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मायावती ने दिया दलितों को सशक्त रहनुमाई का संदेश
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Wed, 19 Jul 2017 01:42 AM IST
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बसपा सुप्रीमो मायावती
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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राज्यसभा में मंगलवार को सहारनपुर के शब्बीरपुर कांड को लेकर उठाई गई बसपा सुप्रीमो मायावती की आवाज पार्टी के गढ़ में पहुंच गई है। उन्होंने इस मुद्दे पर सिर्फ तीन मिनट दिए जाने को लेकर जो तीखी नाराजगी जताई है, वह आनायास नहीं है।
उन्होंने हिंसा से सुलग चुके सहारनपुर के साथ ही वेस्ट यूपी में दोराहे पर खड़े अपने बेस वोटर दलितों को अपनी सशक्त रहनुमाई का संदेश दिया है। दलित राजनीति में सेंध लगाने की भीम आर्मी की कोशिशों के बीच उन्हें सहानुभूति का लाभ भी मिलता दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि उन्होंने इसके जरिए दलितों को एकजुट करने के लिए बड़ा दाव चला है।
बसपा के मजबूत गढ़ सहारनपुर में पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। इसके ठीक बाद 20 अप्रैल को पहले दलित-मुस्लिम संघर्ष और पांच मई को दलित-राजपूत संघर्ष से दलित सियासत तेज हो गई। राजनीतिक दलों के किसी भी दाव से पहले भीम आर्मी ने दलितों की रहनुमाई कर बसपा के गढ़ में उसे सीधी चुनौती दी।
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दलित वर्ग के बीच भीम आर्मी की लोकप्रियता ने न केवल बसपा बल्कि दूसरे दलों को भी बैकफुट पर ला दिया। यही कारण है कि 23 मई को पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सड़क मार्ग से सहारनपुर के हिंसा प्रभावित शब्बीरपुर गांव पहुुंची थीं, मगर उनकी वापसी के दौरान ही यहां हिंसा दोबारा भड़क गई थी।
ऐसे में बसपा और उसकी मुखिया के सामने दलितों का दिल जीतने की चुनौती बनी थी। उधर, भीम आर्मी की सक्रियता का फायदा कांग्रेस सहित दूसरी पार्टियां उठाने मेें जुटी थीं। दलित-मुस्लिम गठजोड़ में जुटी बसपा अपने बेस वोट को एकजुट करना चाहती है।
मंगलवार को राज्यसभा में मायावती का आक्रामक तेवर और इस्तीफा भी उनकी सियासी चाल मानी जा रही है। हालांकि यह दांव दलितों को साधने में कितना सटीक होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।
भीम आर्मी के जरिए भाजपा की घेराबंदी
दलितों की रहनुमाई कर रही भीम आर्मी भले ही खुद को राजनीति से अलग कर रही हो, मगर सियासी दल उसका इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहे हैं। बसपा उसे भाजपा के साथ जोड़कर दलितों को एकजुट कर अपने पाले में लाना चाह रही है।
बसपा को मालूम है कि बिना दलित मत एकजुट किए मुस्लिम उसके साथ नहीं आएगा। उधर, कांग्रेस दलितों में सेंधमारी के लिए भीम आर्मी के बीच सक्रिय होने की कोशिश में है। साथ ही मुस्लिम मतों को भी अपने पाले में किए रखने के लिए दलितों में सेंधमारी की सियासत की जा रही है।श्
बसपा का मजबूत गढ़ है सहारनपुर
दलित आंदोलन से लेकर बसपा को सत्ता में पहुंचाने तक सहारनपुर की बड़ी भूमिका रही है। मायावती सहारनपुर के हरौड़ा वर्तमान में देहात सीट से चुनाव जीतकर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं। बसपा के अस्तित्व में आने के बाद से जिले की सात में कम से कम चार सीट पर कब्जा भी रहा। मगर, इस विधानसभा चुनाव में बसपा यहां खाता भी नहीं खोल पाई। हिंसा में भीम आर्मी की सक्रियता से बसपा को नई चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है।
राज्यसभा में करीब आठ माह का कार्यकाल शेष
मायावती का राज्यसभा में कार्यकाल करीब आठ माह समाप्त अप्रैल 2018 तक है। उसके बाद सदन में जाने की संभावना नहीं दिखाई दे रही है। कारण, बसपा के पास महज 19 विधायक हैं, जो किसी को भी राज्यसभा भेजने के लिए नाकाफी है।
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उन्होंने हिंसा से सुलग चुके सहारनपुर के साथ ही वेस्ट यूपी में दोराहे पर खड़े अपने बेस वोटर दलितों को अपनी सशक्त रहनुमाई का संदेश दिया है। दलित राजनीति में सेंध लगाने की भीम आर्मी की कोशिशों के बीच उन्हें सहानुभूति का लाभ भी मिलता दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि उन्होंने इसके जरिए दलितों को एकजुट करने के लिए बड़ा दाव चला है।
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बसपा के मजबूत गढ़ सहारनपुर में पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। इसके ठीक बाद 20 अप्रैल को पहले दलित-मुस्लिम संघर्ष और पांच मई को दलित-राजपूत संघर्ष से दलित सियासत तेज हो गई। राजनीतिक दलों के किसी भी दाव से पहले भीम आर्मी ने दलितों की रहनुमाई कर बसपा के गढ़ में उसे सीधी चुनौती दी।
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दलित वर्ग के बीच भीम आर्मी की लोकप्रियता ने न केवल बसपा बल्कि दूसरे दलों को भी बैकफुट पर ला दिया। यही कारण है कि 23 मई को पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सड़क मार्ग से सहारनपुर के हिंसा प्रभावित शब्बीरपुर गांव पहुुंची थीं, मगर उनकी वापसी के दौरान ही यहां हिंसा दोबारा भड़क गई थी।
ऐसे में बसपा और उसकी मुखिया के सामने दलितों का दिल जीतने की चुनौती बनी थी। उधर, भीम आर्मी की सक्रियता का फायदा कांग्रेस सहित दूसरी पार्टियां उठाने मेें जुटी थीं। दलित-मुस्लिम गठजोड़ में जुटी बसपा अपने बेस वोट को एकजुट करना चाहती है।
मंगलवार को राज्यसभा में मायावती का आक्रामक तेवर और इस्तीफा भी उनकी सियासी चाल मानी जा रही है। हालांकि यह दांव दलितों को साधने में कितना सटीक होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।
भीम आर्मी के जरिए भाजपा की घेराबंदी
दलितों की रहनुमाई कर रही भीम आर्मी भले ही खुद को राजनीति से अलग कर रही हो, मगर सियासी दल उसका इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहे हैं। बसपा उसे भाजपा के साथ जोड़कर दलितों को एकजुट कर अपने पाले में लाना चाह रही है।
बसपा को मालूम है कि बिना दलित मत एकजुट किए मुस्लिम उसके साथ नहीं आएगा। उधर, कांग्रेस दलितों में सेंधमारी के लिए भीम आर्मी के बीच सक्रिय होने की कोशिश में है। साथ ही मुस्लिम मतों को भी अपने पाले में किए रखने के लिए दलितों में सेंधमारी की सियासत की जा रही है।श्
बसपा का मजबूत गढ़ है सहारनपुर
दलित आंदोलन से लेकर बसपा को सत्ता में पहुंचाने तक सहारनपुर की बड़ी भूमिका रही है। मायावती सहारनपुर के हरौड़ा वर्तमान में देहात सीट से चुनाव जीतकर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं। बसपा के अस्तित्व में आने के बाद से जिले की सात में कम से कम चार सीट पर कब्जा भी रहा। मगर, इस विधानसभा चुनाव में बसपा यहां खाता भी नहीं खोल पाई। हिंसा में भीम आर्मी की सक्रियता से बसपा को नई चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है।
राज्यसभा में करीब आठ माह का कार्यकाल शेष
मायावती का राज्यसभा में कार्यकाल करीब आठ माह समाप्त अप्रैल 2018 तक है। उसके बाद सदन में जाने की संभावना नहीं दिखाई दे रही है। कारण, बसपा के पास महज 19 विधायक हैं, जो किसी को भी राज्यसभा भेजने के लिए नाकाफी है।