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नोटबंदी ः पिछले वर्ष के मुकाबले आधा धान भी नहीं खरीद पाए
ब्यूरो/अमर उजाला, संभल
Updated Wed, 07 Dec 2016 01:03 AM IST
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धान खरीद
- फोटो : bureau
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नोट बंदी के चलते मंडी समिति में हर दिन लाखों रुपये का कारोबार चौपट हो रहा है।
पल्लेदारों को रोजगार नहीं मिला है। पिछले वर्ष के मुकाबले इस बार व्यापारी आधा धान भी नहीं खरीद पाए थे। पिछले वर्ष मंडी में व्यापारियों ने 10 लाख बोरे धान खरीदा था। जबकि अभी तक व्यापारी मात्र 4 लाख बोरे ही धान खरीद पाए हैं। किसान धान लेकर मंडी तो आ रहे हैं लेकिन बड़े नोटों को देखते हुए धान बेचे बिना ही घर लौट जा रहे हैं। मिलों में धान की मांग न होने के चलते व्यापारियों द्वारा खरीदा गया पूरा धान मंडी में ही रखा है।
दालों के थोक और रिटेल भाव में दिख रहा भारी अंतर
चंदौसी (ब्यूरो)। दालों के भाव आधे से अधिक गिरने के बाद भी रिटेल दुकानदार पुराने भाव पर ही बिक्री कर रहे हैं। नतीजा यह है कि दलहन का थोक और रिटेल बाजार में एक हजार रुपये से डेढ़ हजार रुपये का भारी अंतर बना हुआ है। ग्राहकों से नोटबंदी की आड़ में रिटेल कारोबारी मोटा मुनाफा कमाने में जुटे हुए हैं।
नोटबंदी के बाद बिक्री कम होने से अभी भी दुकानदारों के पास पर्याप्त स्टॉक है। नकदी की कमी के चलते ग्राहक और रिटेलर दोनों ही पशोपेश में है। ग्राहक पर दोहरी मार पड़ रही है। रिटेलर ने नोटबंदी को भी मुनाफे का जरिया बना लिया है। दालों के दामों में भारी गिरावट के बाद भी रिटेल के दाम आसमान छू रहे हैं। हाल यह है कि दालों के थोक और रिटेल के दामों में एक से डेढ़ हजार रुपये का भारी अंतर है।
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मंडी समिति नोट बंदी से पहले किसानों से भरी रहती थी। कुछ किसानों के पास 500 व 1000 के नोट थे तो कुछ किसानों के पास छोटे नोट थे लेकिन खाद गोदाम पर बड़े नोटों से खाद नहीं मिल रहा था। ऐसे में किसान आरटीजीएस का सहारा लेकर खाद ले रहे थे। गैलुआ निवासी किसान मोहित चाहल ने बताया कि खाद लेने के लिए सोमवार को बैंक में आरटीजीएम कराने के लिए गया था। फूलसिंह निवासी किसान सलमान ने बताया कि इस समय गेहूं की बुआई का समय चल रहा है। गेहूं के बीच व खाद लेने के लिए धान बेचने के लिए आया था लेकिन आढ़ती 500 व 1000 का नोट ही दे रहे।
पिछली बार मंडी समिति में 10 लाख बोरे धान खरीदे थे। इससे किसानों के अलावा व्यापारियों को भी लाभ हुआ था लेकिन इस बार अभी तक 4 लाख बोरे भी धान नहीं खरीदा गया है। किसान धान लेकर आ रहे हैं लेकिन न तो बड़े नोट ले रहे न ही चेक ले रहे हैं। मिलों में धान की मांग न होने के चलते खरीदा गया पूरा धान मंडी समिति में भरा पड़ा है। नोट बंदी के चलते किसानों, व्यापारियों व पल्लेदोरों को काफी नुकसान हुआ है। मंडी समिति में हर दिन 1000 पल्लेदार काम करते थे लेकिन नोट बंदी के बाद से उन्हें काम नहीं मिला है।
- अमित कुमार, व्यापारी।
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पल्लेदारों को रोजगार नहीं मिला है। पिछले वर्ष के मुकाबले इस बार व्यापारी आधा धान भी नहीं खरीद पाए थे। पिछले वर्ष मंडी में व्यापारियों ने 10 लाख बोरे धान खरीदा था। जबकि अभी तक व्यापारी मात्र 4 लाख बोरे ही धान खरीद पाए हैं। किसान धान लेकर मंडी तो आ रहे हैं लेकिन बड़े नोटों को देखते हुए धान बेचे बिना ही घर लौट जा रहे हैं। मिलों में धान की मांग न होने के चलते व्यापारियों द्वारा खरीदा गया पूरा धान मंडी में ही रखा है।
दालों के थोक और रिटेल भाव में दिख रहा भारी अंतर
चंदौसी (ब्यूरो)। दालों के भाव आधे से अधिक गिरने के बाद भी रिटेल दुकानदार पुराने भाव पर ही बिक्री कर रहे हैं। नतीजा यह है कि दलहन का थोक और रिटेल बाजार में एक हजार रुपये से डेढ़ हजार रुपये का भारी अंतर बना हुआ है। ग्राहकों से नोटबंदी की आड़ में रिटेल कारोबारी मोटा मुनाफा कमाने में जुटे हुए हैं।
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नोटबंदी के बाद बिक्री कम होने से अभी भी दुकानदारों के पास पर्याप्त स्टॉक है। नकदी की कमी के चलते ग्राहक और रिटेलर दोनों ही पशोपेश में है। ग्राहक पर दोहरी मार पड़ रही है। रिटेलर ने नोटबंदी को भी मुनाफे का जरिया बना लिया है। दालों के दामों में भारी गिरावट के बाद भी रिटेल के दाम आसमान छू रहे हैं। हाल यह है कि दालों के थोक और रिटेल के दामों में एक से डेढ़ हजार रुपये का भारी अंतर है।
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मंडी समिति नोट बंदी से पहले किसानों से भरी रहती थी। कुछ किसानों के पास 500 व 1000 के नोट थे तो कुछ किसानों के पास छोटे नोट थे लेकिन खाद गोदाम पर बड़े नोटों से खाद नहीं मिल रहा था। ऐसे में किसान आरटीजीएस का सहारा लेकर खाद ले रहे थे। गैलुआ निवासी किसान मोहित चाहल ने बताया कि खाद लेने के लिए सोमवार को बैंक में आरटीजीएम कराने के लिए गया था। फूलसिंह निवासी किसान सलमान ने बताया कि इस समय गेहूं की बुआई का समय चल रहा है। गेहूं के बीच व खाद लेने के लिए धान बेचने के लिए आया था लेकिन आढ़ती 500 व 1000 का नोट ही दे रहे।
पिछली बार मंडी समिति में 10 लाख बोरे धान खरीदे थे। इससे किसानों के अलावा व्यापारियों को भी लाभ हुआ था लेकिन इस बार अभी तक 4 लाख बोरे भी धान नहीं खरीदा गया है। किसान धान लेकर आ रहे हैं लेकिन न तो बड़े नोट ले रहे न ही चेक ले रहे हैं। मिलों में धान की मांग न होने के चलते खरीदा गया पूरा धान मंडी समिति में भरा पड़ा है। नोट बंदी के चलते किसानों, व्यापारियों व पल्लेदोरों को काफी नुकसान हुआ है। मंडी समिति में हर दिन 1000 पल्लेदार काम करते थे लेकिन नोट बंदी के बाद से उन्हें काम नहीं मिला है।
- अमित कुमार, व्यापारी।