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हथौड़ा चलाकर खुद के साथ भाई-बहनों की बदली तकदीर

Mon, 07 Mar 2022 10:32 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 07 Mar 2022 10:32 PM IST
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Along with himself, the fate of brothers and sisters also changed by hammering
उर्मिला - फोटो : KHALILABAD
हथौड़ा चलाकर खुद के साथ भाई-बहनों की भी बदली तकदीर
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उर्मिला ने कर्ज से दुकान खोली और बन गई लाखों की मालकिन
धनघटा/संतकबीरनगर। बीमार पिता के इलाज और भाई-बहनों की परवरिश में ससुराल के लोग जब बाधा बनने लगे तो उर्मिला ने खुद की जिंदगी की परवाह किए बिना ससुराल को छोड़ दिया। कर्ज लेकर लोहे की दुकान खोली और खुद के साथ भाइयों की तकदीर बदल दी। उर्मिला की मेहनत और सफलता की लोग दाद दे रहे हैं।
धनघटा क्षेत्र के किठिऊरी गांव निवासी राम बख्श विश्वकर्मा की चार बेटियों और दो बेटों में 40 वर्षीय उर्मिला सबसे बड़ी हैे। राम बख्श घर पर लोहे का कारोबार कर परिवार का भरण-पोषण करते थे। वर्ष 1995 में उनकी उंगली में काम करते समय चोट आ गई, जिससे टिटनेस हो गया। यहीं से घर की माली हालत बिगड़ने लगी और पिता के इलाज में आर्थिक तंगी सामने आ गई। घर की माली हालत को संभालने के लिए उर्मिला गांव निवासी एक शख्स से वर्ष 1998 में 4000 रुपये ब्याज पर कर्ज लिया। उसी रकम से मलौली चौराहे पर आलमारी, बॉक्स बनाने का कारोबार शुरू किया।
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वर्ष 2000 में उर्मिला की शादी निहैला गांव में हो गई और वह ससुराल चली गईं, लेकिन उसका ध्यान पिता और छोटे भाई-बहनों पर लगा रहा। वर्ष 2002 में पिता की मौत हो गई, तो उर्मिला ससुराल से मायके आ गईं। मायके में पिता का क्रिया कर्म संपन्न हुआ, तो ससुराल के लोग ले जाने के लिए जिद करने लगे। ऐसे में उर्मिला ने भाई और बहनों को बेसहारा न छोड़ने का निर्णय करते हुए ससुराल के लोगों से ही संबंध विच्छेद कर लिया।
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उसके बाद धीरे-धीरे कारोबार को आगे बढ़ाती हुई मलौली में एक विस्वा जमीन बैनामा करा लिया। भाई हरनाथ और हरिद्वार भी उसके कार्य में सहयोग करने लगे। बहन इंद्रावती और इंद्र माला पढ़ाई में मन लगा दी। उर्मिला बताती हैं कि मलौली में जमीन खरीदने के बाद दुकान से होने वाली आय और लोगों से उधार लेकर मकान बनवाया। अब धीरे-धीरे दुकान में दस लाख से अधिक लोहे का सामान है, तो मलौली में ऑलीशान मकान। छोटी बहन इंद्र माला सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही हैं। खुद की जिंदगी की परवाह न करते हुए उर्मिला ने संघर्ष के सहारे भाई और बहन की जिंदगी संवार दी। इस कार्य के लिए उर्मिला को कई बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, राष्ट्रीय महिला दिवस पर सम्मानित किया जा चुका है।
दूसरों को स्वावलंबी बना रहीं प्रमिला
रोसया/संतकबीरनगर। घर की आर्थिक कमजोरी की वजह से जब बच्चों की परवरिश में कठिनाई आई तो कोहलवा गांव की प्रमिला देवी ने स्वयं सहायता समूह बनाने की ठान ली। ब्लॉक से लेकर जिला स्तर के अधिकारियों से सपंर्क स्थापित की और 2001 में समूह गठित की। अब तक वह प्रयास करके क्षेत्र में 300 से अधिक स्वयं सहायता समूह गठित करा चुकी है।

प्रमिला देवी बताती हैं कि समूह की महिलाएं मोमबत्ती, अगरबत्ती, धूपबत्ती, मुरब्बा आदि बनाती हैं। इसके लिए बैंक से ऋण तक लेना पड़ा। समूह के तैयार उत्पाद बाजार में बिक जाते हैं। समूह से जुड़ने से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई। पति और बेटा दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करते है। बेटी की शादी हो गई। छोटा बेटा घर पर उनके साथ रहता है। वह बताती है कि समूह से जुड़ी 3000 से अधिक महिलाएं भी आत्मनिर्भर हो गई हैं।
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