में कर्मचारियों की संख्या 175 से बढ़ाकर 650 कर दी गई। इसी बीच ब्रिटिश सरकार के कमांडर इन चीफ कितनेचर ने यहां कुछ बैरक बनवाई थीं, जिसका उद्देश्य उन क्रांतिकारियों को पकड़ना था, जो शहर में अपने मंसूबों को अंजाम देकर फैक्ट्री के रास्ते ही पुवायां की ओर भाग जाते थे। इन्हीं बैरक में सबसे पहले सिलाई का काम शुरू किया गया। तब कर्मचारी (दर्जी) अपनी मशीनें खुद लाकर बैरक में कपड़े सिला करते थे। पहले इस फैक्ट्री का नाम क्लोदिंग फैक्ट्री ही था, लेकिन 1927 में इस नाम के आगे आर्डनेंस शब्द और बढ़ा दिया गया। इस तरह यह आर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री कहलाने लगी।
जब 1919 में प्रथम विश्व युद्ध हुआ तो इसमें काम बढ़ गया। काम के साथ ही कर्मचारियों की संख्या भी कई गुना बढ़ा दी गई। द्वितीय विश्व युद्ध में रिकार्ड उत्पाद की वजह से फैक्ट्री में कर्मचारियों की संख्या लगभग 9800 तक कर दी गई। युद्ध के बाद कर्मचारियों की संख्या में छंटनी करनी शुरू कर दी गई, जिसका माशूक अली और शौकत अली नामक व्यक्तियों ने विरोध किया, तो छंटनी रोक दी गई।
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डॉ. मेहरोत्रा बताते हैं कि अक्टूबर 1962 में चीन युद्ध में उत्पाद और बढ़ाने की वजह से कर्मचारियों की संख्या 13 हजार तक जा पहुंची थी और काम 24 घंटे होता रहता था। तीन शिफ्टें तक चली हैं इस फैक्ट्री में। वर्ष 1964 में जब स्वर्ण जयंती समारोह मनाने का वक्त आया तो केंद्रीय रक्षा उत्पादन विभाग से बड़े अधिकारी के रूप में एएस थॉमस यहां आए थे। इसके बाद वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ओसीएफ में कर्मचारियों की भर्ती पर रोक लगा दी।
कई उत्पाद बढ़े हैं अब तक
शुरू में ओसीएफ में केवल सैनिकों की वर्दी ही सिली जाती थी, लेकिन अब अतिशीत इलाकों में रहने वाले सैनिकों के लिए यह फैक्ट्री विशेष किस्म के कोट, जैकेट, ट्राउजर, वर्दी, कंबल, मोजे, दरियाें का भी उत्पादन कर रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी
बढ़ी ओसीएफ
ओसीएफ में सैनिकों की वर्दी सिलने वाले कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखकर मथुरा प्रसाद नाम के एक बाबू ने छह जून 1927 को एक स्कूल भी खोल दिया था, तब स्कूल में 12 छात्र ही पढ़ते थे, लेकिन अब शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार हुआ है और ओसीएफ इंटर कॉलेज के अलावा दो केंद्रीय विद्यालय भी संचालित हो रहे हैं, दोनों सीबीएसई बोर्ड और ओसीएफ कॉलेज यूपी बोर्ड से संचालित हो रहा है।
गुप्ता जी को कौन भूल सकता है
ओसीएफ में अप्रैल 1958 में एसएन गुप्ता सुपरिंटेंडेंट के पद पर तैनात हुए। उन्होंने फैक्ट्री के पास मंदिर बनवाया और उन्हीं के प्रेरणा से रामलीला भी शुरू हो सकी, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
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- शुरू में अपनी मशीनों से वर्दी सिलते थे कर्मचारी
- 175 कर्मियों से हुई थी शुरूआत, अब 3500 कर्मी
- स्वर्ण जयंती के समय फैक्ट्री में था तेरह हजार कर्मी
अजय अवस्थी
शाहजहांपुर। हो सकता है कि आप जानते हों कि अपनी आर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री (ओसीएफ) जिसे आयुध वस्त्र निर्माणी भी कहा जाता है, वह शतायु हो गई है, लेकिन यह कुछ गिने-चुने बुजुर्ग ही जानते होंगे कि आज से सौ वर्ष पहले अर्थात मार्च 1914 में जब फैक्ट्री शुरू की गई थी, तब मात्र पौने दो सौ दर्जी ही काम पर रखे गए थे। जब 1964 में इसकी स्वर्ण जयंती मनाई गई थी, तब तक कर्मचारियों की संख्या 175 से बढ़कर तेरह हजार तक पहुंच चुकी थी। हजारों हाथों को रोजगार देने में सक्षम फैक्ट्री में इस समय करीब साढे़ तीन हजार कर्मचारी ही कार्यरत हैं।
इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा बताते हैं कि जब फैक्ट्री शुरू हुई थी तब मेजर सीएआईओ मियर अलीपुर से यहां आए थे। एक साल के बाद यानी मार्च 1915 में कर्मचारियों की संख्या 175 से बढ़ाकर 650 कर दी गई। इसी बीच ब्रिटिश सरकार के कमांडर इन चीफ कितनेचर ने यहां कुछ बैरक बनवाई थीं, जिसका उद्देश्य उन क्रांतिकारियों को पकड़ना था, जो शहर में अपने मंसूबों को अंजाम देकर फैक्ट्री के रास्ते ही पुवायां की ओर भाग जाते थे। इन्हीं बैरक में सबसे पहले सिलाई का काम शुरू किया गया। तब कर्मचारी (दर्जी) अपनी मशीनें खुद लाकर बैरक में कपड़े सिला करते थे। पहले इस फैक्ट्री का नाम क्लोदिंग फैक्ट्री ही था, लेकिन 1927 में इस नाम के आगे आर्डनेंस शब्द और बढ़ा दिया गया। इस तरह यह आर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री कहलाने लगी।
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जब 1919 में प्रथम विश्व युद्ध हुआ तो इसमें काम बढ़ गया। काम के साथ ही कर्मचारियों की संख्या भी कई गुना बढ़ा दी गई। द्वितीय विश्व युद्ध में रिकार्ड उत्पाद की वजह से फैक्ट्री में कर्मचारियों की संख्या लगभग 9800 तक कर दी गई। युद्ध के बाद कर्मचारियों की संख्या में छंटनी करनी शुरू कर दी गई, जिसका माशूक अली और शौकत अली नामक व्यक्तियों ने विरोध किया, तो छंटनी रोक दी गई।
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डॉ. मेहरोत्रा बताते हैं कि अक्टूबर 1962 में चीन युद्ध में उत्पाद और बढ़ाने की वजह से कर्मचारियों की संख्या 13 हजार तक जा पहुंची थी और काम 24 घंटे होता रहता था। तीन शिफ्टें तक चली हैं इस फैक्ट्री में। वर्ष 1964 में जब स्वर्ण जयंती समारोह मनाने का वक्त आया तो केंद्रीय रक्षा उत्पादन विभाग से बड़े अधिकारी के रूप में एएस थॉमस यहां आए थे। इसके बाद वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ओसीएफ में कर्मचारियों की भर्ती पर रोक लगा दी।
कई उत्पाद बढ़े हैं अब तक
शुरू में ओसीएफ में केवल सैनिकों की वर्दी ही सिली जाती थी, लेकिन अब अतिशीत इलाकों में रहने वाले सैनिकों के लिए यह फैक्ट्री विशेष किस्म के कोट, जैकेट, ट्राउजर, वर्दी, कंबल, मोजे, दरियाें का भी उत्पादन कर रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी
बढ़ी ओसीएफ
ओसीएफ में सैनिकों की वर्दी सिलने वाले कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखकर मथुरा प्रसाद नाम के एक बाबू ने छह जून 1927 को एक स्कूल भी खोल दिया था, तब स्कूल में 12 छात्र ही पढ़ते थे, लेकिन अब शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार हुआ है और ओसीएफ इंटर कॉलेज के अलावा दो केंद्रीय विद्यालय भी संचालित हो रहे हैं, दोनों सीबीएसई बोर्ड और ओसीएफ कॉलेज यूपी बोर्ड से संचालित हो रहा है।
गुप्ता जी को कौन भूल सकता है
ओसीएफ में अप्रैल 1958 में एसएन गुप्ता सुपरिंटेंडेंट के पद पर तैनात हुए। उन्होंने फैक्ट्री के पास मंदिर बनवाया और उन्हीं के प्रेरणा से रामलीला भी शुरू हो सकी, जो आज भी बदस्तूर जारी है।