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स्कूलों की मनमानी, चिह्नित दुकानों से अभिभावक महंगी किताबें खरीदने को मजबूर
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संभल। अगर कोई स्कूल अभिभावकों को एक निश्चित दुकान से स्टेशनरी खरीदने का दबाव डालता है, तो स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यह आदेश जिलाधिकारी मनीष बसंल ने दिया है। जिले के स्कूलों में नया शैक्षिक सत्र शुरू हो चुका है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों के लिए किताबें खरीदनी पड़ रही हैं। किताबों और निजी स्कूलों की फीस ने अभिभावकों का बजट बिगाड़ दिया है।
निजी स्कूल प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबें लगवा रहे हैं। एक किताब 300 से 400 रुपये तक मिल रही है। वहीं, स्कूल की स्टेशनरी एक ही दुकान पर मिल रही है। दूसरी दुकान पर उस स्कूल की स्टेशनरी ही नहीं मिलती। कई स्कूल या तो खुद स्कूल में ही किताबें बेच रहे हैं या फिर दुकानों को ही अधिकृत कर दिया गया है। दुकान पर पहुंचने पर स्कूल और कक्षा का नाम बताए जाने पर उन्हें स्टेशनरी दी जाती है। पहली से आठवीं तक का कोर्स 2000 से 6000 रुपये तक मिल रहा है। अगर अभिभावक स्कूल द्वारा बताए गए दुकान पर नहीं जा रहे हैं, तो वहां उस स्कूल की स्टेशनरी मिलती ही नहीं हैं। इसके चलते मजबूरी में अभिभावकों को महंगे दाम में किताबें खरीदनी पड़ रही हैं। अभिभावकों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में शिक्षा पर भी महंगाई काफी हो गई है। स्टेशनरी खरीदने के लिए स्कूल प्रबंधन एक ही दुकान को चयनित कर देता है और वह अपनी मनमानी से दाम लगाते हैं। सारा बोझ अभिभावकों की जेब पर ही पड़ रहा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सख्त निर्देश दिए हैं कि जो भी स्कूल अभिभावकों को एक निश्चित दुकान से स्टेशनरी खरीदने के लिए दबाव बनाता है तो उस स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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20 फीसदी मंहगी हुई स्टेशनरी
संभल। पुस्तक विक्रेता विवेक रस्तोगी ने बताया कि कागज न मिलने के कारण पुस्तक प्रकाशकों ने किताबों व कॉपियों के दाम भी बढ़ा दिए हैं। पिछले साल की तुलना में स्टेशनरी के दाम करीब 15 से 20 फीसदी तक बढ़े हैं, जो पेन पिछले साल पांच रुपये का था अब उसकी कीमत आठ रुपये हो गई है। कागज की कमी के चलते पुस्तक प्रकाशकों ने दाम बढ़ा दिए हैं।
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यह बोले अभिभावक
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कोट
मेरा बेटा चौथी कक्षा में आया है। निजी स्कूल वालों ने स्टेशनरी एक ही निश्चित दुकान से लेने की बात कही। दूसरी दुकान पर स्टेशनरी लेने गए तो वहां मिली नहीं। मजबूरन महंगे दामों पर ही उसी दुकान स्टेशनरी लेनी पड़ी।
कौशल ठाकुर, अभिभावक
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कोट
कुछ दिन पहले हमने शहर के बड़े स्कूल की स्टेशनरी स्कूल प्रबंधन द्वारा बताई गई दुकान से ली थी। कुछ किताबें रह गई थीं तो स्कूल से ही महंगे दामों पर उपलब्ध कराई गईं। जिलाधिकारी से भी स्कूलों की मनमानी की शिकायत भी की गई थी।
त्रिलोकी सिंह राठौड़, अभिभावक
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निजी स्कूल प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबें लगवा रहे हैं। एक किताब 300 से 400 रुपये तक मिल रही है। वहीं, स्कूल की स्टेशनरी एक ही दुकान पर मिल रही है। दूसरी दुकान पर उस स्कूल की स्टेशनरी ही नहीं मिलती। कई स्कूल या तो खुद स्कूल में ही किताबें बेच रहे हैं या फिर दुकानों को ही अधिकृत कर दिया गया है। दुकान पर पहुंचने पर स्कूल और कक्षा का नाम बताए जाने पर उन्हें स्टेशनरी दी जाती है। पहली से आठवीं तक का कोर्स 2000 से 6000 रुपये तक मिल रहा है। अगर अभिभावक स्कूल द्वारा बताए गए दुकान पर नहीं जा रहे हैं, तो वहां उस स्कूल की स्टेशनरी मिलती ही नहीं हैं। इसके चलते मजबूरी में अभिभावकों को महंगे दाम में किताबें खरीदनी पड़ रही हैं। अभिभावकों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में शिक्षा पर भी महंगाई काफी हो गई है। स्टेशनरी खरीदने के लिए स्कूल प्रबंधन एक ही दुकान को चयनित कर देता है और वह अपनी मनमानी से दाम लगाते हैं। सारा बोझ अभिभावकों की जेब पर ही पड़ रहा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सख्त निर्देश दिए हैं कि जो भी स्कूल अभिभावकों को एक निश्चित दुकान से स्टेशनरी खरीदने के लिए दबाव बनाता है तो उस स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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20 फीसदी मंहगी हुई स्टेशनरी
संभल। पुस्तक विक्रेता विवेक रस्तोगी ने बताया कि कागज न मिलने के कारण पुस्तक प्रकाशकों ने किताबों व कॉपियों के दाम भी बढ़ा दिए हैं। पिछले साल की तुलना में स्टेशनरी के दाम करीब 15 से 20 फीसदी तक बढ़े हैं, जो पेन पिछले साल पांच रुपये का था अब उसकी कीमत आठ रुपये हो गई है। कागज की कमी के चलते पुस्तक प्रकाशकों ने दाम बढ़ा दिए हैं।
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यह बोले अभिभावक
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कोट
मेरा बेटा चौथी कक्षा में आया है। निजी स्कूल वालों ने स्टेशनरी एक ही निश्चित दुकान से लेने की बात कही। दूसरी दुकान पर स्टेशनरी लेने गए तो वहां मिली नहीं। मजबूरन महंगे दामों पर ही उसी दुकान स्टेशनरी लेनी पड़ी।
कौशल ठाकुर, अभिभावक
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कोट
कुछ दिन पहले हमने शहर के बड़े स्कूल की स्टेशनरी स्कूल प्रबंधन द्वारा बताई गई दुकान से ली थी। कुछ किताबें रह गई थीं तो स्कूल से ही महंगे दामों पर उपलब्ध कराई गईं। जिलाधिकारी से भी स्कूलों की मनमानी की शिकायत भी की गई थी।
त्रिलोकी सिंह राठौड़, अभिभावक