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मशरूम उत्पादन के लिए महिलाओं को प्रशिक्षण देगा केवीके
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महिलाओं को मिलेगा मशरूम उत्पादन का ऑनलाइन प्रशिक्षण
सहारनपुर। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को मशरूम उत्पादन का ऑनलाइन प्रशिक्षण देगा। इसमें न सिर्फ तकनीकी जानकारी दी जाएगी, बल्कि इसकी मार्केटिंग से लेकर प्रोसेसिंग तक के गुर सिखाए जाएंगे। प्रशिक्षण के लिए केवीके ने 20 अगस्त तक आवेदन मांगे हैं।
कम लागत में बढ़िया आमदनी के चलते जनपद में मशरूम की खेती की ओर रुझान बढ़ रहा है। जनपद में 200 से अधिक मशरूम की इकाइयां स्थापित हैं। इनसे करीब 300 टन मशरूम का वार्षिक उत्पादन होता है। अब स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को मशरूम की उन्नतशील खेती के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। ऑनलाइन प्रशिक्षण में उत्पादन तकनीक, मार्केटिंग, प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन की जानकारी दी जाएगी। जिले में वर्ष 2008-09 में 20 से 30 क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता था, वहीं अब बढ़कर 3000 क्विंटल तक पहुंच गया है। यहां से मशरूम की सप्लाई देहरादून, चंडीगढ़, दिल्ली आदि में होती हैं।
वर्ष भर होता है मशरूम उत्पादन
जनपद में मशरूम की पूरे वर्ष खेती होती है। इनमें सफेद बटन मशरूम, मिल्की एवं ढिंगरी मशरूम शामिल हैं। सफेद मशरूम की खेती अक्तूबर से फरवरी तक और ढिंगरी मशरूम की खेती मार्च से मई तक होती है। मिल्की मशरूम की खेती जून से सितंबर तक होती है।
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मशरूम की खेती के फायदे
1- झोपड़ी या कमरों में ही हो जाता है उत्पादन
2- छोटे एवं भूमिहीन किसानों के लिए वरदान
3 - प्रोटीन एवं पौष्टिक तत्वों से भरपूर
4 - कम लागत में बढ़िया मुनाफा
5- स्वरोजगार का अच्छा साधन
6- बाजार में है इसकी अच्छी मांग
-- वर्जन --
मशरूम की खेती कम लागत एवं कम स्थान पर हो सकती है। महिलाओं का प्रशिक्षण ऑनलाइन होगा। इसके लिए 20 अगस्त तक आवेदन मांगे गए हैं। इसके बाद प्रशिक्षण शुरू होगा।
- डॉक्टर आईके कुशवाहा, प्रभारी एवं मशरूम विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र
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सहारनपुर। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को मशरूम उत्पादन का ऑनलाइन प्रशिक्षण देगा। इसमें न सिर्फ तकनीकी जानकारी दी जाएगी, बल्कि इसकी मार्केटिंग से लेकर प्रोसेसिंग तक के गुर सिखाए जाएंगे। प्रशिक्षण के लिए केवीके ने 20 अगस्त तक आवेदन मांगे हैं।
कम लागत में बढ़िया आमदनी के चलते जनपद में मशरूम की खेती की ओर रुझान बढ़ रहा है। जनपद में 200 से अधिक मशरूम की इकाइयां स्थापित हैं। इनसे करीब 300 टन मशरूम का वार्षिक उत्पादन होता है। अब स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को मशरूम की उन्नतशील खेती के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। ऑनलाइन प्रशिक्षण में उत्पादन तकनीक, मार्केटिंग, प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन की जानकारी दी जाएगी। जिले में वर्ष 2008-09 में 20 से 30 क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता था, वहीं अब बढ़कर 3000 क्विंटल तक पहुंच गया है। यहां से मशरूम की सप्लाई देहरादून, चंडीगढ़, दिल्ली आदि में होती हैं।
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वर्ष भर होता है मशरूम उत्पादन
जनपद में मशरूम की पूरे वर्ष खेती होती है। इनमें सफेद बटन मशरूम, मिल्की एवं ढिंगरी मशरूम शामिल हैं। सफेद मशरूम की खेती अक्तूबर से फरवरी तक और ढिंगरी मशरूम की खेती मार्च से मई तक होती है। मिल्की मशरूम की खेती जून से सितंबर तक होती है।
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मशरूम की खेती के फायदे
1- झोपड़ी या कमरों में ही हो जाता है उत्पादन
2- छोटे एवं भूमिहीन किसानों के लिए वरदान
3 - प्रोटीन एवं पौष्टिक तत्वों से भरपूर
4 - कम लागत में बढ़िया मुनाफा
5- स्वरोजगार का अच्छा साधन
6- बाजार में है इसकी अच्छी मांग
-- वर्जन --
मशरूम की खेती कम लागत एवं कम स्थान पर हो सकती है। महिलाओं का प्रशिक्षण ऑनलाइन होगा। इसके लिए 20 अगस्त तक आवेदन मांगे गए हैं। इसके बाद प्रशिक्षण शुरू होगा।
- डॉक्टर आईके कुशवाहा, प्रभारी एवं मशरूम विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र