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नसबंदी के बाद कड़ाके की ठंड में महिलाओं को फर्श पर लिटाया
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संभल। सीएचसी पवांसा में मंगलवार को नसबंदी शिविर का आयोजन किया गया। इसमें 40 महिलाओं की नसबंदी की गई। नसबंदी के बाद महिलाओं को कड़ाके की ठंड में बेड की जगह जमीन पर ही रजाई और कंबल बिछाकर लिटा दिया गया। नसबंदी शिविर से पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी ने कोई व्यवस्था नहीं की। इसलिए अव्यवस्थाएं हावी रहीं, जिसका खामियाजा महिलाओं को ही भुगतना पड़ा।
गांव पवांसा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर मंगलवार को मुरादाबाद जिला अस्पताल के सर्जन डॉक्टर रविंद्र सिंह ने अपनी टीम के साथ शिविर में महिलाओं की नसबंदी की, लेकिन नसबंदी शिविर करने से पहले पर्याप्त व्यवस्थाएं नहीं की गई। इसलिए कर्मचारी और बेड़ की कमी रही। नसबंदी के बाद एक बेड पर दो महिलाएं लेटी थीं। इसके बाद भी कमी पड़ी तो स्वास्थ्य कर्मचारियों ने महिलाओं को जमीन पर रजाई और कंबल बिछाकर महिलाओं को लिटा दिया, जिससे महिलाओं में रोष दिखा।
नसबंदी हो जाने के बाद स्ट्रेचर और व्हीलचेयर की व्यवस्था नहीं थी। इसलिए पैदल ही एंबुलेंस तक जाना पड़ा है। आशा का साथ न होता तो नीचे भी नहीं पहुंच पाती।
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कविता, गांव रसूलपुर धतरा
नसबंदी हो जाने के बाद बेड की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए रजाई जमीन पर बिछाकर लेटना पड़ा। जबकि कड़ाके की ठंड पड़ रही है।
रीता देवी, गांव गगंनेटा
व्यवस्थाएं पूरी की गईं थीं। हमारी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी गई। कभी-कभी नसबंदी कराने वाली महिलाओं की संख्या ज्यादा हो जाती है, जिसके वजह से कुछ व्यवस्थाएं प्रभावित हो जाती है।
डा. संदीप राहल, सीएचसी प्रभारी
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गांव पवांसा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर मंगलवार को मुरादाबाद जिला अस्पताल के सर्जन डॉक्टर रविंद्र सिंह ने अपनी टीम के साथ शिविर में महिलाओं की नसबंदी की, लेकिन नसबंदी शिविर करने से पहले पर्याप्त व्यवस्थाएं नहीं की गई। इसलिए कर्मचारी और बेड़ की कमी रही। नसबंदी के बाद एक बेड पर दो महिलाएं लेटी थीं। इसके बाद भी कमी पड़ी तो स्वास्थ्य कर्मचारियों ने महिलाओं को जमीन पर रजाई और कंबल बिछाकर महिलाओं को लिटा दिया, जिससे महिलाओं में रोष दिखा।
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नसबंदी हो जाने के बाद स्ट्रेचर और व्हीलचेयर की व्यवस्था नहीं थी। इसलिए पैदल ही एंबुलेंस तक जाना पड़ा है। आशा का साथ न होता तो नीचे भी नहीं पहुंच पाती।
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कविता, गांव रसूलपुर धतरा
नसबंदी हो जाने के बाद बेड की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए रजाई जमीन पर बिछाकर लेटना पड़ा। जबकि कड़ाके की ठंड पड़ रही है।
रीता देवी, गांव गगंनेटा
व्यवस्थाएं पूरी की गईं थीं। हमारी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी गई। कभी-कभी नसबंदी कराने वाली महिलाओं की संख्या ज्यादा हो जाती है, जिसके वजह से कुछ व्यवस्थाएं प्रभावित हो जाती है।
डा. संदीप राहल, सीएचसी प्रभारी