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टीवी और इंटरनेट ने बढ़ा दी किताबों से दूरी
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प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर पाठ्यक्रमों तक को इंटरनेट से पढ़ रहेेे युवा
संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। इंटरनेट के जमाने में मुद्रित किताबों को पढ़ने की परंपरा दम तोड़ रही है। नए जमाने के विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर पाठ्यक्रम की पुस्तकों तक की सामग्री इंटरनेट पर तलाशकर काम चला रहे हैं। वजह इंटरनेट है या कोई ओर, लेकिन किताबों से दूरी युवाओं को हिंदी से भी विमुख कर रही है, जो चिंता का विषय है। इन्हीं सवालों को लेकर अमर उजाला ने पठन और पाठन से जुड़े कुछ लोगों से बात कर उनकी राय जानने का प्रयास किया।
जेवी जैन कॉलेज के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राकेश चंद्रा का कहना है कि किताबों का अपना महत्व है। आज के जमाने में किताबों के पढ़ने की आदत नहीं होने की वजह इंटरनेट के साथ ही लोगों के पास समय नहीं होना भी है। हमें फिर से किताबों से दोस्ती करनी होगी, किताबें बढ़ने का समय निकालना ही होगा, तभी युवाओं में हिंदी के प्रति मौजूदा स्थिति को बदला जा सकेगा।
बीडी बाजोरिया इंटर कॉलेज के शिक्षक राजेंद्र सिंह राठौर का कहना है कि पुराने लोग, जिनको किताबें पढ़ने का शौक है वह आज भी किताबें पढ़ते हैं। उनका कहना है कि किताबें पढ़ने की आदत नहीं होने के चलते ही शिक्षा और ज्ञान का स्तर गिर रहा है। बच्चों की लेखनी तक खराब हो रही है। किताबें आज भी सबसे अच्छी दोस्त हैं। किताबों का विकल्प नहीं हो सकता।
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कॉमिक्स पर कार्टून चैनल हावी
एक समय था जब बच्चे और युवा कॉमिक्स पढ़ते थे। चंपक, बाल हंस, चाचा चौधरी, टारजन, साबू समेत अनेक कॉमिक्स बच्चों की पसंदीदा किताबें होती थी। मगर टीवी के आने के बाद तमाम कार्टून चैनल शुरू हो गए। इसके बाद स्मार्ट फोन आ गया। आज के बच्चे दिन भर टीवी पर कार्टून चैनल और मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। इंटरनेट के जमाने में मुद्रित किताबों को पढ़ने की परंपरा दम तोड़ रही है। नए जमाने के विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर पाठ्यक्रम की पुस्तकों तक की सामग्री इंटरनेट पर तलाशकर काम चला रहे हैं। वजह इंटरनेट है या कोई ओर, लेकिन किताबों से दूरी युवाओं को हिंदी से भी विमुख कर रही है, जो चिंता का विषय है। इन्हीं सवालों को लेकर अमर उजाला ने पठन और पाठन से जुड़े कुछ लोगों से बात कर उनकी राय जानने का प्रयास किया।
जेवी जैन कॉलेज के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राकेश चंद्रा का कहना है कि किताबों का अपना महत्व है। आज के जमाने में किताबों के पढ़ने की आदत नहीं होने की वजह इंटरनेट के साथ ही लोगों के पास समय नहीं होना भी है। हमें फिर से किताबों से दोस्ती करनी होगी, किताबें बढ़ने का समय निकालना ही होगा, तभी युवाओं में हिंदी के प्रति मौजूदा स्थिति को बदला जा सकेगा।
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बीडी बाजोरिया इंटर कॉलेज के शिक्षक राजेंद्र सिंह राठौर का कहना है कि पुराने लोग, जिनको किताबें पढ़ने का शौक है वह आज भी किताबें पढ़ते हैं। उनका कहना है कि किताबें पढ़ने की आदत नहीं होने के चलते ही शिक्षा और ज्ञान का स्तर गिर रहा है। बच्चों की लेखनी तक खराब हो रही है। किताबें आज भी सबसे अच्छी दोस्त हैं। किताबों का विकल्प नहीं हो सकता।
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कॉमिक्स पर कार्टून चैनल हावी
एक समय था जब बच्चे और युवा कॉमिक्स पढ़ते थे। चंपक, बाल हंस, चाचा चौधरी, टारजन, साबू समेत अनेक कॉमिक्स बच्चों की पसंदीदा किताबें होती थी। मगर टीवी के आने के बाद तमाम कार्टून चैनल शुरू हो गए। इसके बाद स्मार्ट फोन आ गया। आज के बच्चे दिन भर टीवी पर कार्टून चैनल और मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त हैं।