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जीवनदायिनी नदियों और हरियाली को बचाने की जरूरत
Shahjahanpur
Updated Thu, 05 Jun 2014 05:33 AM IST
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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष
- ढाईघाट और कोलाघाट पर मैली हो गई गंगा-रामगंगा
- गर्रा और खन्नौत नदियों में समा रहा शहर का कचरा
- हरियाली बढ़ाने के बजाय पेड़ों पर चल रहे कुल्हाड़े
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। नदियों और पेड़-पौधों को आदिकाल से जीवनदायी माना जाता है। जीव जगत कुछ दिन भूखा रह सकता है, लेकिन हवा और पानी के बगैर जीवन संभव नहीं। इसीलिए भारतीय संस्कृति में नदियों को मां का स्थान दिया गया तो पेड़-पौधों को देवताओं का वास मानते हुए उन्हें पूजने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है, लेकिन भौतिक प्रगति की अंधी दौड़ ने लोगों का इतना स्वार्थी बना दिया कि नदियां मरने की कगार पर पहुंच रही हैं और परिपक्व पेड़ों पर कुल्हाड़े चलने से हरियाली का दायरा सिमटता जा रहा है।
नदियों की दुर्दशा या फिर हरियाली पर अत्याचार की बानगी देखनी हो तो ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं। शहरी क्षेत्र को अपनी गोद में समेटे गर्रा और खन्नौत नदियों पर निगाह डालें। बुजुर्ग बताते हैं कि पांच दशक पहले तक दोनों नदियां इतनी निर्मल थीं कि उनका पानी फसलों की सिंचाई केअतिरिक्त आसपास बसे गांवों में पीने के लिए भी इस्तेमाल होता था। अब नदियों के आचमन की कौन कहे, उनमें नहाने से भी लोग परहेज करने लगे हैं।
करीब पांच लाख की आबादी वाले शहर का कचरा समेटने को नगरपालिका परिषद अभी तक कोई स्थायी डलाव घर नहीं बना सकी। शहर का सारा कूड़ा-कचरा दोनों नदियों के तटों पर बिखेरा जा रहा है। खन्नौत नदी के लोधीपुर पुल का किनारा हो, बिसरात घाट हो या फिर गर्रा के पुराने पुल केनीचे वाला घाट, कोई भी नदी तट गंदगी से अछूता नहीं है। नदियां प्रदूषित करने में रही बची कसर सीवर लाइन की कमी पूरी कर रही है। शहर के आठ बड़े नाले हैं और इन सभी के मुहाने इन्हीं दोनों नदियों में खुले होने से पानी मटमैला हो चुका हैे।
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मिर्जापुर क्षेत्र के कोलाघाट पर ‘पतितपावनी’ गंगा की जलराशि अपनी धवलता खोने के साथ काली पड़ चुकी है। उसके साथ बह रही रामगंगा और बहगुल नदियां भी प्रदूषण की मार से सिसक रही हैं। पुवायां तहसील में ‘पावन’ गोमती नदी भी प्रदूषण से अछूती नहीं बची। इसी क्षेत्र में मीठे तरबूजों के लिए मशहूर भैंसी नदी का अस्तित्व खतरे में है। जहां भैंसी का पानी हिलोरें मारता था, वहां जमीन को समतल करके उद्योग विस्तार की तैयारी की जा रही है।
जल प्रदूषण की तरह जिले की आबो-हवा को भी कुल्हाड़ियों से चोट पहुंचाई जा रही है। अक्सर बगैर परमिट हरे पेड़ काटे जाने केमामले उजागर होते हैं। पुवायां क्षेत्र में आम के तमाम बागों का सफाया हो चुका है और अब लकड़ी माफियाओं ने खुटार रेंज केकोरों-सागौन वाले कीमती जंगल को अपने निशाने पर ले रखा है। कभी पुवायां तक जंगलों की भरमार थी, लेकिन अब खुटार के आसपास जंगलात रकबा तेजी से घट रहा है। ऐसे मामलों में ‘कार्रवाई’ के बजाय सिर्फ ‘कार्यवाही’ कागजों तक सीमित रहती है। यही वजह है कि लकड़ी के धंधे में लिप्त लोगों में जेल जाने का कोई खौफ नहीं है।
ऐसे हो सकती है पर्यावरण की रक्षा
आखिर कैसे हो पर्यावरण की हिफाजत? हमने शहर केकुछ बुद्घिजीवियों से यह सवाल किया तो उनका नजरिया कुछ इस तरह सामने आया।
हरियाली बढ़ने से मिलेगी ज्यादा ऑक्सीजन
‘नदियों का हाल सभी लोग जानते हैं और देख भी रहे हैं। निगाह उस प्रदूषण पर डालने की जरूरत है जो दिख नहीं रहा, लेकिन तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। हवा को प्रदूषित होने से बचाने की आवश्यकता है। कार्बन हाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए अधिकाधिक पौधे लगाकर हरियाली को बढ़ावा देना होगा।’
-डॉ. आदर्श पांडेय, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, एसएस कालेज
पौधरोपण में समाज निभाए भागीदारी
‘अभी पीने के लिए पानी सुगमता से मिल रहा है। इसलिए नदियों की किसी को परवाह नहीं, लेकिन वाहनों की बढ़ती संख्या से शहर के भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में घुटन सबको महसूस हो रही है। हवा को साफ रखने में हरियाली की बहुत बड़ी भूमिका है। पौधरोपण को सरकारी अनुष्ठान मानने वाले समाज को भी इस दिशा में आगे आना होगा।’
-शिव नारायण खन्ना, अध्यक्ष, लायंस क्लब सेंट्रल
कृषि उपज लेने के बदलने होंगे तौर तरीके
‘खाद्यान्न उत्पादन में हवा-पानी के साथ खेत की मिट्टी का अहम योगदान होता है, लेकिन रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जिले की मृदा उर्वरता घट रही है। इस दिशा में प्रयोगशाला नतीजे डरावने हैं क्योंकि जिले केपानी में आर्सेनिक समेत 16 जहरीले तत्व बताए गए हैं। उपज लेने के तौर-तरीके बदलकर जैविक खेती अपनानी होगी।’
-मुन्ना लाल पाल, अधिवक्ता, जजी कचहरी
नदियों के बारे में सोचने की जरूरत
‘नदियों के बारे में सभी को सोंचने की जरूरत है, लेकिन हैरानी की बात यह कि पढ़े-लिखे समाज के तथाकथित बुद्घिजीवी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे। मैं रोज मिर्जापुर जाता हूं और कोला घाट पुल से गंगा का काला पानी देख मन खिन्न हो जाता है। रोगों से संक्रमित करने वाला घातक मेडिकल कचरा भी नदियों में डाला जा रहा है। कौन किसको समझाए?’
-डॉ. इरफान ह्यूमन, निदेशक, वैज्ञानिक संस्था रिसर्च
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- ढाईघाट और कोलाघाट पर मैली हो गई गंगा-रामगंगा
- गर्रा और खन्नौत नदियों में समा रहा शहर का कचरा
- हरियाली बढ़ाने के बजाय पेड़ों पर चल रहे कुल्हाड़े
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। नदियों और पेड़-पौधों को आदिकाल से जीवनदायी माना जाता है। जीव जगत कुछ दिन भूखा रह सकता है, लेकिन हवा और पानी के बगैर जीवन संभव नहीं। इसीलिए भारतीय संस्कृति में नदियों को मां का स्थान दिया गया तो पेड़-पौधों को देवताओं का वास मानते हुए उन्हें पूजने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है, लेकिन भौतिक प्रगति की अंधी दौड़ ने लोगों का इतना स्वार्थी बना दिया कि नदियां मरने की कगार पर पहुंच रही हैं और परिपक्व पेड़ों पर कुल्हाड़े चलने से हरियाली का दायरा सिमटता जा रहा है।
नदियों की दुर्दशा या फिर हरियाली पर अत्याचार की बानगी देखनी हो तो ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं। शहरी क्षेत्र को अपनी गोद में समेटे गर्रा और खन्नौत नदियों पर निगाह डालें। बुजुर्ग बताते हैं कि पांच दशक पहले तक दोनों नदियां इतनी निर्मल थीं कि उनका पानी फसलों की सिंचाई केअतिरिक्त आसपास बसे गांवों में पीने के लिए भी इस्तेमाल होता था। अब नदियों के आचमन की कौन कहे, उनमें नहाने से भी लोग परहेज करने लगे हैं।
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करीब पांच लाख की आबादी वाले शहर का कचरा समेटने को नगरपालिका परिषद अभी तक कोई स्थायी डलाव घर नहीं बना सकी। शहर का सारा कूड़ा-कचरा दोनों नदियों के तटों पर बिखेरा जा रहा है। खन्नौत नदी के लोधीपुर पुल का किनारा हो, बिसरात घाट हो या फिर गर्रा के पुराने पुल केनीचे वाला घाट, कोई भी नदी तट गंदगी से अछूता नहीं है। नदियां प्रदूषित करने में रही बची कसर सीवर लाइन की कमी पूरी कर रही है। शहर के आठ बड़े नाले हैं और इन सभी के मुहाने इन्हीं दोनों नदियों में खुले होने से पानी मटमैला हो चुका हैे।
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मिर्जापुर क्षेत्र के कोलाघाट पर ‘पतितपावनी’ गंगा की जलराशि अपनी धवलता खोने के साथ काली पड़ चुकी है। उसके साथ बह रही रामगंगा और बहगुल नदियां भी प्रदूषण की मार से सिसक रही हैं। पुवायां तहसील में ‘पावन’ गोमती नदी भी प्रदूषण से अछूती नहीं बची। इसी क्षेत्र में मीठे तरबूजों के लिए मशहूर भैंसी नदी का अस्तित्व खतरे में है। जहां भैंसी का पानी हिलोरें मारता था, वहां जमीन को समतल करके उद्योग विस्तार की तैयारी की जा रही है।
जल प्रदूषण की तरह जिले की आबो-हवा को भी कुल्हाड़ियों से चोट पहुंचाई जा रही है। अक्सर बगैर परमिट हरे पेड़ काटे जाने केमामले उजागर होते हैं। पुवायां क्षेत्र में आम के तमाम बागों का सफाया हो चुका है और अब लकड़ी माफियाओं ने खुटार रेंज केकोरों-सागौन वाले कीमती जंगल को अपने निशाने पर ले रखा है। कभी पुवायां तक जंगलों की भरमार थी, लेकिन अब खुटार के आसपास जंगलात रकबा तेजी से घट रहा है। ऐसे मामलों में ‘कार्रवाई’ के बजाय सिर्फ ‘कार्यवाही’ कागजों तक सीमित रहती है। यही वजह है कि लकड़ी के धंधे में लिप्त लोगों में जेल जाने का कोई खौफ नहीं है।
ऐसे हो सकती है पर्यावरण की रक्षा
आखिर कैसे हो पर्यावरण की हिफाजत? हमने शहर केकुछ बुद्घिजीवियों से यह सवाल किया तो उनका नजरिया कुछ इस तरह सामने आया।
हरियाली बढ़ने से मिलेगी ज्यादा ऑक्सीजन
‘नदियों का हाल सभी लोग जानते हैं और देख भी रहे हैं। निगाह उस प्रदूषण पर डालने की जरूरत है जो दिख नहीं रहा, लेकिन तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। हवा को प्रदूषित होने से बचाने की आवश्यकता है। कार्बन हाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए अधिकाधिक पौधे लगाकर हरियाली को बढ़ावा देना होगा।’
-डॉ. आदर्श पांडेय, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, एसएस कालेज
पौधरोपण में समाज निभाए भागीदारी
‘अभी पीने के लिए पानी सुगमता से मिल रहा है। इसलिए नदियों की किसी को परवाह नहीं, लेकिन वाहनों की बढ़ती संख्या से शहर के भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में घुटन सबको महसूस हो रही है। हवा को साफ रखने में हरियाली की बहुत बड़ी भूमिका है। पौधरोपण को सरकारी अनुष्ठान मानने वाले समाज को भी इस दिशा में आगे आना होगा।’
-शिव नारायण खन्ना, अध्यक्ष, लायंस क्लब सेंट्रल
कृषि उपज लेने के बदलने होंगे तौर तरीके
‘खाद्यान्न उत्पादन में हवा-पानी के साथ खेत की मिट्टी का अहम योगदान होता है, लेकिन रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जिले की मृदा उर्वरता घट रही है। इस दिशा में प्रयोगशाला नतीजे डरावने हैं क्योंकि जिले केपानी में आर्सेनिक समेत 16 जहरीले तत्व बताए गए हैं। उपज लेने के तौर-तरीके बदलकर जैविक खेती अपनानी होगी।’
-मुन्ना लाल पाल, अधिवक्ता, जजी कचहरी
नदियों के बारे में सोचने की जरूरत
‘नदियों के बारे में सभी को सोंचने की जरूरत है, लेकिन हैरानी की बात यह कि पढ़े-लिखे समाज के तथाकथित बुद्घिजीवी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे। मैं रोज मिर्जापुर जाता हूं और कोला घाट पुल से गंगा का काला पानी देख मन खिन्न हो जाता है। रोगों से संक्रमित करने वाला घातक मेडिकल कचरा भी नदियों में डाला जा रहा है। कौन किसको समझाए?’
-डॉ. इरफान ह्यूमन, निदेशक, वैज्ञानिक संस्था रिसर्च