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प्रदूषण और शहरीकरण ने लूट लिया गौरैया का घोंसला
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गिल कॉलोनी स्थित नारायणपुरी मन्दिर में पेड़ बैठी गौरेया
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। गौरैया के जीवन के लिए बढ़ता प्रदूषण और शहरीकरण खतरा बन गया है। वन विभाग का अनुमान है कि सहारनपुर में गौरैया की संख्या विगत पांच सालों में बीस प्रतिशत कम हो गई है। सहारनपुर वन विभाग संरक्षण और संवर्द्धन की बातें तो करता है, लेकिन गोष्ठी और जागरूकता तक विभाग की कवायद सीमित है।
घर-घर की चिड़िया गौरैया आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। यूरोप में तो गौरैया संरक्षण-चिंता का विषय बनी हुई है। ब्रिटेन में तो यह रेड डॉटा में शामिल हो चुकी है। भारत वैज्ञानिक भी कई मंचों और शोधों के माध्यम से पिछले कुछ सालों में गौरैया की संख्या में गिरावट की पुष्टि कर चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर के सर्वेक्षण ने इस पर मुहर भी लगा दी है। चिंता यह भी जताई गई है कि यदि घर की चिरैय्या पर गौर नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब यह किताबों तक सिमट कर रह जाएगी। जानकर बताते हैं उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, बैंगलूरु, मुंबई जैसे शहरों में शहरीकरण की वजह से स्थिति ज्यादा विस्फोटक हो चुकी है।
गौरैया के विलुप्त होने के मुख्य कारण
आधुनिक बनावट वाले मकानों में गौरैया को अब घोंसले बनाने की जगह ही नहीं मिलती। इससे उसके जन्मे-अजन्मे बच्चे बाहर बिल्ली, कौए, चील, बाज के शिकार बनते हैं। गौरैया छोटे पेड़ों या झाड़ियों में भी घोंसला बनाती हैं, लेकिन मनुष्य उन्हें भी काटता-छांटता जा रहा है। बबूल, कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी आदि पेड़ों को पसंद करती है पर ये पेड़ भी अब कम होते जा रहे हैं। शहरों और गांवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फ़ोन के टॉवर भी गौरैया समेत दूसरे पक्षियों के लिए बड़ा ख़तरा बने हुए हैं। इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती हैं।
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गौरैया पर्यावरण के लिए भी है अनुकूल
पर्यावरण को बेहतर बनाने में गौरैया का बड़ा योगदान है। गौरैया अपने बच्चों को अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े भी खिलाती है, जो हमारी फसलों के लिए हानिकारक होते हैं। प्रकृति की सभी रचनाएं कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं और हम भी उनमें शामिल हैं। विश्व भर में गौरैया की 26 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं।
कब से मनाया जा रहा है विश्व गौरैया दिवस
नेचर फॉरएवर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर के विशेष प्रयासों से पहली बार वर्ष 2010 में विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था। तब से ही यह दिन पूरे विश्व में हर वर्ष 20 मार्च को गौरैया के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। गौरैया के जीवन संकट को देखते हुए वर्ष 2012 में उसे दिल्ली के राज्य पक्षी का दर्जा भी दिया गया था पर हालात अभी भी जस के तस ही हैं।
प्रकृति के जितने करीब होंगे, उतने सुकून में होंगे। शहर में आधुनिक आशियाने गौरैया के आशियाने छीन रहे। कस्बे के कई गांव अब भी ऐसे हैं, जहां पर गौरैया फुदकती दिखती है। कंडी वाले घरों में उनका आशियाने सुरक्षित हैं। 20 मार्च को गौरैया के प्रति लोगों को जागरूक करने के मकसद से गोष्ठी और जागरूकता अभियान चलाया जाता है। शहर के कुछ हिस्सों और बागों तक गौरैया का आशियाना सिमट गया है।
विजय कुमार सिंह, डीएफओ, सामाजिक वानिकी
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घर-घर की चिड़िया गौरैया आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। यूरोप में तो गौरैया संरक्षण-चिंता का विषय बनी हुई है। ब्रिटेन में तो यह रेड डॉटा में शामिल हो चुकी है। भारत वैज्ञानिक भी कई मंचों और शोधों के माध्यम से पिछले कुछ सालों में गौरैया की संख्या में गिरावट की पुष्टि कर चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर के सर्वेक्षण ने इस पर मुहर भी लगा दी है। चिंता यह भी जताई गई है कि यदि घर की चिरैय्या पर गौर नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब यह किताबों तक सिमट कर रह जाएगी। जानकर बताते हैं उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, बैंगलूरु, मुंबई जैसे शहरों में शहरीकरण की वजह से स्थिति ज्यादा विस्फोटक हो चुकी है।
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गौरैया के विलुप्त होने के मुख्य कारण
आधुनिक बनावट वाले मकानों में गौरैया को अब घोंसले बनाने की जगह ही नहीं मिलती। इससे उसके जन्मे-अजन्मे बच्चे बाहर बिल्ली, कौए, चील, बाज के शिकार बनते हैं। गौरैया छोटे पेड़ों या झाड़ियों में भी घोंसला बनाती हैं, लेकिन मनुष्य उन्हें भी काटता-छांटता जा रहा है। बबूल, कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी आदि पेड़ों को पसंद करती है पर ये पेड़ भी अब कम होते जा रहे हैं। शहरों और गांवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फ़ोन के टॉवर भी गौरैया समेत दूसरे पक्षियों के लिए बड़ा ख़तरा बने हुए हैं। इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती हैं।
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गौरैया पर्यावरण के लिए भी है अनुकूल
पर्यावरण को बेहतर बनाने में गौरैया का बड़ा योगदान है। गौरैया अपने बच्चों को अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े भी खिलाती है, जो हमारी फसलों के लिए हानिकारक होते हैं। प्रकृति की सभी रचनाएं कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं और हम भी उनमें शामिल हैं। विश्व भर में गौरैया की 26 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं।
कब से मनाया जा रहा है विश्व गौरैया दिवस
नेचर फॉरएवर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर के विशेष प्रयासों से पहली बार वर्ष 2010 में विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था। तब से ही यह दिन पूरे विश्व में हर वर्ष 20 मार्च को गौरैया के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। गौरैया के जीवन संकट को देखते हुए वर्ष 2012 में उसे दिल्ली के राज्य पक्षी का दर्जा भी दिया गया था पर हालात अभी भी जस के तस ही हैं।
प्रकृति के जितने करीब होंगे, उतने सुकून में होंगे। शहर में आधुनिक आशियाने गौरैया के आशियाने छीन रहे। कस्बे के कई गांव अब भी ऐसे हैं, जहां पर गौरैया फुदकती दिखती है। कंडी वाले घरों में उनका आशियाने सुरक्षित हैं। 20 मार्च को गौरैया के प्रति लोगों को जागरूक करने के मकसद से गोष्ठी और जागरूकता अभियान चलाया जाता है। शहर के कुछ हिस्सों और बागों तक गौरैया का आशियाना सिमट गया है।
विजय कुमार सिंह, डीएफओ, सामाजिक वानिकी

गिल कॉलोनी स्थित नारायणपुरी मन्दिर में पेड़ बैठी गौरेया- फोटो : SAHARANPUR

गिल कॉलोनी स्थित नारायणपुरी मन्दिर में पेड़ बैठी गौरेया- फोटो : SAHARANPUR

हारनपुर में जमीन से भोजन पर रोटी खाती गौरेया- फोटो : SAHARANPUR