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पूरी दुनिया में भगवान श्री कल्कि विष्णु की प्रस्तावित अवतार भूमि के लिए प्रसिद्ध है संभल
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संभल। सदियां ही नहीं, बल्कि कई युग बीत गए। पहले सतयुग के बाद त्रेता और फिर द्वापर के बाद अब कलयुग आ गया है लेकिन मां वैष्णों की श्रीहरि विष्णु को वरण की प्रतीक्षा अभी भी खत्म नहीं हुई है। वह युगों-युगों से इसी इच्छा को लेकर कठिन तपस्या में लीन हैं। उनकी यह तपस्या इसी युग के अंतिम चरण में होने वाले श्रीहरि के दशवें अर्थात कल्कि अवतार के बाद पूरी होने वाली है। वह पावन समय आने वाला है, जब कलयुग में मां वैष्णों देेवी के नाम से पहचानी जाने वाली रत्नाकर नंदिनी भगवान श्री कल्कि का वरण करेंगी।
संभल में हर वर्ष श्री कल्कि सेना निष्कलंक दल द्वारा आयोजित दो दिवसीय श्री कल्कि जयंती महोत्सव एवं भव्य गारुड़ी रथ दर्शन का सभी को बेसब्री से इंतजार रहता है। यह इंतजार अब खत्म होगा क्योंकि 61वां कल्कि जयंती महोत्सव 13 और 14 अगस्त को धूमधाम के साथ मनाया जाएगा। कल्किनगरी संभल का इतिहास अपने आप में काफी पुराना है। जब भी युग बदला, उस युग ने संभल को एक नया नाम दिया। सतयुग ने संभल को सत्यव्रत नाम दिया तो त्रेता युग ने महद्गिरी और द्वापर ने संभल नगरी को पिंगल नाम दिया। कलयुग आया तो इसे संभल के नाम से पुकारा गया है।
यह भारत ही नहीं बल्कि, सारी दुनिया में कलयुग में अवतरित होने वाले भगवान श्री कल्कि विष्णु की प्रस्तावित अवतार भूमि के लिए प्रसिद्ध है। वंश गोपाल कल्किधाम के महंत स्वामी भगवत प्रय बताते हैं कि स्कंद पुराण के बाराह खंड का अध्ययन में संभल की महत्वता का पता चलता है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि 68 तीर्थों व 19 धर्म कूपों वाली इस नगरी में ही भगवान श्रीकल्कि विष्णु का अवतार होगा। श्रीमद् भागवत महा पुराण के बारहवें स्कंध में दूसरे अध्याय में भी लिखा गया है कि चंद्रमा, सूर्य और बृहस्पति, ये तीनों गृह जब पुण्य नक्षत्र के प्रथम चरण में एक साथ प्रवेश करेंगे, तभी कलयुग का अवसान होगा और सतयुग का आरंभ होगा। विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश चौबीसवे खंड में कहा गया है कि संभल में विष्णुयश ब्राह्मण के घर कलयुग की समाप्ति पर श्री कल्कि भगवान अवतार लेंगे। दिल्ली से प्रकाशित दिवाकर पंचांग के अनुसार वैशाख मास शुक्ल पक्ष की द्वाद्वशी कल्कि अवतार की तिथि होगी।
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संभल में हर वर्ष श्री कल्कि सेना निष्कलंक दल द्वारा आयोजित दो दिवसीय श्री कल्कि जयंती महोत्सव एवं भव्य गारुड़ी रथ दर्शन का सभी को बेसब्री से इंतजार रहता है। यह इंतजार अब खत्म होगा क्योंकि 61वां कल्कि जयंती महोत्सव 13 और 14 अगस्त को धूमधाम के साथ मनाया जाएगा। कल्किनगरी संभल का इतिहास अपने आप में काफी पुराना है। जब भी युग बदला, उस युग ने संभल को एक नया नाम दिया। सतयुग ने संभल को सत्यव्रत नाम दिया तो त्रेता युग ने महद्गिरी और द्वापर ने संभल नगरी को पिंगल नाम दिया। कलयुग आया तो इसे संभल के नाम से पुकारा गया है।
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यह भारत ही नहीं बल्कि, सारी दुनिया में कलयुग में अवतरित होने वाले भगवान श्री कल्कि विष्णु की प्रस्तावित अवतार भूमि के लिए प्रसिद्ध है। वंश गोपाल कल्किधाम के महंत स्वामी भगवत प्रय बताते हैं कि स्कंद पुराण के बाराह खंड का अध्ययन में संभल की महत्वता का पता चलता है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि 68 तीर्थों व 19 धर्म कूपों वाली इस नगरी में ही भगवान श्रीकल्कि विष्णु का अवतार होगा। श्रीमद् भागवत महा पुराण के बारहवें स्कंध में दूसरे अध्याय में भी लिखा गया है कि चंद्रमा, सूर्य और बृहस्पति, ये तीनों गृह जब पुण्य नक्षत्र के प्रथम चरण में एक साथ प्रवेश करेंगे, तभी कलयुग का अवसान होगा और सतयुग का आरंभ होगा। विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश चौबीसवे खंड में कहा गया है कि संभल में विष्णुयश ब्राह्मण के घर कलयुग की समाप्ति पर श्री कल्कि भगवान अवतार लेंगे। दिल्ली से प्रकाशित दिवाकर पंचांग के अनुसार वैशाख मास शुक्ल पक्ष की द्वाद्वशी कल्कि अवतार की तिथि होगी।
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