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Sant Kabir Nagar News: नगाड़ों की थाप और फाग गीतों की सुरलहरियों पर झूमते थे लोग

Sun, 16 Feb 2025 11:55 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर Updated Sun, 16 Feb 2025 11:55 PM IST
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People used to dance to the beats of drums and the tunes of Phag songs.
कवि रंगपाल।
हरिहरपुर। आधुनिकता की अंधी दौड़ में विलुप्त होती गंवई परंपरा में लोकप्रिय रहे, फाग के राग आज भी हरिहरपुर और आस पास के गांवो में सुनाई देते हैं। आज से महज कुछ साल पहले बसंत ऋतु आते ही लोग नगाड़ों की थाप और फाग गीतों की सुरलहरियों पर झूमते थे। कवि रंगपाल की 20 फरवरी को जयंती मनाई जाएगी।
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नगर पंचायत हरिहरपुर के रहने वाले फाग गायक अजय श्रीवास्तव, राम किसोर, प्रेम, राम बचन गुप्ता आदि लोगों ने अपनी यादों को साझा करते हुए बताया कि खेतों में सरसों के पीले फूल और पछुवा हवा के झोकों के बीच फागुनी बयार की अलग ही खुशबू थी। गायकों की टोलियां गांव-गांव फाग गीत गाते थे जिसकी मनमोहक धुन पर लोग झूम उठते थे। फाग गीतों में सबसे लोकप्रिय कवि रंगापाल की रचनाएं आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती हैं क्योंकि फाग विधा के रचनाकार कवि रंगपाल का जन्म भी हरिहरपुर में ही हुआ था।
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नगर पंचायत हरिहरपुर में 20 फरवरी 1864 में जन्मे कवि रंगपाल के लिखे फाग गीतों में सुग्राह्य भाषा सौंदर्य और शृंगार रस का अनूठा मेल है। उनकी रचनाएं, बीती रात जुन्हइया रे...नहिं मानत दइया..,औरन संग रैन बिताते हो बालम भोर भए घर आते..., ऋतुपति गयौ आय, हाय गुंजन लागे भंवरा...,जैसे फाग गीत आज भी लोगों को लुभाते हैं। कवि रंगपाल ने अवधी और ब्रजभाषा में करीब साढ़े सात सौ फाग गीतों की रचना की है। उनके गीत लोगों के दिलों में ऐसे रच बस गए हैं कि डेढ़ सदी से अधिक समय बीत जाने के बावजूद भी उनके लिखे फाग गायन को सुनकर लोग उमंग से भर उठते हैं।
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भारतेंदु हरिश्चंद्र के समकालीन कवि रहे रंगपाल को भारतेंदु जी ने महाकवि की उपाधि से नवाजा भी था। गांव की माटी से उठकर सात समंदर पार विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के लोग आज भी उनकी रचनाओं को फागुन मास में गुनगुनाते हैं। कवि रंगपाल की माता सुशीला देवी संस्कृत और हिंदी की उत्कृष्ट कवियित्री थी। माता की सृजनात्मकता का असर रहा कि स्कूली शिक्षा से दूर होते हुए भी रंगपाल को संगीत और साहित्य की गहरी समझ थी। कवि रंगपाल के लिखे फाग पूरी तरह लय-ताल में निबद्ध हैं। इनके फाग गीतों में भाषा सौंदर्य की रसात्मकता का अद्भुत समन्वय भी है।





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जीर्णशीर्ण हुई कवि रंगपाल की समाधि



हरिहरपुर निवासी सेवा निवृत शिक्षक भगवान दास ने बताया कि कठिनइया नदी पुल के किनारे कवि रंगपाल की समाधि बनी हुई है जो इस समय जीर्ण शीर्ण हो चुकी है। उन्होंने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि स्वर्गीय शिक्षक राम भरोसे पांडेय के साथ हम लोगों ने नगर पंचायत के लोगों से एक एक रुपया चंदा इकट्ठा करके कवि की समाधि बनवाई थी। अब समाधि की दशा दयनीय हो गई है। उसके टूटे पत्थर और चारों ओर उगे झाड़ समाधि की दुर्दशा बता रहे हैं।



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भारतेंदु युग के कवि थे रंगपाल





हरिहरपुर। नगर पंचायत के पूर्व चेयरमैन व पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष बृजेश पाल ने बताया कि कवि रंगपाल भारतेंदु हरिश्चंद्र के समकालीन कवि थे।इसका प्रमाण उनकी रचनाओं में भी मिलता है। कवि की उम्दा रचनाओं के चलते भारतेंदु जी ने उन्हें महाकवि की उपाधि दी थी।



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उनकी रचनाओं में देश के योद्धाओं की वीरगाथा भी



हरिहरपुर। हरिहरपुर के गायक अजय श्रीवास्तव ने बताया कि कवि की रचनाओं में जहां नायक नायिका के मिलन, विरह, शृंगार और सौंदर्य की प्रधानता है वहीं वीर-वीरेश जैसे संग्रह में महाराणा प्रताप और छत्रशाल की वीरता को बताती रचना भी है। उन्होंने महारानी पद्मावत के वीरता का वर्णन करते हुए लिखा है। धीरता, धर्म, उदारता आगरी चंडिका वीरता माही प्रमानी, प्राण प्यारे के संग सनेह जू स्वर्ग गई पद्मावत रानी।





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20 फरवरी को मनाई जाती है कवि रंगपाल की जयंती

हरिहरपुर। नगर पंचायत हरिहरपुर में हर साल बीस फरवरी को कवि रंगपाल की जयंती समारोह का आयोजन राष्ट्रीय एकीकरण और सांप्रदायिक सौहार्द के रूप में होता है। पाल सेवा संस्थान के आयोजन में कार्यक्रम की अगुआई पूर्व चेयरमैन बृजेश पाल करते हैं। जिसमें स्थानीय और जिले भर से कवि रंगपाल के चाहने वाले पहुंचते हैं। इस दौरान गायक ढोल,नगाड़े की थाप पर कवि की रचनाओं की प्रस्तुति भी देते हैं।




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ये हैं कवि रंगपाल की प्रमुख रचनाएं







हरिहरपुर। कवि की रचनाओं में पशु पक्षियों से उनका लगाव साफ झलकता है। उनकी रचना में पक्षियों पर केंद्रित ''खगनामा'' और उनके पालतू कुत्ते के प्रति उनका स्नेह उनकी रचना ''मित्तू विरह'' पशु प्रेम को दर्शाती है। अन्य रचनाओं में अंगादर्श, रसिका नंद, प्रेम लतिका, सज्जनानंद, शांत रसार्णव, रंग उमंग, गीत सुधानिधि, रंग महोदधि, ऋतु रहस्य, नीति चंद्रिका, फूलनामा, छत्रपति शिवाजी, वीर विरुद, गो दुर्दशा, दोहावली और दर्पण हैं।
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