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आजादी की लड़ाई में तीन बार काटी जेल, नहीं लिया कोई लाभ
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अपने समकालीन स्वतंत्रता सेनानियों के साथ पंडित सीताराम
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर, बड़गांव। देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ऐसे बहुत से मतवाले सेनानी रहे जिनका इतिहास के पन्नों तक में नाम दज नहीं हो सका। ऐसे ही सेनानी हसनपुर लौटनी के पंडित सीताराम शर्मा थे जो तीन बार जेल गए और उन्होंने आजादी मिलने पर सरकार से मिलने वाले लाभ और प्रमाणपत्र तक को लेने से मना कर दिया था।
बड़गांव क्षेत्र के गांव हसनपुर लौटनी निवासी मानाराम शर्मा के पुत्र सीताराम शर्मा का जन्म वर्ष 1916 में हुआ था। पंडित सीताराम के बेटे केशोराम शर्मा बताते हैं कि उनके पिता आजादी की लड़ाई में सहारनपुर, मेरठ, बरेली आदि की जेलों में पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ बंद रहे थे। पहली बार पंडित सीताराम को मात्र 16 वर्ष की उम्र में फरवरी 1932 में छह माह के कठोर कारावास की सजा और दस रुपये का अर्थदंड हुआ था। अर्थदंड का भुगतान न कर पाने के कारण उन्हें छह सप्ताह अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ा था। इस दौरान वे बरेली जेल में रहे थे। इसके बाद उन्हें जनवरी 1941 में एक साल का कारावास और पांच रुपये का अर्थदंड हुआ। अर्थदंड न दे पाने पर उन्हें एक सप्ताह अतिरिक्त सजा हुई थी। नवंबर 1942 में फिर उन्हें एक साल का कठोर कारावास हुआ। उक्त सभी सजाओं का रिकार्ड सहारनपुर जिला जेल से मिले दस्तावेज से उनके परिजनों को प्राप्त हुआ है। देश को आजादी दिलाने के बाद 1964 में उनका निधन हो गया था।
पंडित सीताराम अपने समकक्ष स्वतंत्रता के दिवानों मौरा निवासी ठाकुर सुबा सिंह, भावसी निवासी ठा. अर्जुन सिंह, घाटेड़ा निवासी केशोराम वैध, सरसावा निवासी पंडित रामनाथ, दल्हेड़ी निवासी सरदार सिंह, नत्थू राम आदि के साथ आजादी की जंग के लिए लड़ी जाने वाली हर गतिविधियों में शामिल रहे। पंडित सीताराम के पौत्र संघ के राकेश कुमार बताते हैं कि उनके बाबा जी ने
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उस समय देश की आजादी के सामने सरकार से मिलने वाले हर लाभ व प्रमाण पत्र तक को लेने से मना कर दिया था। लौटनी गांव में नेहरू युवा क्लब द्वारा लगवाए गए शिलालेख में भी उनके नाम का इसलिए उल्लेख नहीं किया गया, जबकि सरसावा मिल परिसर में लगी क्रांतिकारियों की सूची में उनका नाम अंकित है।
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बड़गांव क्षेत्र के गांव हसनपुर लौटनी निवासी मानाराम शर्मा के पुत्र सीताराम शर्मा का जन्म वर्ष 1916 में हुआ था। पंडित सीताराम के बेटे केशोराम शर्मा बताते हैं कि उनके पिता आजादी की लड़ाई में सहारनपुर, मेरठ, बरेली आदि की जेलों में पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ बंद रहे थे। पहली बार पंडित सीताराम को मात्र 16 वर्ष की उम्र में फरवरी 1932 में छह माह के कठोर कारावास की सजा और दस रुपये का अर्थदंड हुआ था। अर्थदंड का भुगतान न कर पाने के कारण उन्हें छह सप्ताह अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ा था। इस दौरान वे बरेली जेल में रहे थे। इसके बाद उन्हें जनवरी 1941 में एक साल का कारावास और पांच रुपये का अर्थदंड हुआ। अर्थदंड न दे पाने पर उन्हें एक सप्ताह अतिरिक्त सजा हुई थी। नवंबर 1942 में फिर उन्हें एक साल का कठोर कारावास हुआ। उक्त सभी सजाओं का रिकार्ड सहारनपुर जिला जेल से मिले दस्तावेज से उनके परिजनों को प्राप्त हुआ है। देश को आजादी दिलाने के बाद 1964 में उनका निधन हो गया था।
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पंडित सीताराम अपने समकक्ष स्वतंत्रता के दिवानों मौरा निवासी ठाकुर सुबा सिंह, भावसी निवासी ठा. अर्जुन सिंह, घाटेड़ा निवासी केशोराम वैध, सरसावा निवासी पंडित रामनाथ, दल्हेड़ी निवासी सरदार सिंह, नत्थू राम आदि के साथ आजादी की जंग के लिए लड़ी जाने वाली हर गतिविधियों में शामिल रहे। पंडित सीताराम के पौत्र संघ के राकेश कुमार बताते हैं कि उनके बाबा जी ने
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उस समय देश की आजादी के सामने सरकार से मिलने वाले हर लाभ व प्रमाण पत्र तक को लेने से मना कर दिया था। लौटनी गांव में नेहरू युवा क्लब द्वारा लगवाए गए शिलालेख में भी उनके नाम का इसलिए उल्लेख नहीं किया गया, जबकि सरसावा मिल परिसर में लगी क्रांतिकारियों की सूची में उनका नाम अंकित है।

आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत हलालपुर में जामिया हुदा लिलआलमीन में दावतुल हक़ संस्था द्वारा ?- फोटो : SAHARANPUR