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फगुआ गीतों की गूंज लुप्त होने के कगार पर
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गांवों में अब नहीं सुनाई पड़ते फगुआ गीत
फाग गीतों की एक पुरानी विधा लुप्त होने के कगार पर
अमर उजाला ब्यूरो
बखिरा। होली का त्योहार नजदीक है। इस मौसम में फाग के गीत चारों तरफ सुनाई देते थे, लेकिन अब होली के दिनों में भी फाग गीत नहीं सुनाई देते हैं। स्थिति यह है कि अब फिल्मी धुनों के आगे फगुआ गीत लुप्त प्राय हो गए हैं।
फाल्गुन माह शुरू हुए 13 दिन हो चुके हैं। पर कहीं फाग गीत नहीं गूंज रहे हैं। फाल्गुन माह आते ही पलाश खिलने लगते हैं, नगाड़े की थाप और रसभरी गीतों की गूंज लोगों को आल्हादित कर देती है। चारों ओर फाग गवैयों का मस्ती भरा शोर, स्वस्थ पारंपरिक गीत लोगों के उत्साह को दोगुना कर देते हैं। पर समय के साथ-साथ फाग गीतों की परंपरा विलुप्त होती जा रही है। रामसरन वर्मा, परमात्मा कसेरा, राधेश्याम, श्याममोहन, रणस्वरूप ठठेरा, अंजनी कुमार, ओमप्रकाश सिंह, नवल तिवारी ने कहा कि फाल्गुन माह आते ही जगह-जगह पर फाग गीतों के लिए अलग से व्यवस्था की जाती थी। शाम ढलते ही नगाड़े की शोर लोगों को घर से निकलने के लिए विवश कर देती थी और साथ मिल बैठ कर स्वास्थ्य पारंपरिक गीतों का ऐसा महफिल जमता था कि राह चलने वाले भी कुछ पल ठहर का इस मस्ती भरे पल को अपने जेहन में उतार लेना चाहते थे। अब न वह टोली दिखती है और न ही ऐसे नगाड़ा और ढोलक वादक। यह परंपरा भी अब विलुप्तता के कगार पर आ खड़ी हुई है। वर्तमान में एक-दो स्थानों में ही फाग गाए जा रहे हैं। आधुनिकता की चकाचौंध और बाजारवादी संस्कृति की वजह से फाग गायकी की परंपरा अब सिमट कर रह गई है। हालांकि अब भी कुछ लोग इस समृद्ध परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
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फाग गीतों की एक पुरानी विधा लुप्त होने के कगार पर
अमर उजाला ब्यूरो
बखिरा। होली का त्योहार नजदीक है। इस मौसम में फाग के गीत चारों तरफ सुनाई देते थे, लेकिन अब होली के दिनों में भी फाग गीत नहीं सुनाई देते हैं। स्थिति यह है कि अब फिल्मी धुनों के आगे फगुआ गीत लुप्त प्राय हो गए हैं।
फाल्गुन माह शुरू हुए 13 दिन हो चुके हैं। पर कहीं फाग गीत नहीं गूंज रहे हैं। फाल्गुन माह आते ही पलाश खिलने लगते हैं, नगाड़े की थाप और रसभरी गीतों की गूंज लोगों को आल्हादित कर देती है। चारों ओर फाग गवैयों का मस्ती भरा शोर, स्वस्थ पारंपरिक गीत लोगों के उत्साह को दोगुना कर देते हैं। पर समय के साथ-साथ फाग गीतों की परंपरा विलुप्त होती जा रही है। रामसरन वर्मा, परमात्मा कसेरा, राधेश्याम, श्याममोहन, रणस्वरूप ठठेरा, अंजनी कुमार, ओमप्रकाश सिंह, नवल तिवारी ने कहा कि फाल्गुन माह आते ही जगह-जगह पर फाग गीतों के लिए अलग से व्यवस्था की जाती थी। शाम ढलते ही नगाड़े की शोर लोगों को घर से निकलने के लिए विवश कर देती थी और साथ मिल बैठ कर स्वास्थ्य पारंपरिक गीतों का ऐसा महफिल जमता था कि राह चलने वाले भी कुछ पल ठहर का इस मस्ती भरे पल को अपने जेहन में उतार लेना चाहते थे। अब न वह टोली दिखती है और न ही ऐसे नगाड़ा और ढोलक वादक। यह परंपरा भी अब विलुप्तता के कगार पर आ खड़ी हुई है। वर्तमान में एक-दो स्थानों में ही फाग गाए जा रहे हैं। आधुनिकता की चकाचौंध और बाजारवादी संस्कृति की वजह से फाग गायकी की परंपरा अब सिमट कर रह गई है। हालांकि अब भी कुछ लोग इस समृद्ध परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
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