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जग करता है प्यार फूल से, मैं शूलों से...

Sat, 05 Sep 2020 11:39 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 05 Sep 2020 11:39 PM IST
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Love awakens me with flowers,
- हिंदी हैं हम -- गीतकार महेशदत्त रंक - फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। अंग्रेजों का राज था तो उर्दू अदब के शायरों और लेखकों की लंबी फेहरिस्त थी। बावजूद हिंदी गीतों का सृजन करने वाले महेशदत्त रंक उस दौर में भी मंचों पर हिंदी गीतों के जरिए वेदना, विरह और प्रेम रूपी गीत परोसते थे। गीतकार महेशदत्त रंक ने हिंदी गीतों के माध्यम से अपनी जो पहचान बनाई, वह यादगार है और बनी रहेगी।
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15 जुलाई 1924 को कस्बा थानाभवन (शामली) में पिता सूरजभान शर्मा के घर में महेशदत्त रंक का जन्म हुआ, लेकिन इसके बाद उनका परिवार सहारनपुर आकर बस गया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी सहारनपुर में हुई और सनातन संस्कृत विद्यालय से भी पढ़ाई की। इसके बाद ऋषिकेश में प्रवास के दौरान बाबा कमली वाले की संस्था से आयुर्वेद की परीक्षा उत्तीर्ण की और देहरादून के धर्मार्थ औषधालय में कार्य किया। वहां से वापस सहारनपुर आए और तब तक वह वैद्य महेशदत्त हो गए थे। यहां अपना औषधालय चलाया और जीविका चलाने लगे, लेकिन हिंदी के प्रति प्रेम और गीत लिखना नहीं छोड़ा और हिंदी मित्र मंडल में जुड़कर अपनी इस कला को निखारा। फिर विभिन्न मंचों पर हिंदी गीतों के माध्यम से खूब वाहवाही बटोरी। 12 मार्च 1968 को उनका देहावसान हो गया।
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जीवित रहते प्रकाशित नहीं करा पाए गीत संकलन
सहारनपुर। गीतकार महेशदत्त रंक ने कई हिंदी गीत लिखे, लेकिन उनका संकलन प्रकाशित नहीं हो सका। उनके देहावसान के उपरांत पुत्र विनोद भृंग ने पीड़ा की सौगात शीर्षक से उनके गीतों का संकलन प्रकाशित कराया। विनोद भृंग बताते हैं कि कवि हरिवंशराय बच्चन, गोपालदास नीरज, चिरंजीत, डॉ. विष्णुदत्त राकेश सहित देश के तमाम नामचीन कवियों ने इस संकलन के लिए बधाई दी।
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गीतों में होती थी वेदना और विरह
महेशदत्त रंक की रचनाओं में विरह और वेदना प्रभावी रूप से झलकती थीं। उनका एक गीत है बिन बुलाये ही सही पर आ गया हूं, है तुम्हारा ही जिसे दोहरा गया हूं, यों निभाने को हजारों हैं तरीके, तुम निभा लेना तुम्हें यदि भा गया हूं। इसी तरह उनका एक और गीत है - जग करता है प्यार फूल से, मैं शूलों से, मुझमें इस जगह में, केवल इतना ही अंतर है।

प्रमुख रचनाएं
रंक - तुलसी दल / पात-पात प्रभावी
रंक - नाम से रंक, स्वभाव से राजा
रंक - रसभरे छलछलाते हृदय का नाम
रंक - हर बार नए अर्थ खोलते गीतों के जनक
गीत सृजन यात्रा को आगे बढ़ा रहे भृंग
सहारनपुर। गीतकार महेशदत्त रंक की गीत सृजन यात्रा को उनके पुत्र विनोद भृंग भी बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं। सहारनपुर की ब्रहमपुरी कालोनी में रहने वाले विनोद भृंग कई बाल कविता संग्रह प्रकाशित कर चुके हैं। विभिन्न मंचों पर गीत रचना का प्रदर्शन कर वाहवाही बटोरते हैं। साहित्यिक संस्था समन्वय में सक्रिय भूमिका के साथ कार्य कर रहे हैं। इसके लिए 1987 में काव्यश्री सम्मान, 2001 में बाल साहित्य सम्मान, 2016 में दोहा शिरोमणि सम्मान, 2017 में सृजन सम्मान, 2019 में साहित्य सागर सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। इसके अलावा पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत से 2006 में साहित्य सेवाओं के लिए सम्मानित हो चुके हैं।
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