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पहली बार नामित हुए थे नौ मेंबर
Shahjahanpur
Updated Wed, 09 Jan 2013 05:30 AM IST
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यूपी विधान मंडल के 125 साल पर विशेष
- इलाहाबाद के थार्न हिल मैमोरियल हाल में हुई पहली बैठक
- पहले सत्र में पारित हुई थी विधान परिषद की नियमावली
- इलाहाबाद विवि की स्थापना का डिप्टी गवर्नर जनरल ने लिया था संकल्प
अरुण पाराशरी
शाहजहांपुर। 26 जनवरी 1866 को तत्कालीन उत्तर-पश्चिम प्रांत व अवध क्षेत्र में विधान परिषद गठित करने की घोषणा की गई थी। पांच जनवरी 1887 को प्रांत के उप राज्यपाल अल्फेड लॉयल ने विधान परिषद के लिए नौ सदस्यों को नामित किया था, जिसमें चार भारतीय और पांच अंग्रेज शामिल थे। परिषद की पहली बैठक थार्न हिल मैमोरियल हाल इलाहाबाद में हुई थी, जिसमें डिप्टी गवर्नर जनरल अल्फेड ने अपने भाषण में विधान परिषद की उपयोगिता व महत्व के साथ इलाहाबाद विश्व विद्यालय की स्थापना करने का भी जिक्र किया था।
राजनीति शास्त्र के विद्वान डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा बताते हैं कि पांच जनवरी को विधान परिषद के नौ सदस्य नामित हुए थे। जिसमें जेडब्ल्यू क्विनटन, मौलवी सैयद अहमद, टी कोनोलन, जे उडवर्न, राजा प्रताप नारायण सिंह, एमए मैकोनाघी, राय दुर्गा प्रसाद बहादुर, पंडित अयोध्यानाथ व जीई नाम्स शामिल थे। आठ जनवरी 1887 को हुई पहली बैठक में सदस्य जेडब्ल्यू क्विनटन ने एक प्रस्ताव रखा था, जो विधान परिषद की नियमावली से संबंधित था। जिसमे 45 बिन्दु थे। नियमावली पारित होने के बाद 19 फरवरी 1887 तक के लिए विधान परिषद की बैठक स्थगित कर दी गई थी। 1887 में नवगठित विधान परिषद की पांच बैठकें हुई। 14 नवंबर 1887 को पांचवी बैठक भी इलाहाबाद में ही हुई। डिप्टी गवर्नर जनरल अल्फेड के सभापतित्व में यह अंतिम बैठक थी।
डिप्टी गवर्नर अल्फेड लायल विधान परिषद के गठन में अहम भूमिका निभाई थी। जगदीश चंद्र दीक्षित की पुस्तक ‘यूपी लेजिस्लेटिव काउंसिल’ में परिषद की पहली बैठक में अल्फेड के भाषण का उल्लेख किया है। अपने भाषण में अल्फेड ने कहा कि ‘विधान परिषद एक परियोजना थी जो पूर्ण हो चुकी है, और एक परियोजना है इलाहाबाद विश्व विद्यालय की स्थापना, जिसे अभी साकार करना है।’ अपना भाषण समाप्त करते हुए अल्फेड ने कहा कि ‘परिषद की उपयोगिता और महत्व में निरन्तर अभिवृद्धि होती रहेगी। यह संस्था अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले इस प्रदेश के हितों का भरपूर पोषण करेगी।’
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ब्रिटिश शासन में विधान परिषद के गठन में अल्फेड लायल ने काफी रुचि ली थी। उनके कार्यकाल में एक वर्ष में पांच बैठकें भी हुईं। अल्फेड के बाद बने डिप्टी गवर्नर जनरल आकलैंड काल्विन ने इस संस्था के प्रति कोई रुचि नहीं दिखाई और कई वर्षों तक संस्था महत्वहीन रही।
-डा. नानक चंद्र मेहरोत्रा, सेवानिवृत्त प्राध्यापक राजनीति शास्त्र, एसएस कॉलेज शाहजहांपुर
ये थे पहली विधान परिषद के सदस्य
पं. अयोध्या नाथ
पं. अयोध्या नाथ का जन्म आगरा के एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। इनके पिता दिल्ली के पास झाझर रियासत में दीवान थे। आगरा कालेज में कानून के प्रोफेसर पद पर इनकी नियुक्ति हुई थी। बाद में जब अदालत आगरा से इलाहाबाद आई तो अयोध्या प्रसाद भी इलाहाबाद आ गए।
मौलवी सैयद अहमद खान बहादुर
सैयद अहमद का जन्म 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली के एक परिवार में हुआ था। इनके पिता सैयद मोहम्मद तकी ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी करते थे। सैयद अहमद मैनपुरी में मुंसिफ रहे। मोहम्डन एंग्लो ओरियन्टल कालेज अलीगढ़ की स्थापना के बाद वह काफी चर्चित हुए।
राजा प्रताप नारायण सिंह
13 जुलाई 1855 अयोध्या (फैजाबाद) में प्रताप नारायण सिंह का जन्म हुआ। महदोना रियासत के वह राजा थे। महाराजा की उपाधि 1887 में मिली। 1890 में महदौना रियासत का नाम अयोध्या हो गया। 1895 में उन्हें भारतीय सेनाओं का शाही कमांडर भी बनाया गया। अवध की ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के वह आजीवन अध्यक्ष रहे। विधान परिषद में शुरू के चार साल सदस्य रहे और कुछ वर्ष छोड़कर एक बार चार साल के लिए सदस्य बने।
राय दुर्गा प्रसाद
राय दुर्गा प्रसाद के पिता लाहौर से आकर बनारस में बसे थे। 1843 में उनका जन्म खत्री परिवार में हुआ था। इनके पिता गोरखपुर में खजांची थे। परिवार गोरखपुर में आकर बस गया। राय दुर्गा प्रसाद ने गोरखपुर रीडिंग रूम वाचनालय की स्थापना 1867 में की। 1870 में वह अवैतनिक मजिस्ट्रेट बने। शिक्षा के क्षेत्र में उनका अहम योगदान रहा है। 1891 तक वह विधान परिषद के सदस्य रहे।
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- इलाहाबाद के थार्न हिल मैमोरियल हाल में हुई पहली बैठक
- पहले सत्र में पारित हुई थी विधान परिषद की नियमावली
- इलाहाबाद विवि की स्थापना का डिप्टी गवर्नर जनरल ने लिया था संकल्प
अरुण पाराशरी
शाहजहांपुर। 26 जनवरी 1866 को तत्कालीन उत्तर-पश्चिम प्रांत व अवध क्षेत्र में विधान परिषद गठित करने की घोषणा की गई थी। पांच जनवरी 1887 को प्रांत के उप राज्यपाल अल्फेड लॉयल ने विधान परिषद के लिए नौ सदस्यों को नामित किया था, जिसमें चार भारतीय और पांच अंग्रेज शामिल थे। परिषद की पहली बैठक थार्न हिल मैमोरियल हाल इलाहाबाद में हुई थी, जिसमें डिप्टी गवर्नर जनरल अल्फेड ने अपने भाषण में विधान परिषद की उपयोगिता व महत्व के साथ इलाहाबाद विश्व विद्यालय की स्थापना करने का भी जिक्र किया था।
राजनीति शास्त्र के विद्वान डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा बताते हैं कि पांच जनवरी को विधान परिषद के नौ सदस्य नामित हुए थे। जिसमें जेडब्ल्यू क्विनटन, मौलवी सैयद अहमद, टी कोनोलन, जे उडवर्न, राजा प्रताप नारायण सिंह, एमए मैकोनाघी, राय दुर्गा प्रसाद बहादुर, पंडित अयोध्यानाथ व जीई नाम्स शामिल थे। आठ जनवरी 1887 को हुई पहली बैठक में सदस्य जेडब्ल्यू क्विनटन ने एक प्रस्ताव रखा था, जो विधान परिषद की नियमावली से संबंधित था। जिसमे 45 बिन्दु थे। नियमावली पारित होने के बाद 19 फरवरी 1887 तक के लिए विधान परिषद की बैठक स्थगित कर दी गई थी। 1887 में नवगठित विधान परिषद की पांच बैठकें हुई। 14 नवंबर 1887 को पांचवी बैठक भी इलाहाबाद में ही हुई। डिप्टी गवर्नर जनरल अल्फेड के सभापतित्व में यह अंतिम बैठक थी।
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डिप्टी गवर्नर अल्फेड लायल विधान परिषद के गठन में अहम भूमिका निभाई थी। जगदीश चंद्र दीक्षित की पुस्तक ‘यूपी लेजिस्लेटिव काउंसिल’ में परिषद की पहली बैठक में अल्फेड के भाषण का उल्लेख किया है। अपने भाषण में अल्फेड ने कहा कि ‘विधान परिषद एक परियोजना थी जो पूर्ण हो चुकी है, और एक परियोजना है इलाहाबाद विश्व विद्यालय की स्थापना, जिसे अभी साकार करना है।’ अपना भाषण समाप्त करते हुए अल्फेड ने कहा कि ‘परिषद की उपयोगिता और महत्व में निरन्तर अभिवृद्धि होती रहेगी। यह संस्था अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले इस प्रदेश के हितों का भरपूर पोषण करेगी।’
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ब्रिटिश शासन में विधान परिषद के गठन में अल्फेड लायल ने काफी रुचि ली थी। उनके कार्यकाल में एक वर्ष में पांच बैठकें भी हुईं। अल्फेड के बाद बने डिप्टी गवर्नर जनरल आकलैंड काल्विन ने इस संस्था के प्रति कोई रुचि नहीं दिखाई और कई वर्षों तक संस्था महत्वहीन रही।
-डा. नानक चंद्र मेहरोत्रा, सेवानिवृत्त प्राध्यापक राजनीति शास्त्र, एसएस कॉलेज शाहजहांपुर
ये थे पहली विधान परिषद के सदस्य
पं. अयोध्या नाथ
पं. अयोध्या नाथ का जन्म आगरा के एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। इनके पिता दिल्ली के पास झाझर रियासत में दीवान थे। आगरा कालेज में कानून के प्रोफेसर पद पर इनकी नियुक्ति हुई थी। बाद में जब अदालत आगरा से इलाहाबाद आई तो अयोध्या प्रसाद भी इलाहाबाद आ गए।
मौलवी सैयद अहमद खान बहादुर
सैयद अहमद का जन्म 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली के एक परिवार में हुआ था। इनके पिता सैयद मोहम्मद तकी ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी करते थे। सैयद अहमद मैनपुरी में मुंसिफ रहे। मोहम्डन एंग्लो ओरियन्टल कालेज अलीगढ़ की स्थापना के बाद वह काफी चर्चित हुए।
राजा प्रताप नारायण सिंह
13 जुलाई 1855 अयोध्या (फैजाबाद) में प्रताप नारायण सिंह का जन्म हुआ। महदोना रियासत के वह राजा थे। महाराजा की उपाधि 1887 में मिली। 1890 में महदौना रियासत का नाम अयोध्या हो गया। 1895 में उन्हें भारतीय सेनाओं का शाही कमांडर भी बनाया गया। अवध की ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के वह आजीवन अध्यक्ष रहे। विधान परिषद में शुरू के चार साल सदस्य रहे और कुछ वर्ष छोड़कर एक बार चार साल के लिए सदस्य बने।
राय दुर्गा प्रसाद
राय दुर्गा प्रसाद के पिता लाहौर से आकर बनारस में बसे थे। 1843 में उनका जन्म खत्री परिवार में हुआ था। इनके पिता गोरखपुर में खजांची थे। परिवार गोरखपुर में आकर बस गया। राय दुर्गा प्रसाद ने गोरखपुर रीडिंग रूम वाचनालय की स्थापना 1867 में की। 1870 में वह अवैतनिक मजिस्ट्रेट बने। शिक्षा के क्षेत्र में उनका अहम योगदान रहा है। 1891 तक वह विधान परिषद के सदस्य रहे।