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Sant Kabir Nagar News: धर्मसिंहवा बौद्ध स्तूप मार्ग का होगा सुंदरीकरण
Tue, 03 Feb 2026 11:49 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
Updated Tue, 03 Feb 2026 11:49 PM IST
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धर्मसिंहवा का बौद्ध टीला-संवाद
धर्मसिंहवा। धर्मसिंहवा बौद्ध स्तूप मार्ग का संुदरीकरण किया जाएगा। इस मार्ग के दोनों तरफ लाइट लगेंगी। इसका नाम गौरव पथ होगा। नगर पंचायत ने इसका प्रस्ताव शासन को भेज दिया है। वहीं, कोपिया के बौद्ध टीला के विकास की आस है। इसका कुछ साल पहले सौंदर्यीकरण किया गया था लेकिन उसके बाद यहां का विकास ठप हो गया है। दो साल पहले पर्यटन विभाग से इसके सौंदर्यीकरण का प्रस्ताव गया था, लेकिन अभी मामला अटका हुआ है।
नगर पंचायत धर्मसिंहवा स्थित बौद्ध स्तूप स्थल को जोड़ने वाले मार्ग को आने वाले दिनों में गौरव पथ के नाम से जाना जाएगा। नगर पंचायत प्रशासन ने इस मार्ग के सुंदरीकरण कराए जाने की डीपीआर बनाकर प्रस्ताव शासन को भेजा है। नगर पंचायत प्रशासन की माने तो जल्द ही प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाएगी। धर्मसिंहवा के बौद्ध स्तूप स्थल से जुड़ने वाले मार्ग को हाईटेक किए जाने की व्यवस्था की जा रही है। मार्ग के दोनों तरफ इंटरलॉकिंग और पथ प्रकाश की व्यवस्था की जा रही है।
नगर पंचायत के धर्मसिंहवा -गौरी राई से बढ़या वार्ड को जा रहे मार्ग से बौद्ध स्तूप स्थल मार्ग के सुदृढ़ीकरण को लेकर प्रस्ताव भेजा गया है। इससे पूर्व बौद्ध स्तूप स्थल के विकास को लेकर पूर्व विधायक राकेश सिंह बघेल के प्रस्ताव पर जल निगम विभाग द्वारा पूर्व में कुछ कार्य कराए गए थे, जिसमें स्तूप स्थल के चारों तरफ बाउंड्री वॉल इंटरलॉकिंग का कार्य शामिल था।
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अधिशाषी अधिकारी नगर पंचायत धर्मसिंहवा आशुतोष ने कहाकि बौद्ध स्तूप टीला मार्ग को गौरव पथ से जोड़ने का प्रस्ताव भेजा गया है। उम्मीद है इस प्रस्ताव को जल्द ही मंजूरी मिल जाएगी। इससे यहां पर्यटन बढ़ेगा और क्षेत्र का विकास होगा।
धम्म संघ महोत्सव के आयोजन की मांग
धर्मसिंहवा। नगर पंचायत धर्मसिंहवा में बौद्ध परंपरा से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने की मांग तेज हो गई है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने धर्मसिंहवा में धम्म संघ महोत्सव के आयोजन की मांग उठाई है। उनका कहना है कि इससे क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को नया जीवन मिलेगा। धर्मसिंहवा कस्बे के समीप स्थित प्राचीन बौद्ध स्तूप इस क्षेत्र की पहचान का प्रमुख प्रतीक माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार कभी यह क्षेत्र ‘धम्मासंघ’ के नाम से जाना जाता था और यहां बौद्ध भिक्षुओं का समागम होता था।
स्तूप के पास स्थित प्राचीन पोखरा भी उस कालखंड की याद दिलाता है, लेकिन वर्तमान में संरक्षण के अभाव में यह विरासत उपेक्षित नजर आ रही है। वर्ष 2022 में नगर पंचायत का दर्जा मिलने के बाद सड़कों, नालियों, प्रकाश व्यवस्था और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ, परंतु स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास कार्यों में बौद्ध स्तूप और सांस्कृतिक धरोहरों को प्राथमिकता नहीं दी गई।
वर्ष 2019 में बौद्ध स्तूप के सुंदरीकरण के लिए लगभग 48.11 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत हुई थी, जिसमें बाउंड्री निर्माण, विद्युतीकरण, आवागमन मार्ग, पोखरे के चारों ओर इंटरलॉकिंग, स्ट्रीट लाइट और संग्रहालय निर्माण शामिल था, लेकिन अधिकांश कार्य अब भी अधूरे हैं।
इंदल राव, शिवा वर्मा, प्रमोद कुमार, रमेश, बैजनाथ, रामचंद्र, सुरेश, पवन, सूरज, राजाराम, प्रकाश, सौरभ जायसवाल, सुधीर, फूलचंद आदि स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि धर्मसिंहवा में धम्म संघ महोत्सव का आयोजन किया जाता है तो यह क्षेत्र सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित हो सकता है। इससे न केवल नगर पंचायत की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय कलाकारों, शिल्पकारों और छोटे व्यापारियों को भी रोजगार के अवसर मिलेंगे। लोगों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से अधूरी योजनाओं को शीघ्र पूरा कराने की मांग की है। साथ ही धम्म संघ महोत्सव आयोजित कर धर्मसिंहवा की ऐतिहासिक विरासत को विकास से जोड़ा जाए।
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कोपिया बौद्ध टीले को विकास का है इंतजार
तिघरा। कोपिया में स्थित बौद्ध टीले के बारे में एचआर पीजी कॉलेज के प्राचीन इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रताप विजय कुमार बताते हैं कि यह टीले पर 2600 वर्ष पहले से ही मानव सभ्यता के विकास की बात कही जाती है। यहां पर उस समय भी आवास बनाने के लिए ईंट का प्रयोग होता था। यहां पर खुदाई में मनके, तांबे के सिक्के, मृदभांड, ईंटें आदि भी मिले हैं। वहीं देवी-देवताओं की मिट्टी की मूर्ति भी प्राप्त हुई है। बताया जाता है कि घर से शांति की खोज में निकले भगवान बुद्ध ने अपने राजसी वस्त्रों का परित्याग कर दिया था और अपने सारथी मातुल के साथ वापस भेज दिया।
इसी सभ्यता में रहकर एक माह तक उन्होंने कोपिया में स्थित शिव मंदिर में पूजा की और एक माह बाद यहां से वह खलीलाबाद के चकदही में स्थित कुदवा नाले को पार किया तथा महाभारतकालीन तामेश्वरनाथ मंदिर से पूजा के बाद सारनाथ के लिए रवाना हो गए। इस टीले पर एक मंदिर है, इसके साथ ही साथ वहां पर कई काश्तकारों की जमीन भी है। पर्यटन विभाग ने दो वर्ग किलोमीटर में फैले इस टीले को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया है। इसके लिए प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है। लेकिन अब तक सीमांकन के और कोई कार्य नहीं हो सके हैं। स्थानीय सुंदर, जय प्रकाश, संदीप आदि ने बताया कि कोपिया टीले का विकास जरूरी है ताकि लोग यहां पर पर्यटन के रूप में आ सके और बुद्ध के बारे में जानकारी ले सके।
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नगर पंचायत धर्मसिंहवा स्थित बौद्ध स्तूप स्थल को जोड़ने वाले मार्ग को आने वाले दिनों में गौरव पथ के नाम से जाना जाएगा। नगर पंचायत प्रशासन ने इस मार्ग के सुंदरीकरण कराए जाने की डीपीआर बनाकर प्रस्ताव शासन को भेजा है। नगर पंचायत प्रशासन की माने तो जल्द ही प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाएगी। धर्मसिंहवा के बौद्ध स्तूप स्थल से जुड़ने वाले मार्ग को हाईटेक किए जाने की व्यवस्था की जा रही है। मार्ग के दोनों तरफ इंटरलॉकिंग और पथ प्रकाश की व्यवस्था की जा रही है।
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नगर पंचायत के धर्मसिंहवा -गौरी राई से बढ़या वार्ड को जा रहे मार्ग से बौद्ध स्तूप स्थल मार्ग के सुदृढ़ीकरण को लेकर प्रस्ताव भेजा गया है। इससे पूर्व बौद्ध स्तूप स्थल के विकास को लेकर पूर्व विधायक राकेश सिंह बघेल के प्रस्ताव पर जल निगम विभाग द्वारा पूर्व में कुछ कार्य कराए गए थे, जिसमें स्तूप स्थल के चारों तरफ बाउंड्री वॉल इंटरलॉकिंग का कार्य शामिल था।
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अधिशाषी अधिकारी नगर पंचायत धर्मसिंहवा आशुतोष ने कहाकि बौद्ध स्तूप टीला मार्ग को गौरव पथ से जोड़ने का प्रस्ताव भेजा गया है। उम्मीद है इस प्रस्ताव को जल्द ही मंजूरी मिल जाएगी। इससे यहां पर्यटन बढ़ेगा और क्षेत्र का विकास होगा।
धम्म संघ महोत्सव के आयोजन की मांग
धर्मसिंहवा। नगर पंचायत धर्मसिंहवा में बौद्ध परंपरा से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने की मांग तेज हो गई है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने धर्मसिंहवा में धम्म संघ महोत्सव के आयोजन की मांग उठाई है। उनका कहना है कि इससे क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को नया जीवन मिलेगा। धर्मसिंहवा कस्बे के समीप स्थित प्राचीन बौद्ध स्तूप इस क्षेत्र की पहचान का प्रमुख प्रतीक माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार कभी यह क्षेत्र ‘धम्मासंघ’ के नाम से जाना जाता था और यहां बौद्ध भिक्षुओं का समागम होता था।
स्तूप के पास स्थित प्राचीन पोखरा भी उस कालखंड की याद दिलाता है, लेकिन वर्तमान में संरक्षण के अभाव में यह विरासत उपेक्षित नजर आ रही है। वर्ष 2022 में नगर पंचायत का दर्जा मिलने के बाद सड़कों, नालियों, प्रकाश व्यवस्था और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ, परंतु स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास कार्यों में बौद्ध स्तूप और सांस्कृतिक धरोहरों को प्राथमिकता नहीं दी गई।
वर्ष 2019 में बौद्ध स्तूप के सुंदरीकरण के लिए लगभग 48.11 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत हुई थी, जिसमें बाउंड्री निर्माण, विद्युतीकरण, आवागमन मार्ग, पोखरे के चारों ओर इंटरलॉकिंग, स्ट्रीट लाइट और संग्रहालय निर्माण शामिल था, लेकिन अधिकांश कार्य अब भी अधूरे हैं।
इंदल राव, शिवा वर्मा, प्रमोद कुमार, रमेश, बैजनाथ, रामचंद्र, सुरेश, पवन, सूरज, राजाराम, प्रकाश, सौरभ जायसवाल, सुधीर, फूलचंद आदि स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि धर्मसिंहवा में धम्म संघ महोत्सव का आयोजन किया जाता है तो यह क्षेत्र सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित हो सकता है। इससे न केवल नगर पंचायत की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय कलाकारों, शिल्पकारों और छोटे व्यापारियों को भी रोजगार के अवसर मिलेंगे। लोगों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से अधूरी योजनाओं को शीघ्र पूरा कराने की मांग की है। साथ ही धम्म संघ महोत्सव आयोजित कर धर्मसिंहवा की ऐतिहासिक विरासत को विकास से जोड़ा जाए।
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कोपिया बौद्ध टीले को विकास का है इंतजार
तिघरा। कोपिया में स्थित बौद्ध टीले के बारे में एचआर पीजी कॉलेज के प्राचीन इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रताप विजय कुमार बताते हैं कि यह टीले पर 2600 वर्ष पहले से ही मानव सभ्यता के विकास की बात कही जाती है। यहां पर उस समय भी आवास बनाने के लिए ईंट का प्रयोग होता था। यहां पर खुदाई में मनके, तांबे के सिक्के, मृदभांड, ईंटें आदि भी मिले हैं। वहीं देवी-देवताओं की मिट्टी की मूर्ति भी प्राप्त हुई है। बताया जाता है कि घर से शांति की खोज में निकले भगवान बुद्ध ने अपने राजसी वस्त्रों का परित्याग कर दिया था और अपने सारथी मातुल के साथ वापस भेज दिया।
इसी सभ्यता में रहकर एक माह तक उन्होंने कोपिया में स्थित शिव मंदिर में पूजा की और एक माह बाद यहां से वह खलीलाबाद के चकदही में स्थित कुदवा नाले को पार किया तथा महाभारतकालीन तामेश्वरनाथ मंदिर से पूजा के बाद सारनाथ के लिए रवाना हो गए। इस टीले पर एक मंदिर है, इसके साथ ही साथ वहां पर कई काश्तकारों की जमीन भी है। पर्यटन विभाग ने दो वर्ग किलोमीटर में फैले इस टीले को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया है। इसके लिए प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है। लेकिन अब तक सीमांकन के और कोई कार्य नहीं हो सके हैं। स्थानीय सुंदर, जय प्रकाश, संदीप आदि ने बताया कि कोपिया टीले का विकास जरूरी है ताकि लोग यहां पर पर्यटन के रूप में आ सके और बुद्ध के बारे में जानकारी ले सके।

धर्मसिंहवा का बौद्ध टीला-संवाद

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