चकबंदी विभाग में फर्जीवाड़ा, डेढ़ बीघा जमीन की विरासत दूसरे के नाम की

Moradabad Bureau Updated Sun, 22 Oct 2017 11:47 PM IST
चकबंदी अफसरों ने फर्जीवाड़ा कर दूसरे के नाम कर दी जमीन
- सहखातेदार को भनक लगने पर खुला मामला डेढ़ बीघा जमीन दूसरे के नाम होने का मामला
- तत्कालीन चकबंदी अधिकारी ने शपथपत्र के आधार दर्ज की विरासत
- पचास साल पहले मर चुके किसान के नाम कर दी 25 साल पहले खरीदी जमीन की वसीयत
अमर उजाला ब्यूरो
संभल/बबराला।
गुन्नौर क्षेत्र में मृतक किसान की डेढ़ बीघा जमीन को नकबंदी अफसरों ने फर्जी तरीके से दूसरे गांव के किसान के नाम कर दिया। आरोप है कि तत्कालीन चकबंदी अधिकारी ने ऐसे लोगों के नाम विरासत कर दी, जोकि मृतक के वारिस नहीं थे। अब मामला खुलने पर इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से की गई है। विभाग की आंतरिक जांच में आरोप सही पाया गया है।
क्षेत्र के गांव उदरनपुर अजमतनगर में चकबंदी चल रही है। क्षेत्र के गांव कल्हा के ज्ञानचंद्र पुत्र शिवलाल ने बताया कि उनके चचेरे भाई खमानी पुत्र मंगलसैन ने उदरनपुर अजमतनगर में वर्ष 1992 में गांव भागनगर के रहने वाले प्यारेलाल से डेढ़ बीघा जमीन खरीदी थी। इसके कुछ समय बाद भाई की मृत्यु हो गई। अब वर्तमान में गांव में चकबंदी प्रक्रिया अंतिम चरण में चल रही है, तो भाई की जमीन का दावेदार भतीजों को मानकर हमे मिलनी चाहिए थी। भाई की जमीन को पाने के लिए उन्होंने खाते को देखा तो उनके होश उड़ गए। जांच में पता कि केवल शपथपत्र के आधार पर फर्जीवाड़ा किया गया है। तत्कालीन चकबंदी अधिकारी रमजान वख्श ने ऐसे लोगों के नाम विरासत दर्ज कर दी, जोकि दूूसरे गांव का रहने वाला है। विरासत हेतु ग्राव प्रधान को भी नहीं पूंछा गया और न ही वारिस के ठोस सबूत जुटाए गए। केवल वारिशान ने अपना हक जताते हुए शपथ पत्र दिया, जिसके आधार पर विरासत कर दी। जिस किसान के नाम फर्जी विरासत की गई उसकी मृत्यु पचास साल पहले हो चुकी है, जबकि बैनामा करीब पच्चीस साल पहले हुआ है। इसकी शिकायत चकबंदी के उच्चाधिकारियों से की गई। शिकायतकर्ता ने इस प्रकरण को उच्च न्यायालय व शासन स्तर पर उठाने की बात कही है।
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जिस जमीन की दूसरे नाम विरासत हुई है, उसकी मृत्यु करीब पचास वर्ष पूर्व हो चुकी है। जबकि हमारे भाई ने पच्चीस वर्ष पहले जमीन खरीदी थी। इस फर्जीवाड़े की शिकायत हमने अभी मुख्यमंत्री से की है। अगर जरूरत पड़ी को हाईकोर्ट भी जाएंगे। - ज्ञानचंद्र पुत्र शिवलाल।
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हमने मुकदमे की सुनवाई करते हुए गवाहों व सबूतों का पूरा ध्यान रखा है। प्रकरण का फैसला शपथपत्र के आधार पर किया गया है। वारिस होने का दावा करते हुए शपथपत्र दिए गए थे। अगर शपथपत्र गलत है तो अदालत से धोखाधड़ी के आरोप में एफआईआर होनी चाहिए। अगर निर्णय से किसी को आपत्ति है तो न्यायालय में वाद दायर कर खारिज कराया जा सकता है।- रमजान वख्श, तत्कालीन चकबंदी अधिकारी, गुन्नौर।

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