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कबीर की समाधि पर चढ़ाई खिचड़ी
अमर उजाला ब्यूरो/संतकबीरनगर
Updated Sat, 14 Jan 2017 11:49 PM IST
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मगहर कबीर चौरा पर खिचड़ी चढ़ाते श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
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मगहर/संतकबीरनगर। मकर संक्रांति पर मगहर स्थित कबीर की समाधि और मजार पर सैकड़ों वर्षों से खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा शनिवार को भी निभाई गई। भोर होते ही क्षेत्र के हजारों की संख्या में श्रद्धालु खिचड़ी चढ़ाने कबीर चौरा पर जुटने लगे। इस दौरान कबीर चौरा परिसर में लगे मेले का भी लोगों ने आनंद उठाया।
कबीर चौरा परिसर में स्थापित कबीर की समाधि और मजार पर सुबह से खिचड़ी चढ़ाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह दिन भर चलता रहा। इस दौरान लोगों ने संत कबीर का दर्शन कर आशीर्वाद मांगा। कबीर चौरा के केशव दास ने बताया कि खिचड़ी का पर्व वर्षों से मनाते चले आ रहे हैं। खिचड़ी चढ़ाकर मनोकामना पूर्ति का भाव लेकर यहां आने वाले श्रद्धालु संतोष का अनुभव करते हैं। संत के दरबार में आने वाले संत इसे परम सात्विक संदेश मानते हुए आपसी तालमेल का प्रतीक बताते हैं। ये सामाजिक समरसता के साथ आपसी प्रेम व्यवहार का भी प्रतीक है। माघ महीने में ही कबीर ने समाधि ली थी, इसलिए यहां यह पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
उन्होंने बताया कि प्रदेश के अन्य जिलों से आए हुए संत भजन कीर्तन करते हुए श्रद्धा का भाव प्रकट करते हैं। उन्होंने पुरानी कथा बताते हुए कहा कि जगन्नाथपुरी में स्वामी रामानंद तथा उनके शिष्यों के साथ बैठी पंगत में खिचड़ी खाने के लिए कबीर साहब भी बैठे हुए थे, पर उन्हें देखकर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। परंतु जब खिचड़ी चढ़ाने मंदिर पहुंचे तो वहां भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में उन्हें कबीर के दर्शन हुए, फिर सबका भ्रम दूर हुआ।
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कबीर चौरा परिसर में स्थापित कबीर की समाधि और मजार पर सुबह से खिचड़ी चढ़ाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह दिन भर चलता रहा। इस दौरान लोगों ने संत कबीर का दर्शन कर आशीर्वाद मांगा। कबीर चौरा के केशव दास ने बताया कि खिचड़ी का पर्व वर्षों से मनाते चले आ रहे हैं। खिचड़ी चढ़ाकर मनोकामना पूर्ति का भाव लेकर यहां आने वाले श्रद्धालु संतोष का अनुभव करते हैं। संत के दरबार में आने वाले संत इसे परम सात्विक संदेश मानते हुए आपसी तालमेल का प्रतीक बताते हैं। ये सामाजिक समरसता के साथ आपसी प्रेम व्यवहार का भी प्रतीक है। माघ महीने में ही कबीर ने समाधि ली थी, इसलिए यहां यह पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
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उन्होंने बताया कि प्रदेश के अन्य जिलों से आए हुए संत भजन कीर्तन करते हुए श्रद्धा का भाव प्रकट करते हैं। उन्होंने पुरानी कथा बताते हुए कहा कि जगन्नाथपुरी में स्वामी रामानंद तथा उनके शिष्यों के साथ बैठी पंगत में खिचड़ी खाने के लिए कबीर साहब भी बैठे हुए थे, पर उन्हें देखकर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। परंतु जब खिचड़ी चढ़ाने मंदिर पहुंचे तो वहां भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में उन्हें कबीर के दर्शन हुए, फिर सबका भ्रम दूर हुआ।
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