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संभलकर दागे पटाखे, पड़ सकते हैं मुसीबत में
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,शाहजहांपुर
Updated Tue, 06 Nov 2018 06:28 PM IST
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दिवाली का त्योहार वैसे तो दीपो का पर्व है लेकिन इस दिन लोग खुशी में पटाखें भी छुड़ाते हैं। पटाखा छुड़ाते समय जरा सी भी असावधानी होने पर स्वस्थ जीवन जोखिम में भी पड़ सकता है। वहीं यदि सावधानी के साथ आतिशबाजी और पटाखे छुड़ाएं तो खुशियों का मजा दो गुना नजर आता है। इसलिए पटाखे छुड़ाते समय दुर्घटना से बचने के लिए सावधानी रखना जरूरी है।
दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा के साथ ही लोगों में खासकर युवाओं औ बच्चों में आतिशबाजी, पटाखा छुड़ाने की होड़ सी रहती है, इस खुशी में मठोलाएं और बुजुर्ग भी शामिल रहते हैं। पटाखा और आतिशबाजी के तेज शोर से जहां ध्वनि प्रदूषण रहता है वहीं वातावरण में धुएं की मात्रा बढ़ने से वायु प्रदूषण बढ़ जाता है, बारूद व केमिकल के धुएं से सांस के मरीजों को सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। सांस फूलने से मरीज परेशान हो जाते हैं, इसी तरह पटाखों की तेज आवाज से हृदयरोगी भी परेशानी में आ जाते हैं। हृदयगति बढ़ने से उनके स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। तेज आवाज से बड़ों के साथ खासकर छोटे बच्चों के कान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तेज धुआं से आंखों में भी जलन व आंसू आने लगते हैं। इसके अलावा जरा सी चूक होने पर जलने की भी दुर्घटनाएं भी अक्सर होती हैं। इसलिए सावधानी जरूरी है।
पटाखा छुड़ाते समय रखें सावधानियां-
-पटाखा, आतिशबाजी खुली जगह में छुड़ाए,
-फुस्स हुए पटाखों को दोबारा छुड़ाने के चक्कर में न पड़े
-पटाखा छोड़ते समय लंबी लकड़ी में मोमबत्ती लगाकर पटाखा छुड़ाएं
-पटाखा छोड़ते समय आंखों में चश्मा और जूते का प्रयोग अवश्य करें
पटाखा छोड़ने वाले स्थान के आसपास ज्वलनशील चीजें न रखें
यदि पटाखा छुड़ाते समय जल जाते हैं तो जलने वाले स्थान को पानी में डूबों दें, इससे जलन कम हो जाएगी। फौरी तौर पर नारियल का तेल या कोई ठंडी क्रीम लगा सकते हैं। सिल्वर सल्फेट क्रीम सबसे कारगर है। यदि मरीज गंभीर है तो तत्काल नजदीकी या सरकारी अस्पताल पहुंचे। पटाखा से छुड़ाने के बाद निकलने वाला धुआं सास के मरीजों के लिए घातक है। इससे आंखों में भी जलन होता है। इसलिए बचकर रहें।
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डॉ. श्रीपाल, त्वचा रोग विशेषज्ञ जिला अस्पताल
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दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा के साथ ही लोगों में खासकर युवाओं औ बच्चों में आतिशबाजी, पटाखा छुड़ाने की होड़ सी रहती है, इस खुशी में मठोलाएं और बुजुर्ग भी शामिल रहते हैं। पटाखा और आतिशबाजी के तेज शोर से जहां ध्वनि प्रदूषण रहता है वहीं वातावरण में धुएं की मात्रा बढ़ने से वायु प्रदूषण बढ़ जाता है, बारूद व केमिकल के धुएं से सांस के मरीजों को सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। सांस फूलने से मरीज परेशान हो जाते हैं, इसी तरह पटाखों की तेज आवाज से हृदयरोगी भी परेशानी में आ जाते हैं। हृदयगति बढ़ने से उनके स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। तेज आवाज से बड़ों के साथ खासकर छोटे बच्चों के कान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तेज धुआं से आंखों में भी जलन व आंसू आने लगते हैं। इसके अलावा जरा सी चूक होने पर जलने की भी दुर्घटनाएं भी अक्सर होती हैं। इसलिए सावधानी जरूरी है।
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पटाखा छुड़ाते समय रखें सावधानियां-
-पटाखा, आतिशबाजी खुली जगह में छुड़ाए,
-फुस्स हुए पटाखों को दोबारा छुड़ाने के चक्कर में न पड़े
-पटाखा छोड़ते समय लंबी लकड़ी में मोमबत्ती लगाकर पटाखा छुड़ाएं
-पटाखा छोड़ते समय आंखों में चश्मा और जूते का प्रयोग अवश्य करें
पटाखा छोड़ने वाले स्थान के आसपास ज्वलनशील चीजें न रखें
यदि पटाखा छुड़ाते समय जल जाते हैं तो जलने वाले स्थान को पानी में डूबों दें, इससे जलन कम हो जाएगी। फौरी तौर पर नारियल का तेल या कोई ठंडी क्रीम लगा सकते हैं। सिल्वर सल्फेट क्रीम सबसे कारगर है। यदि मरीज गंभीर है तो तत्काल नजदीकी या सरकारी अस्पताल पहुंचे। पटाखा से छुड़ाने के बाद निकलने वाला धुआं सास के मरीजों के लिए घातक है। इससे आंखों में भी जलन होता है। इसलिए बचकर रहें।
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डॉ. श्रीपाल, त्वचा रोग विशेषज्ञ जिला अस्पताल