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उस दौर की होली का रंग ही अलग था...

Thu, 25 Mar 2021 11:59 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 25 Mar 2021 11:59 PM IST
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The color of Holi at that time was different ...
आभेराम त्यागी - फोटो : SAHARANPUR
उस दौर की होली का रंग ही अलग था...
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सहारनपुर। समय के साथ होली की रीत बदली और लोगों की सोच भी। कभी प्रेम के प्रतीक माने जाने वाले होली के पर्व पर अब लोग अजनबी पर रंग डालने से पहले सौ बार सोचते हैं कि कहीं रंग में भंग न पड़ जाए। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले होली पर लोग घड़ों में रंग भरकर ढोल बजाते हुए थाने तक जाते थे, जहां थानेदार को भी रंगों से सराबोर कर देते थे। अब न वो पुरानी होली रही ना उसका हुल्लड़।
चिलकाना के सुल्तानपुर निवासी 91 वर्षीय पंडित जय नारायण शर्मा बताते हैं कि आज होली का स्वरूप ही बदल गया है। पहले केमिकल वाले रंग नहीं हुआ करते थे। टेसू के फूल बड़े-बड़े कड़ाहों में पकाकर उनसे होली खेली जाती थी। टेसू का रंग त्वचा को नुकसान नहीं देता था। आजादी के समय तक कस्बे के लोग घड़ों में रंग भरकर ढोल बजाते हुए थाने तक पहुंचते थे और थानेदार को रंग लगाते थे। थाने से सभी को खाने के लिए गुड़ मिलता था। आज होली पर केमिकल युक्त रंग डाले जाते हैं। इतना ही नहीं इंजन का तेल और नाली का कीचड़ डालकर भी होली को बदरंग किया जाता है।
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बेहट के मोहल्ला महाजनान निवासी 80 वर्षीय वीरेंद्र वीर सिंघल का कहना है कि करीब तीन दशक पहले तक होलिका दहन के दिन शाम को सभी लोग इकट्ठा होकर ढोल की थाप पर नाचते गाते कस्बे के मोहल्लों से होते हुए प्राकृतिक रंगों से होली खेलते थे। इसके बाद फाग के दिन सभी लोग इसी तरह एक दूसरे को भाईचारे के साथ रंग लगाते थे।
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नागल क्षेत्र के गांव नासिरपुर डिगोली निवासी 80 वर्षीय आभेराम त्यागी बताते हैं कि उनके वक्त में होली का त्योहार 15 दिन पहले बड़े सौहार्दपूर्ण वातावरण में मनाना शुरू हो जाता था। हंसी ठिठोली की सारी हदें पार हो जाया करती थी लेकिन कोई बुरा नहीं मानता था। उस वक्त लोगों में भाईचारा और लगाव बहुत था। अब तो होली केवल बच्चों की रह गई है और कई बार तो लड़ाई झगड़े का डर बना रहता है। न ही गांव में त्योहार जैसा माहौल लगता है, होली बेरंग हो गई है।

देवबंद के शिक्षक नगर निवासी 70 वर्षीय विजय गर्ग की नेचलगढ़ में गिफ्ट पैक की दुकान है। वे कहते हैं कि पहले होली का उत्साह ही अलग था। बच्चे एक महीना पहले से होली खेलने लगते थे। गली मुहल्ले से गुजर रहे लोगों को रंग में सरोबार कर भी देते तो कोई बुरा नहीं मानता था। अब वो समय नहीं रहा। अब तो लड़ाई झगड़े के डर से लोग अपने बच्चों को त्योहार के दिन बाहर भी नहीं निकलने देते। पहले टेसू के फूलों के रंग से होली खेली जाती थी, अब केमिकल वाले रंगों ने उनका स्थान ले लिया है।

विजय गर्ग

विजय गर्ग- फोटो : SAHARANPUR

पंडित जय नारायण शर्मा

पंडित जय नारायण शर्मा- फोटो : SAHARANPUR

वीरेंद्र वीर सिंघल

वीरेंद्र वीर सिंघल- फोटो : SAHARANPUR

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