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Saharanpur News: कभी तालाबों की मिट्टी से तैयार की जाती थी सांझी

Sat, 05 Oct 2024 02:26 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर Updated Sat, 05 Oct 2024 02:26 AM IST
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Sometimes Sanjhi was prepared from the soil of ponds
सहारनपुर। पश्चिमी यूपी की लोककला सांझी बनाने की परंपरा लुप्त होती जा रही है। कभी तालाबों की मिट्टी से घर-घर सांझी, उनके परिवार, आकाश में उड़ते तोते, वन में नाचता मोर, चांद, सूरज और सितारों की मूर्तियां महिलाएं उत्साह के साथ बनाती थीं, लेकिन अब बाजार में बिकने वाली मूर्तियां पेरिस ऑफ प्लास्टर से बनाई जा रही हैं। इसी वजह से अब इस प्राचीन परंपरा पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
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दरअसल, दो दशक से बाजारवाद की वजह से शहरी क्षेत्र में तो यह लोककला पूरी तरह लुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस परंपरा को नहीं के बराबर ही निभाया जा रहा है। पहले नवरात्र से यह उत्सव तालाब से शुरू होकर नौ दिन बाद सांझी के विसर्जन के साथ तालाब पर ही संपन्न होता है, लेकिन तालाबों के दूषित होने की वजह से पवित्र मिट्टी नहीं मिलती है। ऐसे में अब खेती की भूमि से ग्रामीण क्षेत्रों में मूर्तियां तैयार करते हैं। इनका विसर्जन अब नहरों में किया जाता है, जो मूर्तियां बाजार में बिक रही हैं, वह सांझी के स्वरूप से बिल्कुल अलग हैं, यह पेरिस ऑफ प्लास्टर से बनी हैं।
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खुशहाली का प्रतीक हैं सांझी और तोते
आचार्य रोहित वशिष्ठ और पंडित प्रगीत कौशिक का कहना है कि सांझी माई सुख-समृद्धि व उन्नति का प्रतीक हैं। इनको मां भगवती का ही रूप माना गया है। श्रद्धालुओं के घरों में सांझी के रूप में देवी नौ दिन तक निवास करती हैं। इनके परिवार में तोते और मोर खुशहाली व हरियाली का प्रतीक हैं।
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लोककला को बचाना जरूरी
हमारा सहारनपुर पुस्तक के लेखक राजीव उपाध्याय और साहित्यकार डॉ. वीरेंद्र आजम का कहना है कि सांझी माई की मूर्तियां बनाने की लोककला को बचाना बेहद जरूरी है। इसके लिए प्रति लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। सांझी माई हमारी प्राचीन परंपरा हैं। सांझी माई की मूर्ति और परिवार बनाने से महिलाओं की कला भी सामने आती रही है।
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