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सूबे के 80 फीसदी गन्ना रकबे  में शाहजहांपुर का डंका

Mon, 26 Sep 2016 11:30 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो  शाहजहांपुर।
अमर उजाला ब्यूरो  शाहजहांपुर। Updated Mon, 26 Sep 2016 11:30 PM IST
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80 per cent of the state cane acreage The trumpets in Shahjahanpur
sugar cane - फोटो : amar ujala
- उ.प्र. गन्ना शोध परिषद ने 112 साल में विकसित कीं गन्ने की 216 प्रजातियां
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उ.प्र. गन्ना शोध परिषद में विकसित गन्ने की प्रजातियों का इस समय पूरे प्रदेश में डंका बजा हुआ है। प्रदेश में इस कुल गन्ना रकबे में करीब 80 फीसदी बोई जा रही गन्ने की प्रजाजियां परिषद के शाहजहांपुर परिसर से विकसित हैं। वर्ष 1912 में स्थापित इस परिषद ने अब तक कुल उन्नत किस्म की 216 प्रजातियां विकसित कर किसानों को मुहैया कराई हैं, जिसके चलते 112 साल पहले 180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहा उत्पादन अब बढ़कर 660 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया है।
सोमवार को परिषद के निदेशक डॉ. बीएल शर्मा ने नकदी फसल के रूप में किसानों में लोकप्रिय गन्ना की खेती को गति देने में परिषद की भूमिका पर मीडिया को जानकारी दी। बताया कि एक प्रजाति के विकास में और उसके परिणामों को पुष्ट कर किसानों को मुहैया कराने में वैज्ञानिकों की टीम को औसतन आठ से 10 वर्ष की अवधि लग जाती है। बीते करीब पांच साल में परिषद के शाहजहांपुर परिसर द्वारा विकसित गन्ना प्रजाति को.षा. 08272, 08276, 08279, 12232 व 11453, यू.पी. 05125 और को.से. 03234 आदि कई प्रजातियां किसानों में लोकप्रिय हुईं। इन प्रजातियों के गुणवत्ता के असर का ही परिणाम है कि पहली बार बीते गन्ना के मौसम में चीनी का परता दर पहली बार 10 फीसदी से ऊपर पहुंचा। यहां विकसित प्रजातियों को अन्य प्रदेशों ने तो अपनाया ही, पड़ोसी मित्र राष्ट्र नेपाल ने भी अपने यहां उगाना शुरू कर दिया है। वहां से 55 अधिकारियों का एक दल यहां उन्नत किस्म व अच्छी पैदावार व चीनी की अच्छी परता देने वाले गन्ना प्रजातियों की खेती की तकनीक भी सीखने गत दिनों पहुंचे थे। 
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डॉ. शर्मा ने बताया कि अगले गन्ने के मौसम तक परिषद कुछ अन्य नई प्रजातियों को किसानों को मुहैया कराने की तैयारी में है ताकि कम लागत और कम सिंचाई में अच्छी पैदावार हासिल हो सके। परिषद के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव पाठक ने बताया कि परिषद किसानों से सीधा संवाद कर फसल में लगने वाले रोग और उनके प्राकृतिक व किफायती उपचार पर भी लगातार काम कर रहा है ताकि रोगों की मार से गन्ने की फसल बची रहे।
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