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दलितों को साधा, मुसलमानों को रिझाया
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Mon, 12 Sep 2016 01:09 AM IST
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सहारनपुर में दिल्ली रोड िस्थ्ात कोसमोस ग्राउंड में बसपा की सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय महारैली में उमड़ी कार्यकर्ताओं की भीड़।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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ध्रुवीकरण के चलते लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेल चुकी बहुजन समाज पार्टी विधानसभा-2017 के लिए कोई चूक नहीं करना चाहती। वेस्ट यूपी के मजबूत गढ़ सहारनपुर से बसपा सुप्रीमो मायावती ने दलितों को साधकर मुसलमानों को रिझाने की पुरजोर कोशिश की।
बसपा को यह बात मामूल है कि मुस्लिम मतों में सेंधमारी के बिना उसकी राह आसान नहीं है। वेस्ट यूपी में दलित और मुसलमानों की संख्या काफी ज्यादा है। ऐसे में बसपा पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की राह तलाश रही है। अपने मजबूत गढ़ से शक्ति प्रदर्शन कर बसपा ने मुस्लिमों को संदेश भी दे दिया है।
उधर, सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले में हर जिले में मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में कर बसपा इस नए गठजोड़ से उम्मीद लगाए बैठी है। हालांकि सहारनपुर में उम्मीद के मुताबिक मुस्लिम रैली में कम ही पहुंचा। मगर, माना जा रहा है कि चुनाव से पहले शायद मुस्लिम मतदाताओं का मूड कुछ बदल सके।
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बसपा सुप्रीमो के करीब डेढ़ घंटे के भाषण में ज्यादातर फोकस दलित और मुस्लिमों पर रहा। चूंकि दलित बसपा का बेस वोट है और बसपा को इस वोटबैंक पर पूरा भरोसा भी है। ऐसे में अब अपरकास्ट में सेंधमारी के साथ ही बसपा की नजर मुस्लिम मतदाताओं पर टिकी है।
लोकसभा चुनाव में ध्रुवीकरण का खामियाजा भुगत चुकी बसपा विधानसभा चुनाव में उस माहौल को दोहराना नहीं देना चाहेगी। यही कारण है कि मायावती न केवल दलितों और मुस्लिमों को रिझाने में जुुटी हैं। बल्कि आशंकाओं से भी आगाह करने में जुटी है। आपको बता दें कि जब-जब मुस्लिम दलित फार्मूला कामयाब हुआ है तो इसका सीधा लाभ बसपा को मिला है। सहारनपुर के सियासत के माहिर खिलाड़ी काजी रशीद मसूद को बसपा ने पटखनी दी थी।
वर्ष 1999 में नवाब मंसूर अली खां को बसपा ने प्रत्याशी बनाया और यहां पहली बार बसपा का सांसद चुना गया। इसी तरह मुजफ्फरनगर से कादिर राणा, मेरठ से हाजी शाहिद अखलाक सहित कई सांसद चुने गए। सहारनपुर की रैली में मुस्लिमों की कम भागीदारी के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। लोकसभा चुनाव में हुए ध्रुुवीकरण की शुरुआत सहारनपुर से हुई थी। उसका असर अब भी दिखाई पड़ रहा है। वक्त बताएगा कि यह गठजोड़ कितना कामयाब होगा।
नए समीकरणों पर होगी सियासी दलों की नजर ः बसपा सुप्रीमो की रैली के बाद सहारनपुर सहित पूरे वेस्ट यूपी में सियासी ताप बढ़ने लगा है। दूसरे दलों के नेता यहां नफा-नुकसान के आंकलन में जुटे हैं। भाजपा का फोकस पिछड़ा, दलित और अति दलित। रैली में इन जातियों की भागीदारी का आंकलन किया जा रहा है। कांग्रेस दलित-मुस्लिम पर अपने आंकड़े जुुटा रही है। ऐसे में कांग्रेस भी इससे अपने सियासी चाल को तय करेेेगी। उधर, सपा पिछड़ा और मुस्लिम से उम्मीद लगाए बैठा है तो वह भी अपनी रणनीति तय करेगा।
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बसपा को यह बात मामूल है कि मुस्लिम मतों में सेंधमारी के बिना उसकी राह आसान नहीं है। वेस्ट यूपी में दलित और मुसलमानों की संख्या काफी ज्यादा है। ऐसे में बसपा पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की राह तलाश रही है। अपने मजबूत गढ़ से शक्ति प्रदर्शन कर बसपा ने मुस्लिमों को संदेश भी दे दिया है।
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उधर, सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले में हर जिले में मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में कर बसपा इस नए गठजोड़ से उम्मीद लगाए बैठी है। हालांकि सहारनपुर में उम्मीद के मुताबिक मुस्लिम रैली में कम ही पहुंचा। मगर, माना जा रहा है कि चुनाव से पहले शायद मुस्लिम मतदाताओं का मूड कुछ बदल सके।
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बसपा सुप्रीमो के करीब डेढ़ घंटे के भाषण में ज्यादातर फोकस दलित और मुस्लिमों पर रहा। चूंकि दलित बसपा का बेस वोट है और बसपा को इस वोटबैंक पर पूरा भरोसा भी है। ऐसे में अब अपरकास्ट में सेंधमारी के साथ ही बसपा की नजर मुस्लिम मतदाताओं पर टिकी है।
लोकसभा चुनाव में ध्रुवीकरण का खामियाजा भुगत चुकी बसपा विधानसभा चुनाव में उस माहौल को दोहराना नहीं देना चाहेगी। यही कारण है कि मायावती न केवल दलितों और मुस्लिमों को रिझाने में जुुटी हैं। बल्कि आशंकाओं से भी आगाह करने में जुटी है। आपको बता दें कि जब-जब मुस्लिम दलित फार्मूला कामयाब हुआ है तो इसका सीधा लाभ बसपा को मिला है। सहारनपुर के सियासत के माहिर खिलाड़ी काजी रशीद मसूद को बसपा ने पटखनी दी थी।
वर्ष 1999 में नवाब मंसूर अली खां को बसपा ने प्रत्याशी बनाया और यहां पहली बार बसपा का सांसद चुना गया। इसी तरह मुजफ्फरनगर से कादिर राणा, मेरठ से हाजी शाहिद अखलाक सहित कई सांसद चुने गए। सहारनपुर की रैली में मुस्लिमों की कम भागीदारी के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। लोकसभा चुनाव में हुए ध्रुुवीकरण की शुरुआत सहारनपुर से हुई थी। उसका असर अब भी दिखाई पड़ रहा है। वक्त बताएगा कि यह गठजोड़ कितना कामयाब होगा।
नए समीकरणों पर होगी सियासी दलों की नजर ः बसपा सुप्रीमो की रैली के बाद सहारनपुर सहित पूरे वेस्ट यूपी में सियासी ताप बढ़ने लगा है। दूसरे दलों के नेता यहां नफा-नुकसान के आंकलन में जुटे हैं। भाजपा का फोकस पिछड़ा, दलित और अति दलित। रैली में इन जातियों की भागीदारी का आंकलन किया जा रहा है। कांग्रेस दलित-मुस्लिम पर अपने आंकड़े जुुटा रही है। ऐसे में कांग्रेस भी इससे अपने सियासी चाल को तय करेेेगी। उधर, सपा पिछड़ा और मुस्लिम से उम्मीद लगाए बैठा है तो वह भी अपनी रणनीति तय करेगा।