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Sant Kabir Nagar News: ओडीओपी से भी नहीं चमका बखिरा के बर्तन का उद्योग
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बखिरा में बर्तन में डिजाइन बनाते कारीगर।
- पांच साल पहले इस उद्योग को ओडीओपी में किया गया था शामिल
- 10.57 करोड़ की लागत से अत्याधुनिक मशीन क्रय और भवन का होना था निर्माण
- 150 साल पुराना है फूल, पीतल और गिलट के बर्तनों का उद्योग
संतकबीरनगर। एक जिला एक उत्पाद योजना में बखिरा बर्तन उद्योग को शासन ने पांच साल पहले शामिल किया था। इसके बाद भी इस उद्योग की चमक फीकी है। दो साल पहले 10.57 करोड़ रुपये की लागत से कॉमन फैसिलिटी सेंटर के लिए भवन का निर्माण होना था। इसमें अत्याधुनिक मशीनें लगाई जानी थी। भवन का काम अधूरा है। मशीनें अभी तक नहीं आई है। इस कारण उद्योग से जुड़े लोगों के चेहरे पर मायूसी झलक रही है।
बखिरा कस्बे में 150 साल से फूल, पीतल और गिलट के बर्तन का काम शुरू हुआ। करीब दो सौ परिवार इस उद्योग से सीधे जुड़े हैं। इन हुनरमंद कारीगरों द्वारा लोटा, गिलास, कटोरा, थाल, परात, बटुली, गगरा, कड़ाही का निर्माण किया जाता था। वहीं, कस्बे में दो रोलिंग मिल भी है। 20 साल पहले कच्चे माल की कमी, मूल्य में वृद्धि, पूंजी की कमी के कारण पूरा उद्योग चौपट हो गया। 200 परिवार पर रोटी का संकट गहराने लगा।
सहालग तक सिमटा मांग
अचानक से आए संकट से 200 परिवार के करीब दो हजार कारीगर बेकार हो गए। यहां के बर्तनों की मांग सिर्फ शादी तक ही सिमट गई। कारीगर रोजगार की तलाश में पलायन कर गए। बर्तन उद्योग से जुड़े संजय, भीम और जगन्नाथ ने बताया कि दो दशक पहले घर-घर बर्तन बनाया जाता था। नेपाल के बुटवल, भैरहवां, बढ़नी सहित कई दूर दराज इलाके तक बर्तन की आपूर्ति होती थी। लेकिन अब सब बंद हो गया है। ओडीओपी के तहत इसका चयन भी हुआ, फिर भी बर्तन कारीगरों को कोई लाभ नहीं मिल पाया।
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पहले बर्तन कारोबार से काफी खुशहाल थे। लेकिन दो दशक पूर्व से बर्तन निर्माण कार्य लड़खड़ाने लगा था। धीरे-धीरे काम बंद होने लगा है। ओडीओपी में कुछ उम्मीद जगी थी, लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ।
- गुड्डू वर्मा
बर्तन उद्योग के लिए एक जिला एक उत्पाद में चयन हुए पांच वर्ष बीतने को है, लेकिन अभी तक कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है। कामन फैसिलिटी सेंटर आधा अधूरा ही बन पाया और मशीनें भी नहीं आई।
- राज कुमार कसेरा
बखिरा बर्तन उद्योग के लिए जो भी मदद होगी वह की जाएगी। इस उद्योग को बढ़ाने का प्रयास होगा। ओडीओपी के तहत जो लाभ मिलना है, उसे दिलाया जाएगा।
- महेंद्र सिंह तंवर, डीएम
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- 10.57 करोड़ की लागत से अत्याधुनिक मशीन क्रय और भवन का होना था निर्माण
- 150 साल पुराना है फूल, पीतल और गिलट के बर्तनों का उद्योग
संतकबीरनगर। एक जिला एक उत्पाद योजना में बखिरा बर्तन उद्योग को शासन ने पांच साल पहले शामिल किया था। इसके बाद भी इस उद्योग की चमक फीकी है। दो साल पहले 10.57 करोड़ रुपये की लागत से कॉमन फैसिलिटी सेंटर के लिए भवन का निर्माण होना था। इसमें अत्याधुनिक मशीनें लगाई जानी थी। भवन का काम अधूरा है। मशीनें अभी तक नहीं आई है। इस कारण उद्योग से जुड़े लोगों के चेहरे पर मायूसी झलक रही है।
बखिरा कस्बे में 150 साल से फूल, पीतल और गिलट के बर्तन का काम शुरू हुआ। करीब दो सौ परिवार इस उद्योग से सीधे जुड़े हैं। इन हुनरमंद कारीगरों द्वारा लोटा, गिलास, कटोरा, थाल, परात, बटुली, गगरा, कड़ाही का निर्माण किया जाता था। वहीं, कस्बे में दो रोलिंग मिल भी है। 20 साल पहले कच्चे माल की कमी, मूल्य में वृद्धि, पूंजी की कमी के कारण पूरा उद्योग चौपट हो गया। 200 परिवार पर रोटी का संकट गहराने लगा।
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सहालग तक सिमटा मांग
अचानक से आए संकट से 200 परिवार के करीब दो हजार कारीगर बेकार हो गए। यहां के बर्तनों की मांग सिर्फ शादी तक ही सिमट गई। कारीगर रोजगार की तलाश में पलायन कर गए। बर्तन उद्योग से जुड़े संजय, भीम और जगन्नाथ ने बताया कि दो दशक पहले घर-घर बर्तन बनाया जाता था। नेपाल के बुटवल, भैरहवां, बढ़नी सहित कई दूर दराज इलाके तक बर्तन की आपूर्ति होती थी। लेकिन अब सब बंद हो गया है। ओडीओपी के तहत इसका चयन भी हुआ, फिर भी बर्तन कारीगरों को कोई लाभ नहीं मिल पाया।
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पहले बर्तन कारोबार से काफी खुशहाल थे। लेकिन दो दशक पूर्व से बर्तन निर्माण कार्य लड़खड़ाने लगा था। धीरे-धीरे काम बंद होने लगा है। ओडीओपी में कुछ उम्मीद जगी थी, लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ।
- गुड्डू वर्मा
बर्तन उद्योग के लिए एक जिला एक उत्पाद में चयन हुए पांच वर्ष बीतने को है, लेकिन अभी तक कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है। कामन फैसिलिटी सेंटर आधा अधूरा ही बन पाया और मशीनें भी नहीं आई।
- राज कुमार कसेरा
बखिरा बर्तन उद्योग के लिए जो भी मदद होगी वह की जाएगी। इस उद्योग को बढ़ाने का प्रयास होगा। ओडीओपी के तहत जो लाभ मिलना है, उसे दिलाया जाएगा।
- महेंद्र सिंह तंवर, डीएम