{"_id":"5796673d4f1c1b2e6421e6b9","slug":"rama-rama-and-praying-not-closed-hats","type":"story","status":"publish","title_hn":"नहीं बंद हुई राम राम और दुआ सलाम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नहीं बंद हुई राम राम और दुआ सलाम
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Tue, 26 Jul 2016 01:08 AM IST
विज्ञापन
दंगों की त्रासदी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सहारनपुर में ठीक दो साल पहले विवादित स्थल को लेकर हुए दंगे ने भले ही दोनों मजहबों के बीच दरार डालने की कोशिश हुई हो, मगर एक-दूसरे को राम-राम और सलाम करने का सिलसिला कभी बंद नहीं हुआ।
शायद यह उसी अटूट रिश्ते की देन है कि आज फिर से दोनों मजहब के लोग सभी गिले-शिकवे भुलाकर मिलकर चल रहे हैं। गुरुद्वारा रोड स्थित विवादित स्थल को लेकर दो साल पहले हुए दंगे में अपना इलेक्ट्रोनिक्स के सामान का बड़ा शोरूम गवां चुके बलजीत सिंह चावला फिर उसी स्थिति में हैं।
उनका मानना है कि दंगाइयों का कोई मजहब नहीं होता। इसीलिए उन्हें कभी भी किसी से कोई शिकवा नहीं रहा है। बताया कि वह बरसों से एकसाथ रहते आ रहे हैं। जिनके साथ खेले और खाए हों, उनका नुकसान करना तो दूर की बात सोचना भी पाप लगता है।
विज्ञापन
बताया कि दंगे में पूरा बिजनेस गंवाने के बाद भी उनके रिश्तों में कोई खटास नहीं आई। उनके मित्र अनवर, मो. यूनुस और फैसल ने दंगे वाले दिन से उनका मनोबल बढ़ाया।
उस वक्त भले ही लोगों के दिलों में दूरियां आई थी, मगर ये दोस्त एक दूसरे का हौसला बने रहे और यह सिलसिला अब तक जारी है। बलजीत सिंह को यदि शिकायत है तो सरकार से। बताया कि सरकार ने दंगे में बर्बाद हुए लोगों के लिए बड़े-बड़े दावे किए थे, मगर एक रुपया तक उन्हें नहीं दिया गया।
उधर, व्यवसायी मौलाना सईद अहमद का मानना है कि इस तरह का फसाद कराने वाले लोग कम ही होते हैं, मगर उसमें पिसना पूरे समाज को पड़ता है। उनका कहना है कि उनके दोस्त सरदार मनदीर सिंह, कुक्कु, सरदार अनित ने उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा।
हिंदुस्तान की संस्कृति हिंदू और मुसलमान की मिलीजुली संस्कृति रही है, जिसे चाहकर भी कोई तोड़ नहीं सकता है। मगर हमें दोनों मजहबों के बीच खटाई पैदा करने वालों से सावधान रहना चाहिए, जिससे दो साल पहले वाले हालात का पुनरावृत्ति न हो सके।
विज्ञापन
शायद यह उसी अटूट रिश्ते की देन है कि आज फिर से दोनों मजहब के लोग सभी गिले-शिकवे भुलाकर मिलकर चल रहे हैं। गुरुद्वारा रोड स्थित विवादित स्थल को लेकर दो साल पहले हुए दंगे में अपना इलेक्ट्रोनिक्स के सामान का बड़ा शोरूम गवां चुके बलजीत सिंह चावला फिर उसी स्थिति में हैं।
विज्ञापन
उनका मानना है कि दंगाइयों का कोई मजहब नहीं होता। इसीलिए उन्हें कभी भी किसी से कोई शिकवा नहीं रहा है। बताया कि वह बरसों से एकसाथ रहते आ रहे हैं। जिनके साथ खेले और खाए हों, उनका नुकसान करना तो दूर की बात सोचना भी पाप लगता है।
विज्ञापन
बताया कि दंगे में पूरा बिजनेस गंवाने के बाद भी उनके रिश्तों में कोई खटास नहीं आई। उनके मित्र अनवर, मो. यूनुस और फैसल ने दंगे वाले दिन से उनका मनोबल बढ़ाया।
उस वक्त भले ही लोगों के दिलों में दूरियां आई थी, मगर ये दोस्त एक दूसरे का हौसला बने रहे और यह सिलसिला अब तक जारी है। बलजीत सिंह को यदि शिकायत है तो सरकार से। बताया कि सरकार ने दंगे में बर्बाद हुए लोगों के लिए बड़े-बड़े दावे किए थे, मगर एक रुपया तक उन्हें नहीं दिया गया।
उधर, व्यवसायी मौलाना सईद अहमद का मानना है कि इस तरह का फसाद कराने वाले लोग कम ही होते हैं, मगर उसमें पिसना पूरे समाज को पड़ता है। उनका कहना है कि उनके दोस्त सरदार मनदीर सिंह, कुक्कु, सरदार अनित ने उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा।
हिंदुस्तान की संस्कृति हिंदू और मुसलमान की मिलीजुली संस्कृति रही है, जिसे चाहकर भी कोई तोड़ नहीं सकता है। मगर हमें दोनों मजहबों के बीच खटाई पैदा करने वालों से सावधान रहना चाहिए, जिससे दो साल पहले वाले हालात का पुनरावृत्ति न हो सके।