पानी के दुश्मन बने साठा धान और यूकेलिप्टस

Shahjahanpur Updated Tue, 06 May 2014 05:31 AM IST
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पुवायां तहसील में भारी पैमाने पर होती है साठा की खेती
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- पंजाब और हरियाणा में लगा है इसकी खेती पर प्रतिबंध
- तराई की देखा-देखी किसान बढ़ाते जा रहे हैं रकबा
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर/ पुवायां। किसान कुछ ऐसी फसलों की बुवाई करने लगे हैं जिनके लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है। चाइनीज धान साठा काफी पानी लेता है। इस उपज से जलस्तर कम हो जाता है। इसी वजह से पंजाब और हरियाणा में चाइनीज धान की खेती प्रतिबंधित है, लेकिन तराई की देखादेखी इससे सटे पुवायां इलाके में भी किसान इसकी खेती का रकबा साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। जिले में बाकी जगह धान कम ही होता है तो वहां के किसान पुरानी प्रजातियां ही इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं यूकेलिप्टिस ने जिले में सभी जगह भूगर्भ जलस्तर को कम किया है।

पुवायां के 35 फीसदी
हिस्से में लगाते हैं साठा
तहसील पुवायां क्षेत्र में तहसील क्षेत्र के कुल 35 प्रतिशत भाग पर साठा धान की खेती की जाती है। इस बार साठा की खेती 45 प्रतिशत तक पहुंच जाने का अनुमान है। कहने को तो यह साठा अर्थात साठ दिन में तैयार होने वाली फसल है, लेकिन इसके तैयार होने में लगभग 90 दिन का समय लग जाता है। साठा की सिंचाई के लिए पानी के अंधाधुंध दोहन से भूगर्भीय जलस्तर में लगातार गिरावट आ रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि साठा का क्षेत्रफल बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब स्थिति रेगिस्तान जैसी हो जायेगी। बिजली संकट में भी साठा का बहुत बड़ा योगदान है। एक मोटर का कनेक्शन लेने के बाद बिजली कर्मचारियों की साठगांठ से दो से तीन तक मोटरें चलाए जाने के कारण अन्य उपभोक्ताओं को लो वोल्टेज का सामना करना पड़ता है।
इसी प्रकार तमाम किसान पानी की दूसरी दुश्मन यूकेलिप्टिस को भी खेतों की मेड़ पर लगा रहे हैं। यह भी भारी मात्रा में पानी को सोखकर भूगर्भीय जल का स्तर नीचे गिरा रही है। जल्द तैयार हो जाने और खेत से ही बिक जाने के कारण यूकेलिप्टिस को खूब लगाया जा रहा है। खुटार, पुवायां, बंडा, रामपुर कलां सहित कई स्थानों पर यूकेलिप्टिस की नर्सरी बनी हुई हैं।



जसविंदर लड़ रहे हैं
साठा के खिलाफ जंग
मकसूदापुर/बंडा। पहले शाहजहांपुर और अब पीलीभीत में शामिल सीमावर्ती गांव पिपरिया मजरा के जसविंदर सिंह साठा के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। उनकी मां है कि प्रदेश में साठा पर पूर्णरूप से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
जसविंदर सिंह ने तमाम किसानों के हस्ताक्षर करवाकर हाईकोर्ट में एक रिट डालकर साठा पर रोक लगवाने की मांग की थी। कोर्ट ने इस मामले में उन्हें अधिकारियों को पत्र लिखने की सलाह दी थी। इसके बाद वह मुख्यमंत्री, केंद्रीय कृषि मंत्री, प्रमुख सचिव कृषि, कृषि मंत्री उत्तर प्रदेश, कृषि निदेशक उत्तर प्रदेश, मंडलायुक्त और जिलाधिकारी को पत्र भेजकर साठा धान पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर चुके हैं। अपने पत्र में जसविंदर सिंह ने वैज्ञानिकों के हवाले से साठा धान से होने वाले दुष्प्रभावों का विस्तृत जिक्र किया है। उनका कहना है कि साठा पर रोक नहीं लगने तक वह अधिकारियों और मंत्रियों को पत्र लिखते रहेंगे। सवाल उठाते हैं कि जब साठा पंजाब और हरियाणा में प्रतिबंधित है तो यूपी और दूसरे प्रदेशों में प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा रहा है?



धान में हो रही पानी
की ज्यादा खपत
जिला कृषि अधिकारी अखिलानंद पांडेय के अनुसार रबी सीजन में गेहूं की फसल प्राकृतिक मानसूनी पानी से हो जाती है, लेकिन खरीफ सीजन में बोई जाने वाली फसलों की उत्पादकता नहरों या फिर संरक्षित भूगर्भ जल की उपलब्धता पर आश्रित होती है। धान में पानी में सर्वाधिक खपत प्रति स्क्वायर वर्ग मीटर 50 से 60 गैलन तक होती है। यही नहीं, धान के खेत में पानी खड़ा (भरा) रखना पड़ता है। इस सीजन में उड़द-मूंग जैसी दलहनी फसलें पानी कम पीती हैं, लेकिन गन्ना, मक्का और मैंथा को अधिक पानी चाहिए। साठा धान भी काफी मात्रा में भूगर्भ जल खींच रहा है।


साठा पर इसलिए लगा प्रतिबंध
चावल का दाना छोटा होने के कारण चाइनीज धान के नाम से मशहूर साठा अधिक पानी लेकर शीघ्र पकने वाली प्रजाति होने के कारण फार्मरों को आर्थिक लाभ भले ही दे रही हो, भूगर्भ जल संपदा पर डकैती डाल रही है। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार साठा उत्पादन की अधिकता के कारण पंजाब और हरियाणा का भूगर्भ जल स्तर सामान्य से बीस गुना नीचे चला गया। इसीलिए दोनों राज्य सरकारों को शासनादेश जारी करके धान की पौध तैयार करने और रोपाई करने की समय सीमा आगे बढ़ाकर मई के दूसरे सप्ताह तक करनी पड़ी।
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